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'जज चाहे कोई भी हो लेकिन उसे...', जस्टिस शेखर यादव की विवादित टिप्पणी पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने दिया बड़ा बयान, जानें पूरा मामला

इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर यादव की मुस्लिमों पर विवादित टिप्पणी के बाद पूर्व सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी भी जज के लिए धर्मनिरपेक्ष रहना जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा के कैशकांड में जज को पूरी सुनवाई का अवसर मिलने से पहले निर्णय नहीं लेना चाहिए और इस मामले में एफआईआर होनी चाहिए थी.

'जज चाहे कोई भी हो लेकिन उसे...', जस्टिस शेखर यादव की विवादित टिप्पणी पर पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने दिया बड़ा बयान, जानें पूरा मामला
DY ChandraChud (File Photo)
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इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज शेखर यादव की विवादित टिप्पणी ने राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में हलचल मचा दी है. 8 दिसंबर 2024 को विश्व हिंदू परिषद के एक कार्यक्रम में उन्होंने मुस्लिमों के बारे में टिप्पणी की और कहा कि “कठमुल्ले देश के लिए घातक हैं”. इसके अलावा, उन्होंने समान नागरिक संहिता पर भी टिप्पणी करते हुए इसे हिंदू बनाम मुस्लिम के रूप में पेश किया और यह भी कहा कि हिंदुओं ने अपनी पुरानी बुराइयों में सुधार किया, लेकिन मुस्लिम समाज ने ऐसा नहीं किया.

जज को धर्मनिरपेक्ष होना जरूरी: पूर्व डीवाई चंद्रचूड़

इन टिप्पणियों के बाद विपक्षी दलों ने तीखी आपत्ति जताई और मांग की कि जस्टिस शेखर यादव पर भी महाभियोग चलाया जाए, ठीक वैसे ही जैसे कैशकांड में फंसे जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ किया गया. इस बीच, इस मामले पर पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने प्रतिक्रिया दी. पूर्व सीजेआई ने स्पष्ट कहा, “कोई भी जज हो, उसको धर्मनिरपेक्ष रहना बहुत जरूरी है.” उनका यह बयान न्यायिक तटस्थता और संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को याद दिलाने वाला माना जा रहा है. उन्होंने यह भी जोर देकर कहा कि जज को किसी मामले पर फैसला करने से पहले पूरी सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए और पहले से निष्कर्ष निकालना न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है.

जस्टिस यशवंत वर्मा के कैशकांड का दिया उदाहरण 

डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के कैशकांड का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या पैसे उनके थे या घर से मिले थे और यह भी कहा कि इस मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा पर एफआईआर होनी चाहिए थी. उनका यह बयान बताता है कि न्यायपालिका में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी जरूरी है. वास्तव में, इस विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या न्यायपालिका में बैठे लोग भी सामाजिक और धार्मिक विषयों पर अपनी राय साझा कर सकते हैं, और यदि कर भी दें तो उनकी भूमिका कितनी तटस्थ होनी चाहिए. देश में न्यायपालिका की साख और धर्मनिरपेक्षता पर लगातार नजर रखी जा रही है.

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बता दें कि इस पूरे घटनाक्रम से यह साफ होता है कि न्यायपालिका के हर सदस्य की जिम्मेदारी सिर्फ कानून और संविधान के प्रति है, न कि किसी धर्म या समुदाय के पक्ष में. जजों की टिप्पणी चाहे कितनी भी व्यक्तिगत लगती हो, अगर वह न्यायपालिका की तटस्थता को प्रभावित करती है तो यह व्यापक स्तर पर सवाल उठाता है.

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