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बॉन्ड यील्ड क्या होती है? क्या भारत वैश्विक बॉन्ड यील्ड संकट से बच पाएगा?

अमेरिका और जापान में बॉन्ड यील्ड में तेज़ वृद्धि ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में चिंता का माहौल बना दिया है. हालांकि, भारत की आर्थिक स्थिति मजबूत बनी हुई है, जिससे यह वैश्विक अस्थिरता के बीच एक स्थिर निवेश गंतव्य के रूप में उभर सकता है.

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हाल के दिनों में अमेरिका और जापान में बॉन्ड यील्ड में तेज़ बढ़ोतरी देखी गई है, जिससे वैश्विक वित्तीय बाजारों में चिंता का माहौल है. जापान के 30 और 40 साल के सरकारी बॉन्ड यील्ड रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं, जबकि अमेरिका में 30 साल के ट्रेजरी यील्ड 5% के पार चले गए हैं.  ऐसे में सवाल यह है कि जापान-अमेरिका में बॉन्ड यील्ड क्यों बढ़ रहा है, और आखिर यह बॉन्ड यील्ड होता क्या है? बॉन्ड यील्ड के घटने बढ़ने में मार्केट में कैसे उतार चढ़ाव आता है.

क्या होता है बॉन्ड यील्ड?

आर्थिक खबरों में जब 'बॉन्ड यील्ड' की चर्चा होती है तो आम पाठक के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यह होता क्या है. चलिए इसे आसान भाषा में समझते हैं. जब कोई सरकार या संस्था बॉन्ड जारी करती है तो वह एक तरह से उधार लेती है और उसके बदले निवेशक को ब्याज के रूप में मुनाफा देती है. यह मुनाफा ही 'बॉन्ड यील्ड' कहलाता है. अगर किसी बॉन्ड की कीमत बाजार में गिरती है तो यील्ड यानी उस पर मिलने वाला रिटर्न बढ़ जाता है. और जब बॉन्ड की कीमत बढ़ती है तो यील्ड घट जाती है. इसलिए, बॉन्ड यील्ड का बढ़ना इस बात का संकेत हो सकता है कि बाजार में अस्थिरता या निवेशकों में डर का माहौल है.

जापान-अमेरिका में बॉन्ड यील्ड क्यों बढ़ रही है

पिछले कुछ दिनों में जापान और अमेरिका दोनों में बॉन्ड यील्ड में जबरदस्त उछाल देखा गया है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार जापान में 40 साल के सरकारी बॉन्ड पर यील्ड अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है. वहीं, अमेरिका में 30 साल के ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 5 फीसदी के पार जा चुकी है. यह आंकड़े वैश्विक डेब्ट मार्केट की बेचैनी को उजागर करते हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि जापान में बढ़ती यील्ड का सीधा असर अमेरिका पर पड़ेगा क्योंकि जापान अमेरिका के सबसे बड़े बॉन्ड खरीदारों में से एक है. यदि जापानी निवेशक अमेरिकी बॉन्ड बेचकर अपने घरेलू बॉन्ड खरीदने लगते हैं, तो अमेरिकी ट्रेजरी मार्केट में दबाव बढ़ सकता है.

अमेरिका की बेचैनी, भारत पर कितना असर

20 मई को एक्स पर कैपिटलमाइंड के सीईओ दीपक शेनॉय ने पोस्ट करते हुए चेतावनी दी थी कि डेब्ट मार्केट में कुछ भयंकर घट रहा है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत इस समय सुरक्षित स्थिति में है. वहीं इंडियाबॉन्ड्स डॉट कॉम के को-फाउंडर विशाल गोयनका ने स्पष्ट किया कि जापान की वजह से अमेरिका पर जो असर होगा, उसकी गूंज भारत तक भी पहुंच सकती है. डर इस बात का है कि जापानी निवेशक अमेरिकी बॉन्ड बेचेंगे और इससे वहां की यील्ड और बढ़ेगी. इस बढ़ी हुई यील्ड का असर उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर भी देखा जा सकता है.

इन तमाम वैश्विक अस्थिरताओं के बीच भारत की स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई है. भारतीय रिजर्व बैंक ने महंगाई पर काफी हद तक नियंत्रण पाया है. विदेशी मुद्रा भंडार 691 अरब डॉलर पर है, जो संकट की घड़ी में एक मजबूत बैकअप के रूप में काम करेगा. हालांकि, एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि अगर ग्लोबल यील्ड का दबाव बढ़ा तो भारत के बॉन्ड मार्केट पर भी इसका आंशिक असर जरूर दिख सकता है.

बॉन्ड यील्ड में वृद्धि का असर भारत के शेयर बाजार पर भी दिखने लगा है. मंगलवार को भारी विदेशी बिकवाली के चलते भारतीय बाजार से करीब 10,000 करोड़ रुपये का फंड बाहर चला गया. जियोजित इन्वेस्टमेंट के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट का कहना है कि यदि यह ट्रेंड जारी रहा तो शेयर बाजार में और गिरावट देखी जा सकती है. इसके पीछे कई अंतरराष्ट्रीय कारण हैं, अमेरिकी कर्ज की क्रेडिट रेटिंग में गिरावट, जापानी यील्ड में उछाल, कुछ भारतीय राज्यों में कोविड मामलों में वृद्धि और मध्य-पूर्व में युद्ध जैसे हालात.

दुनियाभर में बॉन्ड यील्ड का बढ़ना निश्चित तौर पर एक चेतावनी है. हालांकि, भारत फिलहाल संतुलन बनाए रखने में सक्षम है, लेकिन वैश्विक बाजार में उठापटक का प्रभाव लंबे समय तक अनदेखा नहीं किया जा सकता. सरकार और रिजर्व बैंक को सतर्क रहना होगा ताकि आने वाली किसी भी आर्थिक लहर से देश की अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखा जा सके. 
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