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'लालू के जंगलराज' और अराजकता के दलदल से मुक्ति... 'नक्सली अदालत' की 'जन संवाद' से काट, सुपर 30 की स्थापना, सर अभयानंद ने ऐसे बदली बिहार की तस्वीर
बिहार का नाम लंबे समय तक जंगलराज, नरसंहार, चुनावी लूट-पाट और अपहरण जैसी घटनाओं से जोड़ा जाता रहा. लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की हालत ऐसी थी कि सामान्य ड्यूटी भी पुलिसकर्मियों के लिए चुनौती बन चुकी थी. अपराधियों के हौसले इतने बुलंद थे कि आम जनता सुरक्षा की उम्मीद ही छोड़ चुकी थी. इसी दौर में बिहार पुलिस के एक अफसर ने न सिर्फ निडर पुलिसिंग की नई परिभाषा गढ़ी, बल्कि सिस्टम के भीतर से बदलाव लाकर राज्य की तस्वीर बदलने की कोशिश की. यह कहानी है बिहार के पूर्व DGP अभयानंद की.
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बिहार का नाम लंबे समय तक जंगलराज, नरसंहार, नक्सलवाद और अपहरण जैसी घटनाओं के साथ जोड़ा जाता रहा. एक ऐसा दौर था जब कानून-व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा चुकी थी और आम नागरिकों के मन में भय गहराई तक बैठ गया था. चुनावों में बूथ कैप्चरिंग, नेताओं के इशारे पर होने वाले नरसंहार और रात के अंधेरे में नक्सली हमले उस समय बिहार की सच्चाई बन चुके थे. लेकिन इन्हीं हालातों के बीच एक ऐसा अधिकारी सामने आए जिन्होंने साहस, रणनीति और निडर पुलिसिंग के बल पर बिहार की तस्वीर बदलने का बीड़ा उठाया. यह कहानी है बिहार के पूर्व डीजीपी और 1977 बैच के आईपीएस अधिकारी अभयानंद की.
जंगलराज के दौर में नौकरी, वो भी पुलिसिंग की चुनौतियां
90 और शुरुआती 2000 के दशक में बिहार में अपराध अपने चरम पर था. अपहरण उद्योग एक संगठित धंधा बन चुका था. व्यापारियों, डॉक्टरों, इंजीनियरों और यहां तक कि बच्चों तक को फिरौती के लिए उठा लिया जाता था. नरसंहार की घटनाएँ आए दिन सुर्खियों में रहती थीं. कभी किसी गांव को जातीय हिंसा की आग में झोंक दिया जाता तो कभी नक्सली सैकड़ों लोगों को गोलियों से भून देते. ग्रामीण इलाकों में नक्सलवाद ने सरकार की पकड़ को लगभग खत्म कर दिया था.
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ऐसे दौर में पुलिस बल का मनोबल भी टूटा हुआ था. अपराधियों का राजनीतिक संरक्षण खुला था और पुलिस की छवि जनता के बीच कमजोर पड़ चुकी थी. इन्हीं चुनौतियों के बीच अभयानंद ने पुलिसिंग को नई दिशा दी.
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सर अभयानंद के नाम से मशहूर पूर्व IPS अभयानंद का सबसे बड़ा गुण था निडरता. उन्होंने साफ संदेश दिया कि अपराधी चाहे किसी भी जाति, धर्म या पार्टी से क्यों न हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी. उनकी नीति थी कि कानून-व्यवस्था से समझौता नहीं किया जाएगा और न ही राजनीतिक दबाव में काम किया जाएगा. यही कारण था कि अपराधियों में भय और जनता में विश्वास धीरे-धीरे लौटने लगा.
नक्सलवाद के खिलाफ नई रणनीति
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नक्सलवाद बिहार के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी. गया, औरंगाबाद, जहानाबाद और भोजपुर जैसे जिले नक्सल प्रभावित थे. वहां की जनता "जन अदालतों" में नक्सलियों के फैसले झेलने को मजबूर थी. अभयानंद ने इन इलाकों में पुलिस का नया मॉडल पेश किया. वे खुद गांव-गांव जाकर डेरा डालते, लोगों से संवाद करते और भरोसा दिलाते कि अब राज्य उनके साथ खड़ा है. नक्सलियों को यह संदेश दिया गया कि उनकी हिंसा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जनता को यह भरोसा दिया गया कि अब "जंगलराज" की जगह कानून का राज चलेगा. इसका असर भी दिखा और यह बिहार से सिमटकर एक क्षेत्र विशेष, जंगलों तक सिमट कर रह गया.
चुनाव और बूथ कैप्चरिंग पर रोक
बिहार के चुनाव हिंसा और बूथ कैप्चरिंग के लिए कुख्यात थे. अभयानंद ने इस व्यवस्था में सुधार के लिए "बूथ रैंडमाइजेशन" लागू किया. इसके तहत यह तय नहीं होता था कि किस थाने की पुलिस किस बूथ पर तैनात होगी. इस पारदर्शिता ने चुनावी हिंसा को काफी हद तक कम कर दिया और निष्पक्ष मतदान का रास्ता तैयार किया. उसी का असर आज भी दिख रहा है. उसी का असर आपको 2005 के चुनाव में दिखा जब तत्कालीन चुनाव आयोग के सलाहकार केजे राव ने कुछ इसी आधार पर चुनाव पारदर्शिता और लॉ एंड ऑर्डर की व्यवस्था लागू की. जिसके तहत फौरन पुलिस, DM, अधिकारियों का तबादला कर दिया जाता था. इसका असर ये हुआ कि आम लोगों और वोटर्स का विश्वास आयोग और व्यवस्था पर बढ़ा.
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नरसंहार और अपहरण पर शिकंजा
नरसंहार की घटनाएं और अपहरण उस समय बिहार की सबसे बड़ी पहचान बन चुके थे. अभयानंद ने अपहरण माफियाओं पर लगातार दबाव बनाया. कई गैंग्स को ध्वस्त किया गया और व्यापारियों में यह भरोसा जगाया गया कि अब वे बिना डर-भय के व्यापार कर सकते हैं. नरसंहार के मामलों में त्वरित कार्रवाई और दोषियों पर सख्त शिकंजे से अपराधियों में भय का माहौल बना.
कैसे हुआ सुपर 30 का गठन?
अभयानंद सिर्फ पुलिस अधिकारी नहीं थे, बल्कि समाज को नई दिशा देने वाले विचारक भी थे. कानून-व्यवस्था को सख्त बनाने के साथ-साथ वे शिक्षा को भी अपराध से निपटने का अहम हथियार मानते थे. सुपर 30 जैसी पहल से जुड़कर उन्होंने गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों को आईआईटी की राह दिखाई. यह उनके व्यक्तित्व का दूसरा पहलू था, जहा. एक ओर वे अपराधियों के लिए सख्त थे, वहीं समाज के कमजोर वर्ग के लिए मार्गदर्शक.
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अभयानंद की पुलिसिंग ने बिहार को जंगलराज, नरसंहार, नक्सलवाद और अपहरण के दौर से बाहर निकालकर न्याय, शांति और सशक्तिकरण की दिशा में आगे बढ़ाया. उनकी निडर पुलिसिंग, निष्पक्ष चुनावों की व्यवस्था और जनता का विश्वास जीतने की रणनीति ने नए बिहार की नींव रखी.
आज जब भी बिहार की कानून-व्यवस्था पर चर्चा होती है, अभयानंद का नाम एक मिसाल के तौर पर लिया जाता है. उनकी कहानी यह साबित करती है कि अगर नेतृत्व मजबूत, ईमानदार और साहसी हो तो अंधेरे से उजाले की ओर रास्ता हमेशा निकलता है.
इस संक्षिप्त स्टोरी से इतर बिहार, बिहार की समस्या, कैसे बिहार देश की तरक्की से पिछड़ गया, कैसे राज्य को जंगलराज के दलदल में धकेल दिया गया और इन्हीं सब समस्याओं से निपटने का आगे का रास्ता क्या है? पूरा पॉडकास्ट देखिए और अपनी राय भी दीजिए.
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