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प्लेन क्रैश में मुआवजा कौन देता है – एयरलाइंस, सरकार या बीमा कंपनी? जानें नियम और प्रक्रिया

अहमदाबाद में हुआ एयर इंडिया का यह हादसा देश और प्रभावित परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा सदमा है. लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ऐसी त्रासदियों में यात्रियों के अधिकार और एयरलाइन की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय हैं. मॉन्ट्रियल कन्वेंशन के तहत पीड़ितों को कानूनी मुआवजा मिलता है, ट्रैवल इंश्योरेंस एक अतिरिक्त कवच का काम करता है, और कभी-कभी सरकार भी राहत राशि देती है.

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Plane Crash Compensation: गुजरात के अहमदाबाद शहर से गुरुवार को एक बेहद दर्दनाक और भीषण विमान हादसे की खबर सामने आई. एयर इंडिया की एक अंतरराष्ट्रीय फ्लाइट, जो अहमदाबाद से लंदन जा रही थी, उड़ान भरने के कुछ समय बाद ही दुर्घटनाग्रस्त हो गई. इस विमान में कुल 242 लोग सवार थे, जिनमें पायलट और क्रू मेंबर भी शामिल थे. इस हादसे में अब तक 265 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हुई है.

ऐसे हादसों के बाद अक्सर यह सवाल उठता है कि मृतकों और घायलों को मुआवजा कैसे और किसके द्वारा दिया जाता है? क्या केवल एयरलाइन कंपनी यह मुआवजा देती है या सरकार भी इसमें योगदान करती है? इसके अलावा, यदि यात्रियों ने कोई बीमा कराया हो तो उसका क्या फायदा मिलता है? आइए, इन सभी पहलुओं को विस्तार से समझते हैं . 

मॉन्ट्रियल कन्वेंशन: मुआवजे की वैश्विक रूपरेखा

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विमान हादसों से जुड़े मुआवजे के मामलों में एक अंतरराष्ट्रीय संधि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जिसे मॉन्ट्रियल कन्वेंशन 1999 कहा जाता है। यह संधि अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के दौरान यात्रियों की मृत्यु, चोट या उनके सामान के नुकसान जैसी स्थितियों में एयरलाइन की जिम्मेदारी तय करती है. भारत ने भी इस कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए थे और 2009 में इसे पूरी तरह से अपनाया. इसका मतलब है कि भारत से चलने वाली सभी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें इस कानून के दायरे में आती हैं. इस कन्वेंशन के तहत, किसी विमान दुर्घटना में यदि यात्री की मृत्यु होती है, तो एयरलाइन कंपनी को मुआवजा देना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है.

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मुआवजे की राशि: कितनी मिलती है क्षतिपूर्ति

मॉन्ट्रियल कन्वेंशन के प्रावधानों के अनुसार, विमान दुर्घटना में मृत्यु होने पर यात्री के परिजनों को 1,28,821 स्पेशल ड्रॉइंग राइट्स (SDR) तक का मुआवजा मिल सकता है. SDR एक विशेष प्रकार की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा होती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा मान्यता प्राप्त है.

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भारतीय मुद्रा में इसका मूल्य लगभग 1.4 करोड़ रुपये होता है. यह राशि हर यात्री के लिए तय होती है, और स्थिति की गंभीरता के आधार पर इसे और अधिक बढ़ाया भी जा सकता है. इसके अलावा, यदि कोई यात्री गंभीर रूप से घायल होता है, तो उसे भी इलाज के खर्च और मानसिक/शारीरिक पीड़ा के आधार पर मुआवजा दिया जाता है.

ट्रैवल इंश्योरेंस: अतिरिक्त सुरक्षा और सहायता

कई यात्री यात्रा के दौरान ट्रैवल इंश्योरेंस कराते हैं, जो दुर्घटना की स्थिति में एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच प्रदान करता है। यदि किसी यात्री की विमान हादसे में मृत्यु हो जाती है और उसने यात्रा से पहले ट्रैवल इंश्योरेंस लिया हो, तो उसके परिजनों को 25 लाख से 1 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त मुआवजा मिल सकता है.

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इसके अलावा, यदि यात्री दुर्घटना में घायल होता है तो उसे 5 से 10 लाख रुपये तक की राशि मिल सकती है. इतना ही नहीं, अस्पताल में भर्ती होने पर बीमा कंपनियां डेली हॉस्पिटल अलाउंस भी देती हैं, जिससे इलाज के दौरान होने वाले खर्चों में राहत मिलती है.

सरकारी मुआवजा: कब और कैसे मिलता है सहयोग

अब सवाल उठता है कि क्या सरकार भी ऐसे हादसों में मुआवजा देती है? सामान्य तौर पर विमान दुर्घटनाओं में सरकार सीधे तौर पर मुआवजा नहीं देती. एयरलाइन ही ऐसी परिस्थितियों में कानूनी रूप से उत्तरदायी होती है.

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हालांकि, यदि हादसा राष्ट्रीय आपदा की श्रेणी में आता है या विशेष रूप से व्यापक और गंभीर होता है, तो सरकार मानवीय आधार पर सहायता के रूप में मुआवजे की घोषणा कर सकती है. यह सरकार का विवेकाधिकार होता है और इसका कोई तय नियम नहीं होता, लेकिन अतीत में कई बड़े हादसों में केंद्र या राज्य सरकारों ने पीड़ित परिवारों को आर्थिक सहायता दी है.

अहमदाबाद में हुआ एयर इंडिया का यह हादसा देश और प्रभावित परिवारों के लिए एक बहुत बड़ा सदमा है. लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट है कि ऐसी त्रासदियों में यात्रियों के अधिकार और एयरलाइन की जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से तय हैं. मॉन्ट्रियल कन्वेंशन के तहत पीड़ितों को कानूनी मुआवजा मिलता है, ट्रैवल इंश्योरेंस एक अतिरिक्त कवच का काम करता है, और कभी-कभी सरकार भी राहत राशि देती है. इसलिए, अंतरराष्ट्रीय यात्रा पर जाते समय यात्रियों को ट्रैवल इंश्योरेंस जरूर कराना चाहिए और यह जानना चाहिए कि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति में उनके अधिकार क्या हैं. ऐसे हादसे भले ही रोके न जा सकें, लेकिन उनके बाद की प्रक्रियाएं पीड़ितों और उनके परिवारों को थोड़ी राहत जरूर पहुंचा सकती हैं. 

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