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रेलवे खुद करेगी बिजली उत्पादन, ट्रैकों के बीच लगेंगे सोलर पैनल, जानिए क्यों लिया यह बड़ा कदम

भारतीय रेलवे की यह पहल दिखाती है कि अब वह सिर्फ यात्रियों को बेहतर सुविधा देने पर ही नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के जरिए भविष्य के लिए टिकाऊ समाधान भी तलाश रहा है. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो देशभर में रेलवे न सिर्फ ट्रेनों को चला पाएगा, बल्कि अपनी खुद की हरित बिजली बनाकर ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है.

IMAGE CREDIT: RAILWAY
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Indian Railway: भारतीय रेलवे देश की सबसे बड़ी परिवहन सेवा है, जो हर दिन लाखों यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती है. चाहे पैसेंजर ट्रेन हो या मालगाड़ी, हर तरह की ट्रेनें देश के अलग-अलग हिस्सों में चलती हैं. रेलवे ने हमेशा यात्रियों की सुविधा का ध्यान रखा है, आरामदायक सीटें, एसी कोच, शौचालय और अन्य सुविधाएं सफर को आसान बनाती हैं. इतना ही नहीं, रेलवे समय-समय पर नए ट्रैक बिछाता है, नए ब्रिज बनाता है और तकनीकी सुधार करता रहता है. इसी दिशा में अब एक और बड़ा और अनोखा कदम उठाया गया है, रेलवे ट्रैक के बीच सोलर पैनल लगाना.

कहां लगाए गए हैं ये सोलर पैनल?

रेलवे की यह नई पहल बनारस रेल इंजन कारखाना (BLW) में शुरू की गई है. यहां 70 मीटर लंबे ट्रैक के बीच में 28 सोलर पैनल लगाए गए हैं. ये पैनल रेल पटरियों के बीच की खाली जगह में फिट किए गए हैं. सबसे खास बात यह है कि ये रिमूवेबल सोलर पैनल हैं, यानी जब भी ज़रूरत हो, इन्हें हटाया जा सकता है और दोबारा लगाया जा सकता है. इस वजह से ये रेलवे के सामान्य संचालन में कोई रुकावट नहीं डालते.

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कितनी बिजली बनेगी इन सोलर पैनल से?

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रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, इस प्रोजेक्ट में जो सोलर पैनल लगाए गए हैं, उनसे करीब 15 किलोवॉट बिजली पैदा की जाएगी. यह बिजली रेलवे इंजन या कारखाने की दूसरी जरूरतों को पूरा करने में काम आएगी. यानी अब रेलवे खुद अपनी जरूरत की बिजली बना पाएगा, वो भी पर्यावरण के अनुकूल तरीके से.

रेलवे को क्या होगा फायदा?

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अब तक रेलवे को अपनी ट्रेनों और इंजन को चलाने के लिए बाहर से बिजली खरीदनी पड़ती थी, जिससे रोज़ाना करोड़ों रुपये का खर्च आता था. लेकिन इस तरह के सोलर पैनल लगाकर रेलवे धीरे-धीरे अपनी खुद की बिजली पैदा करेगा. इससे न सिर्फ खर्च कम होगा, बल्कि यह पर्यावरण की भी रक्षा करेगा. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो आने वाले समय में इसे देशभर के रेलवे ट्रैकों पर लागू किया जा सकता है.

आसानी से हटाए जा सकते हैं पैनल

क्योंकि रेलवे ट्रैकों पर अक्सर मरम्मत या काम होते रहते हैं, इसलिए यह जरूरी था कि इन सोलर पैनल को जरूरत पड़ने पर आसानी से हटाया जा सके. एक पैनल का आकार लगभग 2278×1133×30 मिमी है और इसका वजन लगभग 32 किलो है. यानी कुछ कर्मचारियों की मदद से इन पैनल को कुछ घंटों में हटाया या दोबारा लगाया जा सकता है.इससे रेलवे के काम में कोई रुकावट नहीं आती.

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रेलवे की ऊर्जा में आत्मनिर्भरता की ओर कदम

भारतीय रेलवे की यह पहल दिखाती है कि अब वह सिर्फ यात्रियों को बेहतर सुविधा देने पर ही नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा के जरिए भविष्य के लिए टिकाऊ समाधान भी तलाश रहा है. अगर यह प्रयोग सफल होता है, तो देशभर में रेलवे न सिर्फ ट्रेनों को चला पाएगा, बल्कि अपनी खुद की हरित बिजली बनाकर ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है.

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