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'राष्ट्रपति बने रबड़ स्टाम्प, सुप्रीम कोर्ट पंगु...', हंगामा कर रहे विपक्ष को निशिकांत दुबे ने याद दिलाया इंदिरा गांधी का 42वां संविधान संशोधन विधेयक

देश की राजनीति में 130वें संविधान संशोधन विधेयक पर घमासान तेज है. विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताया, जबकि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पलटवार करते हुए 1976 के 42वें संशोधन को लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार करार दिया. दुबे ने आरोप लगाया कि इस संशोधन ने राष्ट्रपति को रबर स्टाम्प, सुप्रीम कोर्ट को पंगु और संसद के अधिकार सीमित कर दिए थे.

'राष्ट्रपति बने रबड़ स्टाम्प, सुप्रीम कोर्ट पंगु...', हंगामा कर रहे विपक्ष को निशिकांत दुबे ने याद दिलाया इंदिरा गांधी का 42वां संविधान संशोधन विधेयक
Nishikant Dubey (File Photo)
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देश की राजनीति इन दिनों एक बार फिर गर्म है. संसद से लेकर सड़क तक बहस का मुद्दा बन चुका है प्रस्तावित 130वां संविधान संशोधन विधेयक. इस बिल में साफ तौर पर कहा गया है कि अगर किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर अपराध में पांच साल या उससे अधिक की सजा का सामना करना पड़े और वह लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहे, तो 31वें दिन उसे पद से हटा दिया जाएगा. इसी बिल के सदन में पेश होने के बाद विपक्षी दलों के सांसदों ने सदन में जमकर हंगामा किया. वही अब इस विषय पर बहस सियासी बहस लगातार बढ़ती जा रही है. विपक्ष के विरोध के बाद बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए गंभीर आरोप लगाए है. 

BJP सांसद निशिकांत दुबे का हमला

इस पूरे विवाद के बीच भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कांग्रेस पार्टी और विशेष रूप से इंदिरा गांधी के दौर को कटघरे में खड़ा किया है. निशिकांत दुबे ने कहा कि 1976 में लाया गया 42वां संविधान संशोधन असल में भारतीय लोकतंत्र की जड़ों पर हमला था. उनका आरोप है कि इस संशोधन ने राष्ट्रपति को रबर स्टाम्प बना दिया, सुप्रीम कोर्ट की शक्तियाँ घटा दी गईं और संसद के अधिकार भी सीमित कर दिए गए. साथ ही संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’, ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ जैसे शब्द जोड़कर बाबा साहब अंबेडकर के बनाए संविधान की आत्मा को बदल दिया गया. 

सोशल मीडिया पर तीखी टिप्पणी

निशिकांत दुबे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "क्या प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री जेल जाने के बाद भी सरकार चला सकता है? कांग्रेस विपक्ष के साथ मिलकर नया खेल कर रही है. 42वें संविधान संशोधन ने बाबा साहब अंबेडकर के संविधान को खत्म कर दिया था. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री के रबर स्टाम्प हो गए, सुप्रीम कोर्ट पंगु हो गया, संसद का अधिकार खत्म हो गया और गरीबों का जमीन-मकान पर हक भी छीना गया." उन्होंने राहुल गांधी पर भी निशाना साधते हुए कहा कि यह सब सोरोस और फोर्ड फाउंडेशन जैसी ताकतों की मदद से हो रहा है, जिनका मकसद देश को तोड़ना है.

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बिल का बड़ा प्रावधान

लोकसभा में पेश इस बिल के मुताबिक प्रधानमंत्री को हटाने का अधिकार राष्ट्रपति को होगा. राज्यों में यह जिम्मेदारी राज्यपाल पर होगी, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों में उपराज्यपाल को ये अधिकार दिया गया है. अगर 31वें दिन तक कोई कार्रवाई नहीं होती है, तो 32वें दिन वह पद अपने आप रिक्त हो जाएगा. हालांकि, हिरासत से बाहर आने के बाद पुनर्नियुक्ति की अनुमति होगी. यह प्रावधान देश की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है. विपक्षी पार्टियाँ कह रही हैं कि इसका सीधा असर लोकतंत्र और संघीय ढांचे पर पड़ेगा, वहीं सत्तारूढ़ भाजपा इसे भ्रष्टाचार और अपराध से राजनीति को मुक्त कराने की दिशा में उठाया गया ठोस कदम बता रही है.

कांग्रेस का पलटवार

कांग्रेस पार्टी ने इस बिल का कड़ा विरोध किया है. कांग्रेस नेता गुलाम अहमद मीर का कहना है कि भाजपा इस कानून का इस्तेमाल विपक्षी दलों को खत्म करने के लिए करना चाहती है. उनका आरोप है कि अगर किसी मंत्री के खिलाफ मामला दर्ज हो और वह गिरफ्तार हो जाए, तो केवल 30 दिन की हिरासत में ही उसकी कुर्सी छिन जाएगी. यह लोकतंत्र के खिलाफ है और विपक्ष की आवाज़ दबाने की साज़िश है. सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, वामपंथी दलों ने भी इस बिल को लोकतंत्र पर सीधा हमला बताया है. उनका कहना है कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जैसे पदों पर बैठे व्यक्ति को अदालत में दोषी साबित होने से पहले ही हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. यही नहीं, उन्होंने इस विधेयक का पूरी ताकत से विरोध करने का संकल्प भी जताया है.

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क्या बदल जाएगा राजनीति का चेहरा?

अगर यह बिल कानून बन जाता है, तो निश्चित तौर पर भारतीय राजनीति का चेहरा बदल जाएगा. अभी तक कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जब भ्रष्टाचार या गंभीर आरोपों में घिरे नेता जेल की सज़ा काटते हुए भी अपने पद पर बने रहे. इससे न सिर्फ लोकतंत्र की छवि धूमिल होती है, बल्कि जनता का भरोसा भी टूटता है. लेकिन दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जा रहा है कि सिर्फ 30 दिन की हिरासत में पद छिन जाना भी न्याय प्रक्रिया के विपरीत हो सकता है. क्योंकि अंतिम फैसला अदालत के जरिए ही होना चाहिए, न कि केवल आरोप और गिरफ्तारी के आधार पर.

विपक्ष बनाम सत्ता का टकराव तय

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एक तरफ भाजपा इसे राजनीतिक सुधार की दिशा में अहम कदम बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे तानाशाही की ओर बढ़ता कदम मान रहा है. संसद की संयुक्त समिति को भेजे गए इस बिल पर अब विस्तार से अध्ययन होगा और उसके बाद ही फैसला होगा कि यह कानून कितना कारगर साबित होगा. ऐसे में देश की जनता इस बिल को उत्सुकता से देख रही है. क्या यह वास्तव में भ्रष्ट और आपराधिक छवि वाले नेताओं को राजनीति से बाहर करेगा? या फिर विपक्ष के आरोपों के मुताबिक यह सत्ता पक्ष का विपक्ष को खत्म करने का हथियार बन जाएगा?

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