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बिहार चुनाव नतीजों से वामपंथियों को बड़ा झटका… जनता ने सिरे से नकारा, सिंगल डिजिट में सिमटी कम्यूनिस्ट पार्टी
साल 2020 में एक मजबूत वापसी के रूप में देखे जाने वाले वामपंथी दल ने इस बार महागठबंधन में चुनाव लड़ा. उस समय 19 सीटों में से 12 सीटें हासिल कीं, जो भोजपुर, सीवान और आरा में जमीनी स्तर पर प्रभाव बनाने के साथ बड़ी ताकत के रूप में उभरी.
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बिहार के नतीजों ने CPIML (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरल पार्टी को करारा झटका दिया है. बिहार में कम्यूनिस्ट पार्टी की सीटें डबल से सिंगल तक रह गईं. साल 2020 में जो पार्टी दो डिजिट में 12 सीटों पर थी वो साल 2025 में महज 2 सीटों तक रह गई.
CPI(ML) ने बिहार में 20 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन जीत दो सीटें, काराकाट और पालीगंज में ही मिली. भूमिहीनों और हाशिए पर पड़े लोगों के बीच जन आंदोलनों और जमीनी स्तर पर लामबंदी से अपनी शुरुआत करने वाली यह पार्टी अपने गढ़ भी नहीं बचा पाई.
बुरी हार के बाद क्या बोले पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य?
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बिहार में अपना जनाधार सिमटने के बाद पार्टी महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने नतीजों को जमीनी हकीकत से उलट बताया. उन्होंने आरोप लगाया कि बिहार में वोटर लिस्ट में लाखों मतदाताओं के नाम हटाए गए जिससे CPI(ML) के वोटर्स मतदान नहीं कर पाए. उन्होंने कहा, नीतीश सरकार ने चुनावों से पहले को 10 हजार रुपए दिए जो NDA के पक्ष में रहा. हालांकि दीपांकर भट्टाचार्य ने नतीजों को महागठबंधन के लिए बड़ा झटका मानते हुए आत्मंथन की जरूरत को स्वीकार किया.
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पहचान खो रही CPI(ML)
इन नतीजों के बाद साफ हो गया कि भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी को अपनी रणनीति पर गहराई से विचार करने की जरूरत है. CPIML ने नाजुक गठबंधन को एकजुट रखने में अहम भूमिका निभाई थी. वही पार्टी अब अपनी पहचान खो रही है. साल 2020 में एक मजबूत वापसी के रूप में देखे जाने वाले वामपंथी दल ने इस बार महागठबंधन में चुनाव लड़ा. उस समय 19 सीटों में से 12 सीटें हासिल कीं, जो भोजपुर, सीवान और आरा जैसे क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर प्रभाव के साथ एक महत्वपूर्ण ताकत के रूप में उभरी थी.
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तेजस्वी को CM उम्मीदवार बनाने में बड़ी भूमिका निभाई
टिकट बंटवारे और तेजस्वी यादव को गठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने के दौरान दीपांकर भट्टाचार्य ने RJD और कांग्रेस में मतभेद दूर करने में अहम भूमिका निभाई थी.
यह भी माना जा रहा है कि ओसामा शहाब को रघुनाथपुर से चुनाव लड़ाने के फैसले के साथ CPI(ML) का जाना वामपंथी पार्टी के मूल समर्थकों को नहीं भाया था. क्योंकि ओसामा के दिवंगत पिता और सीवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन पर 1997 में छात्र कार्यकर्ता चंद्रशेखर की हत्या का आदेश देने का आरोप था, जो वामपंथी पार्टी से जुड़े थे और उनके संभावित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे.
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कहां 95 वोटों के अंतर से हारी CPI(ML)
CPIML के उम्मीदवार जहां केवल दो सीटों पालीगंज और काराकाट पर जीत हासिल कर पाए, वहीं पार्टी अगियांव (सुरक्षित) सीट पर महज 95 वोटों के मामूली अंतर से हार गई. तीन अन्य सीटों बलरामपुर, डुमरांव और जीरादेई पर हार का अंतर 3,000 से भी कम था. पार्टी ने इस बार 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसका वोट शेयर लगभग 3% रहा.
CPI(ML) के अलावा अन्य वामपंथी दलों का प्रदर्शन भी खराब रहा है, CPI (M) ने चार में से केवल एक सीट जीती है. जबकि पिछली बार उसे दो सीटें मिली थीं. इसके साथ-साथ CPI, जिसने पिछली बार दो सीटें जीती थीं, वह छह सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद अपना खाता खोलने में असफल रही.
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नतीजों के लिए SIR को ठहराया जिम्मेदार
CPIML के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि ये नतीजों पर SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) के दाग लगे हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी नैतिकता और आदर्श आचार संहिता की सभी धारणाओं को ताक पर रखकर 3 करोड़ की लाभार्थी आबादी के बीच 30,000 करोड़ रुपये की राशि बांटी गई. ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए.
भट्टाचार्य ने कहा, ’15 साल बाद 2010 के नतीजों की पुनरावृत्ति जब नीतीश कुमार सरकार की विश्वसनीयता अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है और मोदी सरकार को भी एक साल पहले समर्थन का बड़ा नुकसान हुआ था, अविश्वसनीय है. हम नतीजों का गहन विश्लेषण करेंगे और जरूरी सबक सीखेंगे.’
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CPIM के महासचिव एमए बेबी ने नतीजों को 'महागठबंधन' के लिए एक झटका बताया और NDA पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का आरोप लगाया. पार्टी ने एक बयान में कहा कि NDA को प्रधानमंत्री और गृह मंत्री समेत अपने नेताओं के सांप्रदायिक और जातिवादी बयानबाजी से फायदा हुआ. इस सबने महागठबंधन के बेरोजगारी और वोट चोरी जैसे मुद्दों को दबा दिया.
RJD और कांग्रेस के मतभेद को वजह माना
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एक कम्यूनिस्ट नेता ने कहा कि महागठबंधन लोगों के बीच 'वोट चोरी' के मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाने में सक्षम था, लेकिन जमीनी स्तर पर गठबंधन लोगों को मतदान प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए प्रेरित करने में असमर्थ रहा. वामपंथी नेताओं का यह भी कहा कि जिस तरह से RJD और कांग्रेस ने टिकट बंटवारे को लेकर मतभेद सुलझाने में देरी की. उससे महागठबंधन में एकता की कमी का नेगेटिव मैसेज गया. लगभग 10 सीटों पर फ्रेंडली फाइट के नाम पर झगड़े से यह और भी बढ़ गया, जहां कोई सहमति नहीं बन पाई. बिहार में कम्यूनिस्ट पार्टियों का सिमटता जनाधार वामपंथियों से मोहभंग को जाहिर करता है.