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सिर्फ ऑनलाइन नहीं, अब ऑफलाइन भी खतरा! बिना नेट के भी हो सकते हैं साइबर फ्रॉड के शिकार

साइबर ठगी अब सिर्फ "तकनीक" का खेल नहीं रहा, यह मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रणनीति बन गई है. अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ लोगों के डर, लालच और भोलेपन का फायदा उठाते हैं. ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम खुद भी जागरूक बनें और अपने परिवार, विशेषकर बुजुर्गों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इस बारे में शिक्षित करें.

सिर्फ ऑनलाइन नहीं, अब ऑफलाइन भी खतरा! बिना नेट के भी हो सकते हैं साइबर फ्रॉड के शिकार
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Digital Fraud: आज का युग डिजिटल क्रांति का है. जहां एक ओर इंटरनेट ने जीवन को आसान और तेज़ बनाया है, वहीं दूसरी ओर इसके माध्यम से अपराधियों ने ठगी और धोखाधड़ी को भी पहले से अधिक चतुर और खतरनाक बना दिया है. बीते कुछ वर्षों में साइबर क्राइम के मामलों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी देखी गई है,. ठग अब केवल सोशल मीडिया पर या इंटरनेट यूज़ करने वाले लोगों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अब वे बिना इंटरनेट यूज़ करने वाले लोगों को भी आसानी से शिकार बना रहे हैं.

आपने सुना होगा कि किसी व्यक्ति को “डिजिटल अरेस्ट” का डर दिखाकर उसके बैंक अकाउंट से लाखों रुपये ठग लिए गए. या फिर नकली पुलिस या सीबीआई अफसर बनकर किसी को कॉल किया गया और उसकी निजी जानकारी का दुरुपयोग कर लिया गया. सवाल यह उठता है कि जब कोई व्यक्ति इंटरनेट का इस्तेमाल ही नहीं करता, तो उसके बारे में इतनी सारी जानकारियाँ ठगों तक कैसे पहुंच जाती हैं? जवाब चौंकाने वाला है.

 ठग कैसे ढूंढते हैं आपका डेटा, वो भी बिना इंटरनेट के?

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अगर आपको लगता है कि आपने इंटरनेट यूज़ नहीं किया, तो आप सुरक्षित हैं तो ये आपकी सबसे बड़ी भूल हो सकती है। ठगों के पास अब कई ऐसे रास्ते हैं जिनके माध्यम से वे किसी का भी निजी डेटा जुटा सकते हैं। कई बार यह डेटा लीक होता है:

सरकारी दफ्तरों, अस्पतालों, राशन कार्ड केंद्रों, या फिर बायोमेट्रिक डाटा रजिस्ट्रेशन जैसी जगहों से.

रिटेल दुकानों, मोबाइल सिम कार्ड विक्रेताओं या छोटी ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों से जो डेटा सुरक्षा का पालन नहीं करते.और हैरानी की बात यह है कि कई बार आपका डेटा आपके किसी जानने वाले के फोन से भी निकल जाता है.

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आपने कभी न कभी किसी दोस्त या रिश्तेदार को अपने नंबर या पते की जानकारी दी होगी—और वही जानकारी अनजाने में किसी ऐप या वेबसाइट के ज़रिए लीक हो जाती है. 

इन्हीं जानकारियों को आधार बनाकर ठग आपको फोन करते हैं, आपका नाम, पता, परिवार की जानकारी बताते हैं.और आप भ्रमित होकर उनकी बातों में आ जाते हैं .

कैसे रखें खुद को इस डिजिटल ठगी से सुरक्षित? जानिए अहम उपाय

आज के दौर में यह ज़रूरी है कि चाहे आप इंटरनेट इस्तेमाल करें या नहीं, आपको साइबर सुरक्षा की बुनियादी समझ जरूर हो.नीचे कुछ बेहद जरूरी सावधानियां दी गई हैं, जो हर नागरिक को अपनानी चाहिए:

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1. मजबूत पासवर्ड और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन

अगर आप ईमेल या किसी ऑनलाइन सर्विस का इस्तेमाल करते हैं, तो पासवर्ड को कभी अपनी जन्मतिथि, मोबाइल नंबर या नाम से न रखें। हमेशा अल्फ़ाबेट, नंबर और स्पेशल कैरेक्टर का कॉम्बिनेशन इस्तेमाल करें। साथ ही, जहां भी संभव हो टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (2FA) जरूर ऑन रखें

2. अनजान लिंक, कॉल और मैसेज से रहें सावधान

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अगर किसी अनजान नंबर से फोन आता है, जिसमें कोई अधिकारी बनकर आपसे आधार, बैंक डिटेल या अन्य जानकारी मांगता है, तो तुरंत कॉल काटें और नजदीकी पुलिस स्टेशन या साइबर हेल्पलाइन पर रिपोर्ट करें। कोई लिंक या अटैचमेंट बिना पुष्टि के कभी न खोलें.

3. फोन और ऐप्स को रखें अपडेटेड

अपने मोबाइल फोन का ऑपरेटिंग सिस्टम और सिक्योरिटी फीचर्स हमेशा अपडेट रखें. कई बार पुराने सिस्टम में सुरक्षा खामियां होती हैं, जिनका फायदा उठाकर हैकर्स हमला करते हैं.

4. अपने डेटा पर रखें नियंत्रण

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बैंकों, अस्पतालों, दुकानों, या किसी वेबसाइट पर अपनी जानकारी देने से पहले यह जरूर सोचें क्या यह ज़रूरी है? क्या यह सुरक्षित है? जहां जरूरत न हो, वहां अपना आधार नंबर या मोबाइल न दें.

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साइबर ठगी अब सिर्फ "तकनीक" का खेल नहीं रहा, यह मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रणनीति बन गई है. अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ लोगों के डर, लालच और भोलेपन का फायदा उठाते हैं. ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम खुद भी जागरूक बनें और अपने परिवार, विशेषकर बुजुर्गों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को इस बारे में शिक्षित करें.सरकार द्वारा उपलब्ध साइबर हेल्पलाइन 1930 या cybercrime.gov.in जैसे प्लेटफॉर्म्स पर तुरंत शिकायत दर्ज कर सकते हैं. याद रखें – एक छोटी सी सतर्कता आपको बड़ी ठगी से बचा सकती है.

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