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जब इंद्र के पुत्र ने कौवे का रूप लेकर राहु से बचाया अमृत, धरती के इन चार जगह पर गिरी थी पावन बूंदें

कहते है देवता और असुर, दोनों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, लेकिन अमृत के निकलते ही दोनों पक्षों में इसे हासिल करने के लिए संघर्ष शुरू हो गया। धन्वंतरि देव जब अमृत कुंभ लेकर प्रकट हुए, तो राहु ने उसे छीनने का प्रयास किया। इसी दौरान इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर अमृत कुंभ को बचाने के लिए उड़ान भरी।

जब इंद्र के पुत्र ने कौवे का रूप लेकर राहु से बचाया अमृत, धरती के इन चार जगह पर गिरी थी पावन बूंदें
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प्रयागराज, जिसे तीर्थराज भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति और आस्था का केंद्र है। यहां तीन नदियों—गंगा, यमुना और सरस्वती—का संगम होता है। यह स्थान केवल भौगोलिक महत्व नहीं रखता, बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी अत्यधिक पवित्र है। महाकुंभ का आयोजन हर 12 साल में यहां होता है। इसकी जड़ें पौराणिक कथाओं में छिपी हैं, जहां देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए हुए महासंग्राम की घटनाएं दर्ज हैं।

समुद्र मंथन, अमृत की खोज का प्रारंभ

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार देवताओं ने अपनी शक्तियां खो दीं। इस समस्या के समाधान के लिए भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन का सुझाव दिया। देवता और असुर मिलकर मंथन के लिए तैयार हुए। मंथन के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी और नाग वासुकी को रस्सी बनाया गया। मंथन से अनेक रत्न निकले, जिनमें हलाहल विष, कामधेनु, कल्पवृक्ष और देवी लक्ष्मी जैसे अनमोल उपहार थे। लेकिन असली उद्देश्य था अमृत प्राप्त करना।

मंथन के शुरुआती चरण में हलाहल विष निकला, जो संसार को नष्ट करने की क्षमता रखता था। इस विष को रोकने के लिए भगवान शिव ने इसे पी लिया और सृष्टि को बचाया। इस घटना के बाद देवताओं और असुरों ने मंथन जारी रखा। कई रत्नों के प्रकट होने के बाद आखिरकार अमृत कुंभ का उदय हुआ।

धन्वंतरि का प्रकट होना

अमृत कुंभ को लेकर कथा और भी रोचक हो जाती है। जब मंथन अपने चरम पर था, तब धन्वंतरि देव प्रकट हुए। उनकी चार भुजाएं थीं और उनके हाथों में अमृत से भरा कुंभ था। यह दृश्य इतना दिव्य था कि देवता और असुर दोनों अपनी लालसा छिपा नहीं सके। धन्वंतरि ने ब्रह्मदेव को प्रणाम करते हुए कहा कि वे आरोग्य और धन के देवता हैं और यह अमृत संसार के कल्याण के लिए है।

राहु का षड्यंत्र और अमृत का छीना-झपटी

धन्वंतरि के प्रकट होते ही असुरों में खलबली मच गई। राहु, जो असुरों का नेता था, उसने अमृत पर कब्जा करने की योजना बनाई। उसने धन्वंतरि से अमृत कुंभ छीनने का प्रयास किया। इसी दौरान देवताओं ने राहु को रोकने की कोशिश की। अचानक, इंद्र के पुत्र जयंत ने कौवे का रूप धारण कर कुंभ को लेकर उड़ान भरी। कौवे के रूप में जयंत जब अमृत कुंभ लेकर आकाश में उड़ रहा था, तो असुर लगातार उसका पीछा कर रहे थे। इस छीना-झपटी में अमृत की चार बूंदें पृथ्वी पर गिर गईं। ये स्थान थे हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक। अमृत की इन बूंदों ने इन स्थानों को पवित्र बना दिया। प्रयागराज में, गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर गिरी अमृत की बूंदों ने इसे तीर्थराज बना दिया।

अमृत की इन बूंदों के कारण ही इन चार स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। प्रयागराज में महाकुंभ सबसे विशेष माना जाता है, क्योंकि यह गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर होता है। मान्यता है कि यहां स्नान करने से सारे पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। जिसके बाद अब 12 साल बाद महाकुंभ 2025 में प्रयागराज फिर से आस्था का केंद्र बनने वाला है। करोड़ों श्रद्धालु यहां संगम पर स्नान करेंगे और अपनी आस्था को पुनर्जीवित करेंगे। इस आयोजन का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। महाकुंभ भारत की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं का प्रतीक है।

प्रयागराज में महाकुंभ केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि पौराणिक कथाओं और मानवता की गाथा का जीवंत स्वरूप है। यह हमें हमारे अतीत से जोड़ता है और वर्तमान में आस्था, धर्म और मानवता की शक्ति को महसूस कराता है।

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