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भारत के इकलौते ज्वालामुखी में विस्फोट, अंगारो के बीच धुंआ-धुंआ हुआ आसमान, देखें वीडियो

भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया का इकलौता ज्वालामुखी बैरन द्वीप एक बार फिर सक्रिय हो गया है. तीन साल बाद एक बार फिर हुए विस्फोट ने चिंता बढ़ा दी है. देखें वीडियो

@cse_aspirantss
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अंडमान एंड निकोबार के पास एक अजीबो-गरीब घटना घटी है. भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया का इकलौता ज्वालामुखी बैरन द्वीप एक बार फिर सक्रिय हो गया है. राजधानी पोर्ट ब्लेयर से करीब 135-140 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित ज्वालामुखी में करीब 3 साल बाद विस्फोट हुआ है. वैसे ज्वालामुखी 5 से 10 साल में प्रमुख चक्र के साथ फटता है, लेकिन हाल के सालों में यह ज्यादा सक्रिय हुआ है. क्या हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय बैरन द्वीप ज्वालामुखी का फटना खास है? आइए जानते हैं.

अंडमान एंड निकोबार में भारत ही नहीं बल्कि दक्षिण एशिया का इकलौता ज्वालामुखी बैरन द्वीप एक बार फिर सक्रिय हो गया है. राजधानी पोर्ट ब्लेयर से करीब 135-140 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में स्थित ज्वालामुखी में करीब 3 साल बाद विस्फोट हुआ है. आमतौर पर ज्वालामुखी 5 से 10 साल में प्रमुख चक्र के साथ फटता है, लेकिन हाल के दशक में यह ज्यादा एक्टिव हुआ है. क्या हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय बैरन द्वीप ज्वालामुखी का फटना खास है? आइए जानते हैं.

बैरन द्वीप ज्वालामुखी में फिर विस्फोट 

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बैरन द्वीप ज्वालामुखी 2018 से लगातार एक्टिव है. यहां 2018, 2019, 2022 और 2024 में विस्फोट दर्ज किए गए थे. ताजा विस्फोट 2022 के बाद पहली बार हुआ है. इस महीने 13 और 20 सितंबर को दो मध्यम विस्फोट हुए, जबकि 2024 के अंत में हल्के विस्फोट देखे गए थे. विशेषज्ञों के मुताबिक, फिलहाल ज्वालामुखी की गतिविधि घट रही है और इस बार लावा कम जबकि धुआं ज्यादा देखा गया.

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140 साल तक ज्वालामुखी रहा था शांत 

बैरन ज्वालामुखी का पहला विस्फोट 1737 में दर्ज हुआ, दूसरा 1852 में. इसके बाद यह करीब 140 साल शांत रहा और 1991 में फिर सक्रिय हुआ. 2017 में 17 साल बाद यहां बड़ा विस्फोट हुआ. 2005 का विस्फोट हिंद महासागर में 2004 के भूकंप से जुड़ा माना जाता है.

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बैरन द्वीप: निर्जन लेकिन खतरनाक

बैरन द्वीप पर न इंसान रहते हैं और न ही स्थायी जंतु. यहां सिर्फ चट्टानें और राख नजर आती हैं. यह द्वीप करीब 3 किमी क्षेत्रफल में फैला है और समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 354 मीटर है. निर्जन होने के कारण ज्वालामुखी विस्फोट से मानव जीवन को सीधा खतरा नहीं है, लेकिन 1991 के बड़े विस्फोट से यहां पाई जाने वाली 16 पक्षी प्रजातियों में से 6 खत्म हो गई थीं. चूंकि यह ज्वालामुखी समुद्र में है, इसलिए इसके विस्फोट समुद्री जीवों के लिए खतरनाक हो सकते हैं और कभी-कभी भूकंप भी पैदा कर सकते हैं.

इस बार का विस्फोट कितना जोरदार था?

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पिछली बार विस्फोट में धुआं बादलों में 2.1 किमी ऊंचाई तक पहुंचा था और पूर्वोत्तर की तरफ फैला था. इस बार हुए विस्फोट में हल्का लावा और धुआं देखा गया, जो मध्यम दर्ज किया गया. वोल्केनिक एक्सप्लोसिविटी इंडेक्स (VEI) पर ज्यादातर विस्फोट VEI 2 के स्तर के रहे, जैसा कि 2017 में हुआ था. अब तक कोई बड़ा विस्फोट (VEI 4+) दर्ज नहीं हुआ है. भारत की संबंधित एजेंसियां ज्वालामुखी की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए हैं.

ज्वालामुखी विस्फोट कैसे होता है?

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ज्वालामुखी विस्फोट एक जटिल भूगर्भीय प्रक्रिया है, जो पृथ्वी की आंतरिक गतिविधियों, टेक्टोनिक प्लेट्स और मैग्मा की गति पर निर्भर करती है. पृथ्वी की सतह के नीचे उच्च तापमान की वजह से चट्टानें पिघलकर मैग्मा बन जाती हैं. कम घनत्व वाले इस मैग्मा का प्रवाह ऊपर की ओर होता है और यह मैग्मा चैंबर (सतह से 1–10 किमी गहराई में) में जमा होता है. जब मैग्मा चैंबर में गैस और मैग्मा का दबाव अत्यधिक बढ़ जाता है, तो चट्टानें टूटती हैं और मैग्मा सतह पर फूट पड़ता है.

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