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भारत के लिए आपदा में अवसर बना ट्रंप का टैरिफ, चीन को निर्यात में रिकॉर्ड उछाल, अमेरिका अब भी सबसे बड़ी मार्केट

भारत ने ट्रंप द्वारा लगाए गए 50% टैरिफ की काट खोज ली है. भारत ने न सिर्फ अमेरिका के अलावा दूसरे बाजारों की तलाश की, बल्कि चीन को निर्यात में भी बढ़ोतरी कर ली है. वहीं ट्रंप की लाख कोशिशों के बावजूद अमेरिका अब भी भारत का सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. सरकार ने व्यापार घाटा कम करने का तरीका भी खोज लिया है.

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केंद्र की मोदी सरकार की नीतियों, कारोबार को लेकर बदले माहौल और भारत में बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग पर जोर का फायदा मिलता दिख रहा है. इसी का परिणाम है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा एकतरफा 50 प्रतिशत टैरिफ और पेनाल्टी लगाए जाने के बावजूद इकोनॉमी की हेल्थ पर कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है. सरकार ने इसकी काट खोज ली है. अमेरिका के अलावा वैकल्पिक बाजारों की तलाश और दूसरे देशों में निर्यात की बढ़ोतरी ने असर दिखाना शुरू कर दिया है. आपको बता दें कि बीते चार महीनों में चीन को होने वाले भारतीय निर्यात में सकारात्मक नतीजे मिलने लगे हैं. जी हां, चीन को होने वाले भारत के एक्सपोर्ट में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है.

आंकड़ों के मुताबिक, नवंबर 2025 में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में चीन को निर्यात में करीब 90 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. हालांकि, चीनी आयात और व्यापार घाटे को पाटना अब भी भारत के लिए बड़ी चुनौती है. इस लिहाज से देखें तो चालू वित्त वर्ष 2025-26 में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से अधिक रहने की संभावना है. वहीं ओवरऑल ट्रेड डेफिसिट की बात करें तो नवंबर में भारत का व्यापार घाटा घटकर 24.53 अरब डॉलर रह गया, जो पिछले साल इसी महीने में 31.92 अरब डॉलर था.

चीन को भारत के निर्यात में लगातार बढ़ोतरी

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चालू वित्त वर्ष में अब तक (अप्रैल-नवंबर 2025) भारत ने चीन से 84 अरब डॉलर का आयात किया है, जबकि इस अवधि में चीन को सिर्फ 12.22 अरब डॉलर का निर्यात किया गया है. व्यापार के जानकारों का कहना है कि भारत अपने चार प्रमुख सेक्टरइलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ऑर्गेनिक केमिकल्स और प्लास्टिककी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाकर व्यापार घाटे को काफी हद तक पाट सकता है.

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नवंबर में भारत के निर्यात में बढ़ोतरी, आयात में गिरावट

चीन के अलावा ओवरऑल एक्सपोर्ट की बात करें तो नवंबर में भारत का कुल निर्यात बढ़कर 73.99 अरब डॉलर हो गया है, जो पिछले साल समान अवधि में 64.05 अरब डॉलर था. वहीं आयात घटकर 80.63 अरब डॉलर रह गया, जबकि पिछले साल यह 81.1 अरब डॉलर था. सरकार ने कहा कि नवंबर का महीना वस्तु निर्यात के लिए अब तक का सबसे अच्छा महीना रहा है और इस दौरान 38.13 अरब डॉलर की वस्तुओं का निर्यात किया गया. वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के मुताबिक, नवंबर आयात-निर्यात के लिहाज से काफी अच्छा महीना रहा. सोने, कोयले और पेट्रोलियम के आयात में इस दौरान बड़ी कमी देखने को मिली है.

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इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, ऑर्गेनिक केमिकल्स और प्लास्टिक का आयात में 70-75% योगदान

भारत के चीन से होने वाले कुल आयात में इन चार सेक्टरों की हिस्सेदारी करीब 70-75 प्रतिशत तक है. सरकार ने लोकल मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा है. कोशिश है कि आईफोन से लेकर चिप, मोबाइल कंपोनेंट्स आदि का निर्माण भारत में ही हो. जो कंपनियां किसी भी वजह से चीन छोड़ना चाहती हैं, उन्हें भारत में कारोबार और निर्माण का ऑफर दिया जा रहा है, ताकि आयात बिल, टैक्स और ड्यूटी कम हो सके. फिलहाल मोबाइल कंपोनेंट्स, इंटीग्रेटेड सर्किट, लैपटॉप, सोलर सेल व मॉड्यूल, लिथियम-आयन बैटरी जैसे उत्पादों के लिए भारत काफी हद तक चीन पर निर्भर है.

चीन को भारत के निर्यात में 32% की बढ़ोतरी

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वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2025-26 में अब तक भारत से चीन को होने वाले निर्यात में पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 32 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि चीन से भारत में होने वाले आयात में करीब 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.

भारत के चीन से आयात में अब भी मोबाइल कंपोनेंट्स, केमिकल्स और प्लास्टिक सेक्टर का दबदबा बना हुआ है. सरकार घरेलू निर्माण बढ़ाकर अनावश्यक आयात बिल और व्यापार घाटा कम करने की दिशा में काम कर रही है.

कैलेंडर वर्ष 2025 (जनवरी-नवंबर) में चीन से भारत का आयात

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भारत का चीन से कुल आयात: 113 अरब डॉलर

चार सेक्टरों की इसमें करीब 80 प्रतिशत हिस्सेदारी है, यानी 113 अरब डॉलर में से लगभग 80 अरब डॉलर सिर्फ चार सेक्टरों से जुड़े हैं

इलेक्ट्रॉनिक्स-38 अरब डॉलर
मशीनरी-25 अरब डॉलर
ऑर्गेनिक केमिकल्स-11.5 अरब डॉलर
प्लास्टिक-6.3 अरब डॉलर

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इलेक्ट्रॉनिक्स आयात (38 अरब डॉलर) में शामिल प्रमुख उत्पाद

मोबाइल फोन कंपोनेंट्स-8.6 अरब डॉलर
इंटीग्रेटेड सर्किट 6.2 अरब डॉलर
लैपटॉप 4.5 अरब डॉलर
सोलर सेल व मॉड्यूल 3.0 अरब डॉलर
पैनल डिस्प्ले 2.6 अरब डॉलर
लिथियम-आयन बैटरी 2.3 अरब डॉलर
मेमोरी चिप 1.8 अरब डॉलर

यहां यह जानना जरूरी है कि लैपटॉप और पैनल डिस्प्ले जैसे उत्पादों का घरेलू उत्पादन जल्द ही रफ्तार पकड़ने वाला है. सेमीकंडक्टर चिप मैन्युफैक्चरिंग की रीढ़ माने जाने वाले वेफर्स के उत्पादन को लेकर भी बड़ी खुशखबरी है. अगले साल जनवरी से HCL और फॉक्सकॉन की साझेदारी में उत्तर प्रदेश में करीब 20,000 वेफर्स निर्माण क्षमता वाली यूनिट में उत्पादन शुरू हो जाएगा.

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यूपी देने जा रहा भारत के व्यापार घाटा को कम करने में योगदान!

 आपको बता दें कि यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बेहतर कानून-व्यवस्था, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और निवेश-अनुकूल नीतियों का ही परिणाम है कि एचसीएल और फॉक्सकॉन जैसी वैश्विक कंपनियां राज्य में निवेश के लिए आगे आई हैं. इस साझेदारी से न केवल तकनीकी विशेषज्ञता आएगी, बल्कि सेमीकंडक्टर स्किल डेवलपमेंट को भी बढ़ावा मिलेगा. अगर भारत के दूसरे राज्य भी गुजरात और यूपी जैसी निवेश को आकर्षित करने वाली नीति अपनाएं तो भारत को अपना व्यापार घाटा को कम करने में देर नहीं लगेगा.

यह परियोजना सिर्फ एक औद्योगिक निवेश नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश को भविष्य की वैश्विक तकनीक से जोड़ने वाला एक रणनीतिक कदम है. एचसीएल ग्रुप की चेयरपर्सन रोशनी नादर मल्होत्रा के अनुसार, केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद यमुना एक्सप्रेस-वे औद्योगिक विकास प्राधिकरण क्षेत्र में, जेवर एयरपोर्ट के पास यह इकाई स्थापित की जाएगी. करीब 3,706 करोड़ रुपये के निवेश से बनने वाली यह यूनिट उत्तर प्रदेश की पहली सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्टिंग सुविधा होगी.

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क्या है चिप निर्माण में वेफर्स की भूमिका?

इस यूनिट में हर माह 20,000 सिलिकॉन वेफर्स की प्रोसेसिंग की जाएगी, जिनसे बड़े पैमाने पर सेमीकंडक्टर चिप्स तैयार होंगी. सेमीकंडक्टर उद्योग में वेफर को चिप निर्माण की आधारशिला माना जाता है. एक वेफर से चिप के आकार और तकनीक के अनुसार सैकड़ों से लेकर हजारों माइक्रोचिप्स तैयार की जाती हैं. ऐसे में 20,000 वेफर्स की मासिक क्षमता का मतलब है कि यह यूनिट हर महीने लाखों से लेकर करोड़ों चिप्स के निर्माण से जुड़ी प्रक्रियाओं को अंजाम दे सकेगी. यह उत्पादन क्षमता भारत में डिस्प्ले ड्राइवर चिप्स की बढ़ती घरेलू मांग को पूरा करने में निर्णायक साबित होगी.

मोबाइल फोन निर्यात में भारत की बड़ी छलांग

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भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात चालू वित्त वर्ष की अप्रैल-नवंबर अवधि में सालाना आधार पर 38 प्रतिशत बढ़कर 31 अरब डॉलर हो गया है. इसकी बड़ी वजह प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम है, जिसने एप्पल जैसी वैश्विक दिग्गज कंपनियों को भारत में अपनी सप्लाई चेन शिफ्ट करने के लिए आकर्षित किया है.

पहले आठ महीनों में आईफोन का निर्यात करीब 14 अरब डॉलर रहा, जो कुल इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का 45 प्रतिशत से अधिक है. एप्पल की हालिया एक्सचेंज फाइलिंग के मुताबिक, वित्त वर्ष 25 में उसकी भारतीय इकाई की घरेलू बिक्री 9 अरब डॉलर तक पहुंच गई है. वहीं हर पांचवां आईफोन अब भारत में मैन्युफैक्चर और असेंबल हो रहा है. एप्पल की ग्लोबल प्रोडक्शन वैल्यू में भारत की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत हो चुकी है.

10 साल के अंदर भारत ने कर दिया इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन में कमाल!

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सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन 2014-15 में जहां करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये था, वहीं 2024-25 में बढ़कर लगभग 11.3 लाख करोड़ रुपये हो गया है. इसी अवधि में इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात 38,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 3.27 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया है.

पिछले पांच वर्षों में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों, खासकर मोबाइल फोन के क्षेत्र में तेजी से उभरकर एक बड़ा निर्यातक देश बन चुका है. हालांकि, इलेक्ट्रॉनिक्स से जुड़े कच्चे माल और मैन्युफैक्चरिंग मशीनरी के लिए भारत को अब भी काफी हद तक चीन पर निर्भर रहना पड़ रहा है. जानकारों का कहना है कि क्वालिटी कंट्रोल नियमों को सख्त किए जाने और घरेलू उत्पादन में आई तेजी की वजह से पिछले दो वर्षों में चीन से आने वाले कई उत्पादों के आयात में गिरावट जरूर दर्ज की गई है.

बीते चार महीनों में चीन को भारत का निर्यात (अरब डॉलर में)

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अगस्त 1.21
सितंबर 1.46
अक्टूबर 1.63
नवंबर 2.20

अमेरिका अब भी भारत के लिए सबसे बड़ी मार्केट

ट्रंप द्वारा 50 प्रतिशत टैरिफ लगाए जाने के बावजूद अमेरिका अब भी भारत के निर्यात के लिए सबसे बड़ा बाजार बना हुआ है. इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों जैसे उत्पाद, जो टैरिफ छूट के दायरे में आते हैं, उनके मजबूत निर्यात की वजह से अमेरिका को भारत का निर्यात पिछले साल की तुलना में और बढ़ा है.

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वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल के मुताबिक, टैरिफ के बावजूद भारत अमेरिकी बाजार में अपनी जगह बनाए हुए है. भारत अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ा रहा है, जो भारत-अमेरिका ट्रेड डील के लिए सकारात्मक संकेत है.

उनका कहना है कि नवंबर में अक्टूबर के नुकसान की भरपाई हो गई है और वित्त वर्ष के बाकी महीनों के लिए तस्वीर उम्मीद से बेहतर है. नवंबर में अमेरिका को निर्यात 1.3 अरब डॉलर, चीन को 1 अरब डॉलर रहा, जबकि स्पेन, यूएई और तंजानिया जैसे देशों का प्रदर्शन भी बेहतर रहा.

अप्रैल-नवंबर के दौरान भारत का प्रमुख निर्यात (अरब डॉलर में)

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अमेरिका 59.04
यूएई 25.49
नीदरलैंड 12.90
चीन 12.22
ब्रिटेन 8.93
जर्मनी 7.47

सरकार के मुताबिक, वित्त वर्ष 26 की शुरुआत से अब तक कुल संचयी निर्यात 562.13 अरब डॉलर रहा है, जबकि पिछले साल समान अवधि में यह 533 अरब डॉलर था. इस दौरान वस्तुओं का निर्यात 292 अरब डॉलर रहा. चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से नवंबर के दौरान अमेरिका, यूएई और नीदरलैंड भारत के शीर्ष निर्यात गंतव्य रहे, जबकि आयात के मामले में चीन, यूएई और रूस शीर्ष पर रहे.

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