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कट्टरपंथियों की धमकी और प्रदर्शनों की चेतावनी के आगे नहीं झुका ये मुस्लिम देश, बुर्का और हिजाब पर लगा दी पाबंदी
दुनिया में बढ़ती सुरक्षा चिंताओं और धार्मिक कट्टरता की बहस के बीच मध्य एशिया के एक देश ने बड़ी पहल की है. कट्टरपंथियों के आगे न झुकते हुए इस देश ने साफ तौर पर बुर्के और हिजाब पर पाबंदी लगा दी है.
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मध्य एशिया का देश, करीब 2.03 करोड़ की आबादी, करीब 70% मुसलमान, नाम कजाकिस्तान; फिर भी इस देश ने हाल में जो फैसला लिया है उसकी चर्चा पूरी दुनिया में हो रही है. इसे कट्टरपंथियों के मुंह पर तमाचे की तरह लिया जा रहा है. ऐसे में ये कहना गलत न होगा कि जिस देश में मुसलमान अल्पसंख्यक हैं वो ऐसा कड़क और बड़ा फैसला लेने से हिचकते हैं लेकिन इस मुस्लिम देश ने कर दिखाया है.
दरअसल कजाकिस्तान ने हाल ही में सार्वजनिक स्थानों पर बुर्का, हिजाब और नकाब जैसे चेहरा ढकने वाले परिधानों पर प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक फैसला लिया है. इस कानून पर राष्ट्रपति कासिम-जोमार्ट टोकायेव ने 30 जून 2025 को हस्ताक्षर किए, जिसके बाद यह तत्काल प्रभाव से लागू हो गया. इस कदम ने न केवल कजाकिस्तान बल्कि वैश्विक स्तर पर भी तीखी बहस छेड़ दी है कि कैसे इस देश ने कल्पना से परे कट्टरपंथ को सीधी चुनौती दी है और महिला स्वतंत्रता के नाम पर एक क्रांतिकारी फैसला लिया है.
सरकार ने साफ़ कह दिया है कि अब चेहरा ढकना जरूरी नहीं, बल्कि अब ये कानून के खिलाफ है. यानी अब सार्वजनिक जगहों पर बुर्का, हिजाब या नकाब पहनने पर रोक लगा दी गई है. सरकार का मानना है कि ये सिर्फ किसी के पहनावे या धार्मिक मान्यता का मुद्दा नहीं है, बल्कि ये देश की सुरक्षा और समाज की पहचान से जुड़ा मामला है.
अब चेहरा ढकना कोई निजी पसंद नहीं, बल्कि सार्वजनिक असुविधा माना जा रहा है. कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोमार्ट टोकायेव ने कहा कि हम अपने देश में समानता और खुलेपन को बढ़ावा देना चाहते हैं. नकाब जैसे पहनावे हमारी असली पहचान नहीं हैं, ये बाहर से आई सोच है. उनके मुताबिक, हिजाब कोई जरूरी धार्मिक आदेश नहीं है, बल्कि एक सामाजिक परंपरा है, जिसे समय के साथ कट्टरपंथियों ने जबरदस्ती लागू कर दिया.
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2017 में स्कूलों में हिजाब बैन किया गया था
इस क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत 2017 में स्कूलों में हिजाब बैन के साथ हुई थी. फिर 2023 में ये बैन शिक्षकों और स्कूल स्टाफ पर भी लागू कर दिया गया. हालांकि इस फैसले का विरोध भी हुआ—कई छात्राओं ने पढ़ाई छोड़ दी. लेकिन सरकार ने पीछे हटने से इनकार कर दिया. कजाकिस्तान में हाल के सालों में धार्मिक कट्टरता का दबाव बढ़ा, खासतौर पर महिलाओं पर. लेकिन अब सरकार ने साफ कर दिया है—‘धर्म’ के नाम पर आज़ादी पर पहरा नहीं चलेगा. ये सिर्फ एक क़ानूनी फैसला नहीं, बल्कि कट्टरपंथ पर सीधी चोट है. एक ऐसा संदेश, जो पूरे क्षेत्र में गूंजेगा—कि अब महिलाओं की आज़ादी को ‘परंपरा’ के नाम पर कैद नहीं किया जा सकता.
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क्या है कानून में?
नए कानून के तहत, कजाकिस्तान में सार्वजनिक स्थानों जैसे सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, सार्वजनिक परिवहन, रेस्तरां और दुकानों पर चेहरा पूरी तरह ढकने वाले कपड़े पहनना प्रतिबंधित है. सरकार का तर्क है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है. जानकारी के मुताबिक ये फैसला कट्टरपंथ को रोकने और सामाजिक एकरूपता बनाए रखने के लिए लिया गया है. कहा तो ये भी जा रहा है कि कानून का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना भी देना होगा. हालांकि इसको लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है.
कजाकिस्तान की डेमोग्राफी
कजाकिस्तान की कुल आबादी का लगभग 70% हिस्सा मुस्लिम है, जबकि 25% ईसाई और शेष बौद्ध, यहूदी, हिंदू और नास्तिक हैं. देश ने हमेशा अपनी धर्मनिरपेक्ष पहचान को बनाए रखने पर जोर दिया है, और यह कदम उसी दिशा में देखा जा रहा है. सरकार का कहना है कि चेहरा ढकने वाले परिधान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं, क्योंकि इससे पहचान की पहचान करना मुश्किल हो जाता है.
क्या है बुर्के का इतिहास?
बुर्का एक अरबी शब्द है, जिसका उपयोग सातवीं शताब्दी से होता आया है. इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब के अनुसार, इस्लाम में पर्दे की प्रथा पैगंबर मोहम्मद के समय से शुरू हुई, हालांकि प्रारंभ में अरब सभ्यता में महिलाओं को काफी स्वतंत्रता थी. समय के साथ यह प्रथा मध्य एशिया और अन्य क्षेत्रों में फैली.
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कजाकिस्तान पहला मुस्लिम देश नहीं है जिसने बुर्का पर प्रतिबंध लगाया है. यूरोप में फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड, बुल्गारिया और स्विट्जरलैंड जैसे देश पहले ही सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले परिधानों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं. स्विट्जरलैंड में 2021 के जनमत संग्रह में 51.21% लोगों ने बुर्का बैन के पक्ष में वोट किया था, जिसके बाद वहां यह कानून लागू हुआ.