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महुआ चुनने की आग से धधक रहे झारखंड के जंगल, हाथियों के भटकने का खतरा बढ़ा

हजारीबाग, चतरा और लातेहार के जंगलों से भी आग लगने की लगातार खबरें मिल रही हैं. आंकड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में झारखंड के वनों में आग लगने की घटनाओं में लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. मार्च और अप्रैल के महीने इस दृष्टि से सबसे संवेदनशील माने जाते हैं.

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गर्मी की दस्तक के साथ ही झारखंड के जंगलों में आग लगने की घटनाएं विकराल रूप लेने लगी हैं. बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग, चतरा, पश्चिमी सिंहभूम और लोहरदगा सहित कई जिलों के वन क्षेत्रों में महुआ चुनने के दौरान लगाई गई आग अब बेकाबू होकर घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों तक फैलती जा रही है. 

महुआ चुनने के लिए लगाई जा रही आग से धधक रहे झारखंड के जंगल

इससे वन विभाग की चिंता बढ़ गई है और वन पारिस्थितिकी पर गंभीर खतरा मंडराने लगा है. बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड स्थित लुगू बुरु के जंगलों में लगी आग ने वन विभाग की परेशानी बढ़ा दी है. यह इलाका करीब 40 जंगली हाथियों का प्राकृतिक अधिवास माना जाता है. वन विभाग के डीएफओ संदीप शिंदे ने आशंका जताई है कि आग और धुएं के कारण हाथियों का झुंड विचलित होकर रिहायशी इलाकों और गांवों की ओर रुख कर सकता है. इससे मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति पैदा होने और जान-माल के नुकसान की आशंका बढ़ गई है.

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विभाग ने स्पष्ट किया है कि जंगलों में आग लगाने वालों की पहचान कर वन अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी. गिरिडीह जिले के पीरटांड़ क्षेत्र और विश्व प्रसिद्ध पारसनाथ पहाड़ के सीतानाला जंगलों में भी आग धधक रही है. स्थानीय ग्रामीणों और मकर संक्रांति मेला समिति के लोगों का कहना है कि हर साल महुआ चुनने की सुविधा के लिए सूखे पत्तों में आग लगाई जाती है, लेकिन इससे जंगलों में मौजूद बहुमूल्य जड़ी-बूटियां, दुर्लभ पेड़-पौधे और वन्यजीव बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं.

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आसमान में छाया धुएं का घना गुबार 

लोहरदगा जिले के किस्को प्रखंड स्थित काशी टांड़ के जंगलों में स्थिति और अधिक भयावह बताई जा रही है. दिन के समय आसमान में धुएं का घना गुबार छाया रहता है, जबकि रात में जंगल की लपटें दूर से लाल दिखाई देती हैं. स्थानीय लोगों का आरोप है कि वन विभाग के जागरूकता अभियानों के बावजूद आग बुझाने के ठोस इंतजाम जमीन पर पर्याप्त नहीं दिख रहे हैं.

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हजारीबाग, चतरा और लातेहार के जंगलों से भी आग लगने की लगातार खबरें मिल रही हैं. आंकड़ों के अनुसार हाल के वर्षों में झारखंड के वनों में आग लगने की घटनाओं में लगभग 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. मार्च और अप्रैल के महीने इस दृष्टि से सबसे संवेदनशील माने जाते हैं.

पिछले 4 वर्षो में 10 प्रतिशत से अधिक वृक्ष वनाग्नि की चपेट में आए 

एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2001 से 2025 के बीच राज्य के 10 प्रतिशत से अधिक वृक्ष वनाग्नि की चपेट में आ चुके हैं, जिनमें पश्चिम सिंहभूम के वन क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए वन विभाग तकनीक और सामुदायिक भागीदारी का सहारा ले रहा है. ‘जीरो फायर’ लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए राज्यभर में करीब 28 हजार ग्रामीणों को “अग्नि योद्धा” के रूप में जोड़ा गया है, जिन्हें व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से त्वरित सूचना तंत्र से जोड़ा गया है.

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विभाग की योजना इस नेटवर्क का विस्तार कर इसे 50 हजार तक पहुंचाने की है. वनाग्नि पर शीघ्र नियंत्रण के लिए ड्रोन और उपग्रह आधारित अलर्ट सिस्टम का भी इस्तेमाल किया जा रहा है. जिला और क्षेत्र स्तर पर चौबीसों घंटे कार्यरत नियंत्रण कक्ष बनाए गए हैं और आम लोगों के लिए टोल-फ्री नंबर जारी करने की प्रक्रिया चल रही है.

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इसके अलावा जंगलों के भीतर 10 से 20 मीटर चौड़ी ‘फायर लाइनों’ को सक्रिय किया जा रहा है, ताकि आग को आगे फैलने से रोका जा सके. वन अधिकारियों ने ग्रामीणों से अपील की है कि वे महुआ चुनने के लिए आग का सहारा न लें और किसी भी आगजनी की सूचना तुरंत विभाग को दें, ताकि झारखंड की इस बहुमूल्य प्राकृतिक धरोहर को राख होने से बचाया जा सके.

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