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विवाद और वॉइस: उमर खालिद और लोकतंत्र की परीक्षा

प्रेस क्लब में हुई इस बुक लॉन्चिंग ने एक और सवाल उठाया है. जब देश का दक्षिणपंथ जाति की लड़ाई में उलझा है, ठीक उसी वक्त वामपंथ अपने रिवाइवल की कोशिश में है.

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19 Feb 2026
( Updated: 19 Feb 2026
05:20 PM )
विवाद और वॉइस: उमर खालिद और लोकतंत्र की परीक्षा
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इस किताब में इतिहासकार रोमिला थापर और रामचंद्र गुहा, आनंद तेलतुंबड़े, लेखक मुकुल केसवन, कांग्रेस एमएलए जिग्नेश मेवाणी, न्यूयॉर्क शहर के मेयर ज़ोहरान ममदानी, और एक्टर प्रकाश राज और स्वरा भास्कर के निबंध शामिल हैं. इस वॉल्यूम में खुद उमर के भी कई निबंध शामिल हैं.

विमोचन, विवाद और सवाल

कल प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में इसका विमोचन किया गया, जिसमें अल- जजीरा से जुड़े श्रीनिवासन जैन भी शामिल हुए.

सवाल आपसे है, क्या एक ऐसे व्यक्ति का ‘महिमामंडन’ किया जाना चाहिए जिस पर देश के खिलाफ साजिश रचने जैसे गंभीर आरोप हों और जिसे अदालतों ने अब तक जमानत के योग्य न माना हो?

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प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित इस कार्यक्रम में देश के कई पत्रकारों, लेखकों और आंदोलनजीवियों ने शिरकत की. उपस्थित लोगों में सिद्धार्थ वरदराजन, अपूर्वानंद, परंजय गुहा ठाकुरता और कई वामपंथी विचारधारा से जुड़े आंदोलनजीवी शामिल थे.

किताब का संपादन बनोज्योत्सना लाहिड़ी, शुद्धब्रत सेनगुप्ता, अनिर्बाण भट्टाचार्य ने किया है. निमंत्रण पत्र में श्रीनिवासन जैन, साबिहा खानम, गौतम भाटिया, नेहा दीक्षित, अपेक्षा प्रियदर्शिनी, साबिका नकवी, दानिश अली का नाम छपा था.

किताब रिलीज़ करने वाले जर्नलिस्ट श्रीनिवासन जैन ने कहा- “जैसा कि आप क्रोनोलॉजी समझिए. यह क्रोनोलॉजी किसी को समझ नहीं आ रही है कि सुबह आप अपने क्रिटिक्स को जेल में डालते हैं, और शाम को आप कहते हैं कि आप डेमोक्रेसी की मां हैं….”

मुख्य तर्क और बहस

कार्यक्रम का मुख्य स्वर यह था कि उमर खालिद को ‘असहमति की आवाज’ दबाने के लिए निशाना बनाया जा रहा है. वक्ताओं ने तर्क दिया कि खालिद के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं हैं और उन्हें बिना मुकदमे के लंबे समय तक जेल में रखना मानवाधिकारों का उल्लंघन है. लेकिन यहाँ प्रश्न उठता है कि क्या यह केवल ‘असहमति’ है या कुछ और?

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एलेकिन सवाल भी उठते हैं

यही आंदोलनजीवी वर्ग अन्य विचारधारा के आरोपियों के मामले में ‘कानून को अपना काम करने देने’ की बात करता है, लेकिन जब बात उमर खालिद की आती है, तो वे सीधे कानून और अदालत की प्रक्रिया को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं. क्या किसी की ‘बौद्धिक पृष्ठभूमि’ या ‘लेखन क्षमता’ उसे देश के कानून से ऊपर बना देती है?

राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए, लेकिन वह राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा की कीमत पर नहीं हो सकता. उमर खालिद दोषी हैं या नहीं, इसका निर्णय केवल अदालत करेगी. तब तक, किसी आरोपी को ‘शहीद’ या ‘महान क्रांतिकारी’ के रूप में पेश करना समाज में भ्रम की स्थिति पैदा करता है.

प्रेस क्लब में हुई इस बुक लॉन्चिंग ने एक और सवाल उठाया है. जब देश का दक्षिणपंथ जाति की लड़ाई में उलझा है, ठीक उसी वक्त वामपंथ अपने रिवाइवल की कोशिश में है.

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