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कोर्ट में छलका पत्नी का दर्द... पति नहीं बनाता शारीरिक संबंध, जानें मामले में अदालत ने क्या सुनाया फैसला?

महाराष्ट्र के पुणे में एक महिला ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसके पति ने कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाए और रिश्ता सिर्फ नाम का रह गया. कई साल तक सुधार की कोशिश नाकाम रहने पर वह कोर्ट पहुंची. सुनवाई के दौरान पति ने भी आरोप स्वीकार कर लिया.

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महाराष्ट्र के पुणे से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने वैवाहिक रिश्तों को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है. पुणे की पारिवारिक अदालत में एक महिला ने अपनी शादी को रद्द करने की मांग की, यह कहते हुए कि उसका पति शादी के बाद कभी भी उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने को तैयार नहीं हुआ. मामला इतना गंभीर था कि दोनों पक्षों की सहमति के बाद अदालत ने विवाह को निरस्त घोषित कर दिया.

शादी के बाद बदले हालात

जानकारी के अनुसार, यह विवाह पंजीकृत रूप से हुआ था और दोनों परिवार इस रिश्ते से बेहद खुश थे. शादी के बाद दुल्हन अपने ससुराल पहुंची और उसने सामान्य वैवाहिक जीवन की उम्मीद की. शुरुआत में पत्नी को लगा कि शायद पति स्वभाव से शर्मीला है और कुछ समय बाद सब ठीक हो जाएगा. लेकिन हफ्तों से महीनों और फिर सालों का समय बीतता गया, हालात जस के तस बने रहे.

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पत्नी ने कोर्ट में रखी अपनी बात

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पत्नी ने अदालत को बताया कि शादी के बाद उन्होंने पति-पत्नी की तरह साथ रहने की कई कोशिशें कीं, लेकिन पति हमेशा दूरी बनाता रहा. उसका आरोप था कि विवाह के बाद एक बार भी शारीरिक संबंध स्थापित नहीं हुआ. पत्नी का कहना था कि उसने रिश्ते को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन जब कोई बदलाव नहीं आया तो उसे कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा.

पति ने स्वीकार किया सच

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सुनवाई के दौरान सबसे अहम मोड़ तब आया, जब पति ने लिखित बयान में स्वीकार किया कि उसने अपनी पत्नी के साथ कभी शारीरिक संबंध नहीं बनाए. उसने यह भी माना कि वैवाहिक संबंध सामान्य रूप से स्थापित नहीं हो पाए. जब दोनों पक्षों के बीच तथ्यों को लेकर कोई विवाद नहीं बचा, तो अदालत ने मामले को गंभीरता से लिया. अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधानों का सहारा लिया. इस कानून के तहत यदि विवाह के बाद दांपत्य संबंध स्थापित नहीं होते और स्थिति स्पष्ट रूप से साबित हो जाती है, तो विवाह को निरस्त किया जा सकता है. ऐसे मामलों में लंबी गवाही और विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता नहीं होती, खासकर तब जब दोनों पक्ष सहमत हों.

जज का फैसला

मामले की सुनवाई कर रहे जज बी. डी. कदम ने सभी तथ्यों और दोनों पक्षों के बयानों पर विचार किया. अदालत ने पाया कि यह विवाह केवल कागजों तक सीमित रह गया था और वैवाहिक जीवन का मूल उद्देश्य पूरा नहीं हो पाया. इसी आधार पर विवाह को विधिक रूप से निरस्त घोषित कर दिया गया.

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बताते चलें कि यह फैसला समाज के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी है. विवाह केवल एक सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों और भावनात्मक जुड़ाव का रिश्ता है. यदि उसमें मूल तत्व ही अनुपस्थित हों, तो कानून पीड़ित पक्ष को राहत देने का अधिकार देता है. पुणे कोर्ट का यह निर्णय बताता है कि न्याय व्यवस्था व्यक्तिगत अधिकारों और गरिमा की रक्षा के लिए सजग है.

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