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Indian Railway: ट्रेन में क्यों नहीं मिलती मर्जी की सीट, आइए जानें क्या है रेलवे के रूल

Indian Railway: अधिकतर लोग कम सफर की दुरी को ट्रैन के सफर से ही पूरा करते है। ट्रेन की टिकट फ्लाइट की टिकट के मुकाबले सस्ती होती है। लेकिन वहीं फ्लाइट और ट्रेन की सुविधा में थोड़ा अंतर होता है।

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Indian Railway: भारतीय रेलवे रोजाना कई करोड़ लोगो को एक साथ सफर करवाती है। रेलवे यात्री को बहुत सी सहूलियत दी जाती है ,जिससे उनको किसी प्रकार का कष्ट न हो। यात्रियों की यात्रा को आरामदायक करने के लिए बहुत सारी सुविधाएं दी है।अधिकतर लोग कम सफर की दुरी को ट्रैन के सफर से ही पूरा करते है। ट्रेन की टिकट फ्लाइट की टिकट के मुकाबले सस्ती होती है। लेकिन वहीं फ्लाइट और ट्रेन की सुविधा में थोड़ा अंतर होता है।फ्लाइट की टिकट बुक करते वक्त आपको अपनी मर्जी की सीट बुक करने का अधिकार होता है वहीं रेलवे में ऐसा नहीं होता। आखिर क्या है इसके पीछे का कारण, आप क्यों नहीं लें सकते ट्रेन में अपनी मर्जी की सीट , आइये जानें क्यों 

सॉफ्टवेयर करता है अपने हिसाब से सेट बुक 

रेलवे में सॉफ्टवेयर के हिसाब से होती है सीट बुक।क्योकि रेलवे द्वारा ट्रेन की सुरक्षा पहली प्राथमिकता होती है। ट्रेन की बहुत ज्यादा स्पीड होती है उस स्पीड को मैनेज करना जरुरी होता है। और इसलिए जब भी कोई सीट बुक करता है तो कोच के  बीच की सीट सॉफ्टवेयर पहले बुक करता है। ताकि दोनों साइड का बैलेंस बना रहे है।वहीं इसके बाद दोनों साइट और आगे की पीछे की सीट बुक होती ही।वहीं अगर यात्रियों के बैठने के हिसाब से तो लोअर बर्थ की सीट बुक होती है।यही मुख्य कारण है की रेलवे के यात्रियों को फ्लाइट की तरह सीट बुक करने का  विकल्प नहीं होता। 

ये सीट बुक पहले से ही होती है तय

रेलवे में सीट की बुकिंग के दौरान जो सॉफ्टवेयर काम करता है वो पहले से ही एल्गोरिदम पर काम करता है।  यात्री जब भी ट्रेन में पहली बुकिंग करते है तो उनकी सीट मिडिल ही बुक होती है।  इस तरीके से सभी ट्रेन में इसी तरह बुकिंग होती है।  ताकि ट्रेन का बैलेंस बना रहे। 

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सेंटर फाॅर्स का रखना होता है ध्यान 

ट्रेन बुकिंग सॉफ्टवेयर इस तरह से सीट बुक करता है ,जिससे सीट का वजन बराबर होता है।  वहीं अगर ट्रेन में अल्फाबेटिकल आर्डर से बुकिंग होगी तो फिर ट्रेन के पहले कोच में ज्यादा यात्री होंगे, फिर उसके आगे वाले ,फिर ऐसे ही सीरियल वाइज यात्री बढ़ते जाएंगे।    

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