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अमेरिका ने बढ़ाई टैरिफ की डेडलाइन, अब 1 अगस्त से लागू होंगे नए शुल्क

डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति वैश्विक व्यापार के परिदृश्य को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है. यह न केवल पारंपरिक व्यापार समझौतों की पुनर्व्याख्या कर रहा है, बल्कि देशों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि अमेरिका के साथ उनके व्यापारिक और राजनीतिक संबंध किस दिशा में जा रहे हैं. भारत के लिए यह एक निर्णायक मोड़ हो सकता है.

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New Tariffs will be Implemented From August: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक व्यापार पर दबाव बनाने की अपनी रणनीति को एक नया मोड़ देते हुए देश-विशिष्ट टैरिफ को अब 1 अगस्त से प्रभावी करने का फैसला किया है. इससे पहले यह टैरिफ 9 जुलाई से लागू होने वाले थे, लेकिन अमेरिका और उसके व्यापारिक साझेदार देशों के बीच चल रही तेज़ वार्ताओं को देखते हुए इसमें कुछ अस्थायी राहत दी गई है। इस घोषणा के साथ ही भारत समेत कई देशों को अल्पकालिक समय मिला है ताकि वे अमेरिका के साथ व्यापारिक शर्तों को अंतिम रूप दे सकें.

टैरिफ में देरी

अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने रविवार को मीडिया से बातचीत में यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति ट्रंप अभी तक टैरिफ दरों और सौदों को अंतिम रूप दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह निर्णय अमेरिका के लिए एक व्यापारिक लाभ के रूप में लिया गया है, जिससे अमेरिकी कंपनियों और उद्योगों को संरक्षित किया जा सके. ट्रंप ने खुद संवाददाताओं से कहा कि उन्हें उम्मीद है कि 9 जुलाई तक वे अधिकांश देशों के साथ या तो पत्राचार या समझौतों के माध्यम से बातचीत पूरी कर लेंगे. उन्होंने चेताया कि जो देश अमेरिका के साथ व्यापार करना चाहते हैं, उन्हें अमेरिकी नियमों के अनुसार ही चलना होगा.

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टैरिफ नीति का विस्तार: ट्रंप का "नोटिस भेजो" मॉडल

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राष्ट्रपति ट्रंप ने व्यापारिक वार्ताओं में देरी पर नाराज़गी जताते हुए कहा कि अब वक्त आ गया है कि अमेरिका सीधा संदेश भेजे या तो नियम मानो, या टैरिफ भुगतो. उन्होंने कहा, “15 अलग-अलग मुद्दों पर बैठकर चर्चा करने से बेहतर है कि हम एक सीधा नोटिस भेजें. अगर आप अमेरिका के साथ व्यापार करना चाहते हैं, तो आपको हमारी शर्तें माननी होंगी.” ट्रंप प्रशासन की ओर से अधिसूचना पत्र (टैरिफ वॉर्निंग नोटिस) सोमवार से देशों को भेजे जाने शुरू हो गए हैं.

नई दरें और संभावित असर

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अप्रैल में ट्रंप ने अमेरिका के अधिकांश व्यापारिक साझेदारों पर 10% बेस टैरिफ और इसके अतिरिक्त 50% तक की दर से शुल्क लगाने की घोषणा की थी. इस नई नीति के तहत अमेरिका ने यूनाइटेड किंगडम और वियतनाम के साथ व्यापार समझौते पहले ही कर लिए हैं, जबकि अन्य देशों के साथ वार्ताएं जारी हैं. ट्रंप प्रशासन के मुताबिक जो देश जल्दी सहमति नहीं बनाएंगे, वे 2 अप्रैल के टैरिफ स्तर पर वापस लौट जाएंगे.

भारत की स्थिति: वार्ता जारी, लेकिन ठोस समाधान नहीं

भारत का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल, जिसकी अगुवाई मुख्य वार्ताकार राजेश अग्रवाल कर रहे थे, हाल ही में अमेरिका गया था. यह प्रतिनिधिमंडल कृषि और डेयरी उत्पादों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा के लिए अमेरिका पहुंचा, लेकिन किसी अंतिम समझौते के बिना ही वाशिंगटन से लौट आया. अमेरिका इन क्षेत्रों में भारत से अधिक बाजार पहुंच की मांग कर रहा है, जबकि भारत घरेलू हितों की रक्षा को प्राथमिकता दे रहा है.

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ब्रिक्स पर सीधा वार: अतिरिक्त 10% टैरिफ की चेतावनी

ट्रंप ने साफ तौर पर कहा है कि जो देश ब्रिक्स समूह की अमेरिकी विरोधी नीतियों के साथ खुद को जोड़ते हैं, उन पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा. यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका अपनी व्यापारिक नीति को सिर्फ आर्थिक ही नहीं, बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक हथियार के रूप में भी इस्तेमाल कर रहा है. इस फैसले से ब्रिक्स के सदस्य देशों विशेषकर भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका  पर दबाव बढ़ेगा कि वे अमेरिका के प्रति अपनी स्थिति को पुनः परिभाषित करें.

वैश्विक व्यापार का नया युग

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डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति वैश्विक व्यापार के परिदृश्य को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है. यह न केवल पारंपरिक व्यापार समझौतों की पुनर्व्याख्या कर रहा है, बल्कि देशों को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि अमेरिका के साथ उनके व्यापारिक और राजनीतिक संबंध किस दिशा में जा रहे हैं. भारत के लिए यह एक निर्णायक मोड़ हो सकता है . या तो वह अमेरिका के दबाव में अपनी नीतियों में लचीलापन लाए, या एक स्वतंत्र और संतुलित व्यापार नीति के लिए वैकल्पिक साझेदारों की तलाश करे.

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