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1954 में जब नेहरू पर लगा कुंभ भगदड़ का आरोप? 800 लोगों की हुई थी मौत
प्रयागराज में 2025 के महाकुंभ के दौरान भगदड़ मचने से हड़कंप मच गया। संगम नोज के पास हुई इस घटना में अब तक 10 लोगों के मारे जाने की खबर है, हालांकि प्रशासन ने इसकी पुष्टि नहीं की है। यह पहली बार नहीं है जब कुंभ मेले में भगदड़ हुई हो।
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प्रयागराज में महाकुंभ 2025 के दौरान एक बड़ा हादसा सामने आया है। मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम नोज के पास अचानक भगदड़ मच गई, जिससे मेला क्षेत्र में अफरा-तफरी का माहौल बन गया। प्रारंभिक रिपोर्ट्स के अनुसार, इस हादसे में 10 लोगों की मौत की खबर आ रही है, हालांकि प्रशासन की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।
कैसे हुआ हादसा?
जानकारी के मुताबिक, रात करीब एक बजे भारी भीड़ संगम नोज की तरफ बढ़ रही थी। भक्तों की संख्या इतनी अधिक थी कि प्रशासन के लिए भीड़ को नियंत्रित कर पाना मुश्किल हो गया। अचानक एक अफवाह फैली, जिससे भगदड़ मच गई। पुलिस और सुरक्षाबलों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को संभालने की कोशिश की, लेकिन तब तक कई लोग कुचल चुके थे।
कुंभ में पहले भी हो चुकी हैं ऐसी घटनाएं
कुंभ मेला अपनी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्ता के लिए जाना जाता है, लेकिन अतीत में कई बार यह मेले दुखद घटनाओं का साक्षी भी बना है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो कुंभ के दौरान कई बार भगदड़ जैसी दर्दनाक घटनाएं हो चुकी हैं।
2013: 2013 के प्रयागराज कुंभ मेले के दौरान मौनी अमावस्या के पावन दिन भारी संख्या में श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचे थे। इस दौरान रेलवे स्टेशन पर अधिक भीड़ जमा हो गई और भीड़ को नियंत्रित करने में प्रशासन नाकाम साबित हुआ। अफरा-तफरी के कारण हुई भगदड़ में 36 लोगों की जान चली गई। यह घटना प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण बनी।
2010: हरिद्वार में 2010 में आयोजित कुंभ मेले के दौरान 14 अप्रैल को एक बड़ा हादसा हुआ। गंगा स्नान के लिए उमड़ी भीड़ अचानक बेकाबू हो गई, जिससे मेला क्षेत्र में भगदड़ मच गई। इस भगदड़ में 7 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हो गए थे।
2003: नासिक में 27 अगस्त 2003 को कुंभ मेले में भीषण भगदड़ मच गई थी। हजारों श्रद्धालु स्नान के लिए पहुंचे थे, लेकिन अचानक नियंत्रण खो जाने से 39 लोगों की जान चली गई। यह घटना कुंभ के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक मानी जाती है।
1992: उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में भी 1992 में भगदड़ की घटना हुई थी। इस घटना में 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी।
जब नेहरू पर लगा था भगदड़ का आरोप
देश की आज़ादी के बाद 1954 में प्रयागराज में पहली बार कुंभ का आयोजन हुआ था। उस दौरान 3 फरवरी को मौनी अमावस्या थी और लाखों श्रद्धालु संगम स्नान के लिए आए थे। अचानक भगदड़ मच गई और देखते ही देखते सैकड़ों लोग कुचलकर मर गए। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस भगदड़ में करीब 800 लोगों की मौत हुई थी।
हैरानी की बात यह थी कि इस हादसे के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया गया। कहा जाता है कि हादसे से एक दिन पहले नेहरू ने कुंभ क्षेत्र का दौरा किया था और सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया था। विपक्ष ने इस घटना को लेकर नेहरू पर निशाना साधा और उनकी यात्रा को हादसे का कारण बताया। हालांकि, सरकार की ओर से इसे एक दुर्घटना करार दिया गया।
कुंभ में भीड़ नियंत्रण एक बड़ी चुनौती
प्रत्येक कुंभ मेले में करोड़ों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं, जिससे प्रशासन के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बहुत बड़ी चुनौती बन जाती है। इस बार भी प्रयागराज महाकुंभ 2025 के दौरान यही समस्या देखने को मिली। प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए थे, लेकिन अत्यधिक भीड़ के कारण भगदड़ की स्थिति उत्पन्न हो गई। इतिहास की इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि कुंभ मेले जैसे विशाल आयोजनों में भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा प्रबंधन बेहद महत्वपूर्ण होता है। प्रशासन को चाहिए कि वे पहले से ही ठोस रणनीति बनाएं और आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भीड़ को नियंत्रित करने की व्यवस्था करें, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
कुंभ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं का जीता-जागता प्रमाण है। लेकिन बार-बार होने वाली भगदड़ की घटनाएं इस भव्य आयोजन पर सवालिया निशान खड़ा करती हैं। प्रयागराज महाकुंभ 2025 की यह घटना एक चेतावनी है कि प्रशासन को भीड़ नियंत्रण की बेहतर व्यवस्था करनी होगी। साथ ही, श्रद्धालुओं को भी धैर्य बनाए रखना चाहिए ताकि ऐसी त्रासदियों से बचा जा सके।
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