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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप को दिया बड़ा झटका, टैरिफ का फैसला किया रद्द, भारत की पाई-पाई करनी होगी वापस!

US सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप को बड़ा झटका दिया है. दुनियाभर के देशों पर लगाए गए टैरिफ को अवैध घोषित करते हुए रद्द कर दिया है. अब कहा जा रहा है कि भारत जैसे देशों से टैरिफ के नाम पर वसूली गई रकम वापस करनी होगी.

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21 Feb 2026
( Updated: 21 Feb 2026
06:18 AM )
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप को दिया बड़ा झटका, टैरिफ का फैसला किया रद्द, भारत की पाई-पाई करनी होगी वापस!
Donald Trump / Supreme Court (File Photo)
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने ट्रंप द्वारा दुनियाभर के देशों पर लगाए गए व्यापक और पारस्परिक (रेसिप्रोकल) टैरिफ को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है. 6-3 के बहुमत से दिए गए इस फैसले में अदालत ने कहा कि 1977 के आपातकालीन कानून के तहत राष्ट्रपति को इतने व्यापक आयात शुल्क लगाने का अधिकार नहीं है. यह निर्णय ट्रंप की आर्थिक नीतियों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. साथ ही, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा पारस्परिक टैरिफ के खिलाफ दिए गए इस फैसले से भारत के लिए टैरिफ को लेकर बनी अनिश्चितता काफी हद तक कम हो गई है.

ट्रंप का टैरिफ का फैसला अवैध करार

मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स ने बहुमत का फैसला लिखते हुए कहा, “राष्ट्रपति ने असीमित राशि, अवधि और दायरे में एकतरफा टैरिफ लगाने की असाधारण शक्ति का दावा किया है. ऐसे अधिकार के प्रयोग के लिए स्पष्ट रूप से कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक है.” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि 1977 का वह कानून, जिसका हवाला देकर टैरिफ लगाए गए थे, कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति की कसौटी पर खरा नहीं उतरता. अदालत ने साफ कहा कि अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद 1, धारा 8 के तहत टैक्स और शुल्क लगाने की शक्ति केवल कांग्रेस (संसद) के पास है, राष्ट्रपति के पास नहीं.

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उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इस निर्णय ने एकतरफा टैरिफ लगाने की राष्ट्रपति की शक्तियों पर स्पष्ट कानूनी सीमा तय कर दी है. उनका मानना है कि इस फैसले से वैश्विक व्यापार में स्थिरता आएगी और भारत सहित अन्य व्यापारिक साझेदार देशों को राहत मिलेगी. गौरतलब है कि अंतरिम व्यापार व्यवस्था के तहत अमेरिका ने भारत पर पारस्परिक टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई थी. अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह व्यवस्था अप्रासंगिक हो गई है.

ग्रांट थॉर्नटन भारत के पार्टनर और टैक्स कंट्रोवर्सी मैनेजमेंट लीडर मनोज मिश्रा ने कहा, “ऐसे टैरिफ लगाने का कोई भी प्रयास अब कांग्रेस की मंजूरी के बिना संभव नहीं होगा. इससे भारतीय निर्यातकों को बड़ी राहत और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलने की संभावना है. साथ ही, बिना पर्याप्त कानूनी आधार पर वसूले गए टैरिफ की वापसी का रास्ता भी खुल सकता है.” हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका रणनीतिक क्षेत्रों में सेक्शन 232 के तहत क्षेत्र-विशेष टैरिफ का सहारा ले सकता है. ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते को आगे बढ़ाना जरूरी होगा, ताकि दीर्घकालिक टैरिफ स्थिरता और बाजार तक सुनिश्चित पहुंच मिल सके.

क्या है पूरा मामला?

टैरिफ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चला यह मामला “Learning Resources, Inc. v. Trump” के नाम से दर्ज था. याचिका में सवाल उठाया गया था कि क्या राष्ट्रपति के पास IEEPA (International Emergency Economic Powers Act) कानून के तहत दूसरे देशों से आने वाले प्रोडक्ट्स पर टैरिफ लगाने का अधिकार है या नहीं. कोर्ट ने इसी मुद्दे पर सुनवाई करते हुए ट्रंप के फैसले को रद्द कर दिया.

ट्रंप ने क्यों लिया था आपातकाल लगाने का फैसला?

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दरअसल, राष्ट्रपति ट्रंप ने दो मुद्दों को आधार बनाकर राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) घोषित किया था. पहला, कनाडा, मैक्सिको और चीन से आने वाली अवैध ड्रग्स यानी नशीली दवाओं की तस्करी. दूसरा, अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा (Trade Deficit), जिससे अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नुकसान हो रहा था. इन खतरों से निपटने के लिए राष्ट्रपति ने IEEPA कानून का इस्तेमाल करते हुए कनाडा और मैक्सिको पर 25 प्रतिशत और चीन पर भारी टैरिफ लगा दिए. कुछ मामलों में चीन पर कुल टैक्स 145 प्रतिशत तक पहुंच गया था, हालांकि बाद में इसे हटाया भी गया.

किस लिए हुआ था ट्रंप के फैसले के खिलाफ केस?

इन टैरिफ के कारण अमेरिकी कंपनियों और व्यापारियों पर लागत का दबाव बढ़ा. आयातित सामान महंगा हो गया, जिससे अमेरिका में महंगाई बढ़ने लगी और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं. इसके बाद कई छोटी कंपनियों और 12 अमेरिकी राज्यों ने अदालत में केस दायर कर दिया. उनका तर्क था कि संविधान के अनुसार टैक्स या टैरिफ लगाने की शक्ति केवल कांग्रेस के पास है. अदालत में यह दलील दी गई कि IEEPA राष्ट्रपति को व्यापार को संचालित (Regulate) करने की शक्ति देता है, लेकिन टैक्स लगाने की शक्ति नहीं देता.

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अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में क्या कहा?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश रॉबर्ट्स ने बहुमत से फैसला सुनाते हुए कहा कि IEEPA राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता. अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून में लिखा “रेगुलेट” (नियंत्रित करना) शब्द “टैक्स लगाने” के बराबर नहीं है. टैक्स लगाना एक बहुत बड़ी संवैधानिक शक्ति है, जिसे कांग्रेस ने स्पष्ट रूप से राष्ट्रपति को नहीं सौंपा है. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर संसद किसी राष्ट्रपति को इतना बड़ा आर्थिक अधिकार देना चाहती, जो पूरे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सके, तो वह इसे कानून में साफ और स्पष्ट शब्दों में लिखती. IEEPA की अस्पष्ट भाषा से इतनी व्यापक शक्ति नहीं ली जा सकती.

ट्रंप के पास IEEPA के तहत टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं!

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अदालत ने अंततः राष्ट्रपति द्वारा लगाए गए इन टैरिफ को अवैध घोषित करते हुए कहा कि चाहे आपातकाल ही क्यों न घोषित किया गया हो, राष्ट्रपति अपनी मर्जी से नए टैक्स या टैरिफ नहीं थोप सकते, जब तक कि कांग्रेस उन्हें स्पष्ट रूप से ऐसा करने की अनुमति न दे. आसान शब्दों में, सुप्रीम कोर्ट ने यह कह दिया कि “टैक्स लगाने का काम संसद का है, राष्ट्रपति का नहीं.”

भारतीय कंपनियों को मिल पाएगा रिफंड!

इस ऐतिहासिक फैसले के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि क्या भारत जैसे देशों से वसूले गए टैरिफ का पैसा वापस मिलेगा. कोर्ट के फैसले के बाद IEEPA के तहत लगाए गए सभी टैरिफ गैर-कानूनी हो गए हैं और अमेरिकी सीमा शुल्क विभाग (CBP) को अब इनकी वसूली बंद करनी होगी. हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि वे इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं या सेक्शन 301 और सेक्शन 122 जैसे अन्य कानूनों के तहत नए टैरिफ लगाने की कोशिश कर सकते हैं. उन्होंने यह धमकी भी दी है कि वे सभी पर एक समान 10 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ लगा सकते हैं. यानी व्यापार युद्ध पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि उसका कानूनी आधार बदल सकता है.

अमेरिका को पाई-पाई करनी होगी वापस!

रिफंड को लेकर स्थिति जटिल है. जानकारों के मुताबिक टैरिफ का पैसा सीधे तौर पर भारत सरकार को नहीं, बल्कि उन आयातकों को वापस मिल सकता है जिन्होंने अमेरिका में सामान बेचते समय यह टैक्स चुकाया था. यदि किसी भारतीय कंपनी ने अमेरिका में माल भेजा और वहां के कस्टम विभाग को टैरिफ का भुगतान किया, तो रिफंड का हकदार वही आयातक या कंपनी होगी.

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रिफंड की कोई सीधी और सरल प्रक्रिया नहीं है. कंपनियों को अमेरिकी अदालतों या सीमा शुल्क विभाग (CBP) में “प्रोटेस्ट” दाखिल करना होगा. अनुमान है कि अमेरिकी सरकार ने लगभग 200 से 260 अरब डॉलर तक की राशि इन टैरिफ के जरिए इकट्ठा की है. राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कहा है कि इतनी बड़ी रकम वापस करना “असंभव” और एक “बड़ा सिरदर्द” (Complete Mess) होगा.

भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत के लिए इस फैसले के मायने महत्वपूर्ण हैं. भारत की जो कंपनियां अमेरिका में स्टील, एल्युमीनियम या अन्य सामान भेज रही थीं और भारी टैरिफ दे रही थीं, उनके लिए अब वहां व्यापार करना सस्ता हो सकता है. हालांकि, यदि उन्होंने पूर्व में टैरिफ चुकाया है, तो पैसा वापस पाने के लिए उन्हें अमेरिकी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होगा, वकीलों की मदद लेनी होगी और यह साबित करना होगा कि उन्होंने शुल्क का भुगतान किया था. यह प्रक्रिया महीनों या सालों तक खिंच सकती है. कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने ट्रंप की टैरिफ नीति पर कानूनी रोक लगा दी है, लेकिन व्यापार और रिफंड को लेकर अनिश्चितता और कानूनी लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई है.

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