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‘मैं मुख्यमंत्री बन गया…’ लालू के पहली बार CM बनने पर मां ने क्यों कहा- सरकारी नौकरी तो नहीं मिली ना? सियासत का रोचक क़िस्सा

जनता दल को मिले अपार जन समर्थन के बाद अब सवाल ये था कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री? कुर्सी एक और दावेदार तीन थे. लालू यादव, राम सुंदर दास और रघुनाथ झा. उस वक़्त के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह चाहते थे राम सुंदर दास CM बनें. जबकि उप-प्रधानमंत्री देवीलाल चौटाला लालू के नाम पर मुहर लगाना चाहते थे. वी पी सिंह के साथ साथ उस वक़्त के केंद्रीय मंत्री चंद्रशेखर ने तीसरे दावेदार रघुनाथ झा का नाम आगे कर दिया.

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‘माई, हम मुख्यमंत्री बन गयीनी..
इ का होला..
इ जे हथुआ महाराज बाड़न, उनको से बड़.
अच्छा ठीक है जाय दे, लेकिन तहरा सरकारी नौकरी ना नु मिलल…’ 
एक नेता जो सत्ता की सबसे ऊंची गद्दी पर क़ाबिज़ होने वाला था. ये कुर्सी थी मुख्यमंत्री की, राज्य था बिहार, और सत्ता का ये सबसे बड़ा पद मिला था लालू प्रसाद यादव को. कहा जाता है जब लालू पहली बार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने सबसे पहले ये ख़ुशख़बरी अपनी मां को सुनाई. 

लालू ने मां से कहा, ‘माई, हम मुख्यमंत्री बन गयीनी..यानी मां मैं मुख्यमंत्री बन गया. मां ने जवाब दिया- ये क्या होता है? लालू ने मां को समझाने के लिए हथुआ महाराज का ज़िक्र किया, क्योंकि मां की नज़र में हथुआ महाराज ही सबसे ताकतवर और दमदार शख़्सियत थे. लालू ने मां से कहा- इ जे हथुआ महाराज बाड़न, उनको से बड़. यानी हथुआ महाराज हैं ना उनसे भी बड़े आदमी. मां ने फिर कहा- अच्छा ठीक है जाने दो लेकिन तुम्हें सरकारी नौकरी तो नहीं मिली ना? मां की बात सुनकर लालू यादव हंसने लगे और बाद में तफ़सील से मां को समझाया कि उन्होंने क्या हासिल किया है. जानते हैं इस क़िस्से से जुड़ी पूरी कहानी, कैसे एक छोटे से गांव से निकला लड़का बन गया बड़का नेता? साथ-साथ ये भी जानेंगे कौन थे हथुआ महाराज जिनका ज़िक्र लालू ने अपनी मां को समझाने के लिए किया था. 

कांग्रेस का पतन, नए युग का आरंभ 

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साल था 1990 जेपी आंदोलन से उभरे नेता राजनीति के मैदान में अपनी अपनी क़िस्मत आज़मा रहे थे. उस समय बिहार और झारखंड एक ही राज्य था. कुल 324 सीटों पर विधानसभा के चुनाव हुए. इनमें से जनता दल 122 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. जबकि पहले से सत्ता पर क़ाबिज़ कांग्रेस को मिली महज 71 सीटें हासिल हुई. 

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इससे पहले कांग्रेस लगातार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई थी. पहली बार साल 1980 में कांग्रेस ने 169 सीटें हासिल की थी. दूसरी बार 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 196 सीटें जीती थीं और सरकार बनाई थी, लेकिन तीसरी बार बिहार की जनता बदलाव के मूड में थी.

1990 में कौनसे तीन बड़े चेहरे थे मुख्यमंत्री पद के दावेदार? 

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जनता दल को मिले अपार जन समर्थन के बाद अब सवाल ये था कि कौन बनेगा मुख्यमंत्री? कुर्सी एक और दावेदार तीन थे. लालू यादव, राम सुंदर दास और रघुनाथ झा. उस वक़्त के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह चाहते थे राम सुंदर दास CM बनें. जबकि उप-प्रधानमंत्री देवीलाल चौटाला लालू के नाम पर मुहर लगाना चाहते थे. वी पी सिंह के साथ साथ उस वक़्त के केंद्रीय मंत्री चंद्रशेखर ने तीसरे दावेदार रघुनाथ झा का नाम आगे कर दिया. 

(Photo- CM बननेे के साथ मां और गांव वालों के साथ लालू यादव)

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लालू पहली बार कैसे बने मुख्यमंत्री? 

राम सुंदर दास और लालू यादव के बीच सीधा मुक़ाबला था. जबकि रघुनाथ झा की एंट्री बाद में हुई. मसला और भी गंभीर हो गया. ऐसे में तय किया गया कि इसका फ़ैसला क्यों न विधायकों पर छोड़ दिया जाए. विधायकों को इकट्ठा कर वोटिंग करवाई गई और लालू यादव महज़ 3 वोट के अंतर से मुख्यमंत्री चुने गए. 

46 साल की उम्र में लालू को मिली CM की कुर्सी

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पहली बार लालू महज़ 46 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 10 मार्च को 1990 को पटना के गांधी मैदान में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. CM बनने से पहले लालू यादव पटना के पशु चिकित्सालय महाविद्यालय में अपने चपरासी भाई के क्वार्टर में रहता थे. 

सरकारी नौकर नहीं, मुख्यमंत्री बनकर मां से मिले 

फिर आया वो क़िस्सा जब मुख्यमंत्री बनने के बाद लालू यादव पहली बार मां से मिलने गांव पहुंचे. लालू प्रसाद यादव का जन्म गोपालगंज के फुलवरिया गांव में हुआ था. CM बनकर जब वह पहली बार गांव पहुँचे तो उनका ज़ोरदार स्वागत हुआ, लेकिन उनकी मां मरछिया देवी बेटे के इस ओहदे से अंजान थी. उनके लिए बड़का आदमी वो ही था जिसके पास सरकारी नौकरी है. 

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मां से आशीर्वाद लेते हुए लालू यादव ने मरछिया देवी से कहा, माई, हम मुख्यमंत्री बन गयीनी.. लालू की मां ने पूछा- इ का होला..? उन्होंने हथुआ महाराज का उदाहरण देते हुए कहा इ जे हथुआ महाराज बाड़न, उनको से बड़. मां ने कहा- अच्छा ठीक का जाय दे, लेकिन तहरा सरकारी नौकरी ना नु मिलल…मां उस वक़्त की हो या आज की ज़्यादातर माएं अपने बच्चों को सरकारी नौकरी करते हुए ही देखना चाहती हैं. 

लालू ने ख़ुद सुनाया था ये रोचक क़िस्सा 

साल 2015 में लालू यादव ने मां मरछिया देवी की याद में फ़ेसबुक पर एक स्पेशल नोट लिखा. जिसमें उन्होंने इस क़िस्से का ज़िक्र किया था. उस दिन 10 मार्च को मदर्स डे था. लालू ने लिखा था, ‘मां को महज प्रतीकात्मकता के तौर पर एक दिन के लिए मैं याद नहीं करता. वो हर क्षण हर पल मेरे अंग-संग रहती है. जो कुछ आज हूं वो सब मां के प्यार एवं दुआओं का असर है. जिन विषम परिस्थितियों में उन्होंने मेरा पालन पोषण किया,वो सोचकर रूह कांप जाती है. एक अनपढ़ और बेहद गरीब परिवार में जन्में होने के कारण मैंने गरीबी को बेहद नजदीक से देखा है. 

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(Photo- दादी की प्रतिमा को प्रणाम करते तेजस्वी यादव)

मां की याद में लालू यादव ने अपने गांव फुलवरिया में मरछिया देवी की आदमकद प्रतिमा बनवाई थी. इसके अलावा मीरगंज में मरछिया देवी के नाम से चौक है और मरछिया देवी हॉस्पिटल भी है. फुलवारिया गांव की गिनती आज विकसित गांवों में होती है. 

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कौन थे हथुआ महाराज? 

लालू ने मां को समझाते हुए जिन हथुआ महाराज का ज़िक्र किया था. वह गोपालगंज की हथुआ रियासत के शासक थे. यह रियासत ब्रिटिश काल तक एक प्रमुख जमींदारी थी. हथुआ राज का गठन 16वीं शताब्दी में माना जाता है. जब हुमायूं ने राजा जयमल के पोते जुबराज शाही को हुस्सेपुर, कल्याणपुर, बलचैरा और थुआ परगना की जागीर दी थी. इस रियासत को विशेष रूप से महाराज गोपेश्वर शाही के शासनकाल में पहचान मिली थी. 

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आजादी के बाद 1956 में जमींदारी उन्मूलन कानून लागू होने के बावजूद, हथुआ राज परिवार ने अपनी कई संपत्तियों को बनाए रखा.  उनके बनाए थावे मंदिर की देखरेख और परंपराएं आज भी क़ायम हैं. हथुआ राज का महल और उनकी सांस्कृतिक विरासत, जैसे बग्घी यात्रा और शीश महल में दरबार, आज भी स्थानीय लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं. हथुआ महाराज की विरासत और रियासत बिहार के इतिहास और संस्कृति में एक अहम स्थान रखता है. 

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