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बिहार चुनाव: महागठबंधन की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर सबकी नजर, क्या EBC वोटरों में दरार डाल पाएंगे तेजस्वी-राहुल?
Bihar Chunav 2025: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन ने अपनी चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. लगातार चार बार हार के बाद अब उसका फोकस यादव-मुस्लिम वोट बैंक से हटकर अति पिछड़ा वर्ग (EBC) पर है. करीब 33% आबादी वाला यह वर्ग अब तक एनडीए का मजबूत आधार रहा है. इसी को साधने के लिए राहुल गांधी और तेजस्वी ने इस बार मजबूत सोशल इंजीनियरिंग तैयार की है ताकि इस वोट बैंक पर सेंध लगाई जा सकें. इसी कारण मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया है.
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Bihar Election 2025: बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से सत्ता का सबसे बड़ा गणित रहा है. अब विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है. लगातार चार चुनावों में हार झेलने के बाद महागठबंधन को यह एहसास हो गया है कि सिर्फ यादव और मुस्लिम वोटबैंक के सहारे सत्ता में वापसी नामुमकिन है. इसी वजह से अब उसका पूरा फोकस अति पिछड़ा वर्ग यानी EBC (Extremely Backward Class) वोटरों को अपनी ओर खींचने पर है. यह वही वोट बैंक है जो लंबे वक्त से एनडीए के साथ खड़ा रहा है और जिसकी संख्या बिहार की राजनीति में सबसे अहम है.
ईबीसी वोट बैंक का गणित
बिहार के जाति सर्वेक्षण के मुताबिक, ईबीसी वर्ग राज्य की कुल आबादी का लगभग 33 प्रतिशत है. इनमें कुर्मी, कुशवाहा, कोइरी, मल्लाह, केवट और तांती जैसे समुदाय शामिल हैं. पारंपरिक तौर पर यह वर्ग मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सबसे मजबूत आधार रहा है. नीतीश खुद कुर्मी समुदाय से आते हैं और उन्होंने इस वर्ग को लगातार सत्ता में प्रतिनिधित्व दिलाया है. एनडीए ने हमेशा ईबीसी समाज के नेताओं को टिकट देकर और योजनाओं में हिस्सेदारी बढ़ाकर इस वर्ग का भरोसा बनाए रखा. लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग दिख रही है. राहुल गांधी और तेजस्वी ने इस बार मजबूत सोशल इंजीनियरिंग तैयार की है ताकि इस वोट बैंक पर सेंध लगाई जा सकें.
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महागठबंधन ने मल्लाह समाज पर लगाया बड़ा दांव
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महागठबंधन ने इस बार मल्लाह समुदाय को साधने के लिए बड़ा दांव खेला है. 2023 के जाति सर्वेक्षण के अनुसार, मल्लाह, केवट और निषाद जैसी लगभग 20 उपजातियां बिहार की आबादी में करीब 4.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखती हैं. यह समुदाय अब तक एनडीए के लिए काफी वफादार वोटर माना जाता रहा है. लेकिन अब महागठबंधन ने मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर बड़ा संदेश दिया है. सहनी खुद को 'मल्लाह का बेटा' कहते हैं और बिहार के नदी किनारे बसे इलाकों में उनका मजबूत प्रभाव है. सहनी की पार्टी विकासशील इंसान पार्टी (VIP) इस चुनाव में 12 सीटों पर मैदान में है. राहुल गांधी ने हाल ही में उनके साथ चुनाव प्रचार के दौरान तालाब में डुबकी लगाई थी, जो यह दिखाने की कोशिश थी कि कांग्रेस और आरजेडी अब ईबीसी समाज को अपना ‘साझा वोटबैंक’ बनाना चाहते हैं. महागठबंधन का मानना है कि सहनी की मौजूदगी से एनडीए के पारंपरिक वोटों में सेंध लग सकती है.
पान-तांतिया समुदाय भी निशाने पर
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महागठबंधन की नजर सिर्फ मल्लाह समाज पर नहीं, बल्कि पान-तांतिया समुदाय पर भी है. यह समुदाय बुनाई और कपड़ा व्यापार से जुड़ा है और इसकी आबादी लगभग 2 प्रतिशत बताई जाती है. बिहार के 38 जिलों में से करीब 6 जिलों में इस समुदाय की खास पकड़ है. पहले यह वर्ग एनडीए के साथ रहा है, लेकिन अब महागठबंधन ने इन्हें भी साधने की कोशिश तेज कर दी है. इस समुदाय के नेता आईपी गुप्ता को महागठबंधन ने तीन सीटों से टिकट दिया है. गुप्ता की पार्टी 'इंडियन इंक्लूसिव पार्टी' ने अपने समर्थकों से अपील की है कि वे सुबह से ही वोट डालने के लिए लाइन में लगें. महागठबंधन को उम्मीद है कि अगर पान-तांतिया और मल्लाह वोट बैंक में सेंध लगी, तो आरजेडी की पारंपरिक 80 सीटों की सीमा टूट सकती है और गठबंधन 100 से अधिक सीटों का आंकड़ा छू सकता है.
क्या बदलेगा बिहार का समीकरण?
बिहार की राजनीति में ईबीसी मतदाताओं की भूमिका हमेशा निर्णायक रही है. महागठबंधन का यह नया सोशल इंजीनियरिंग फार्मूला अगर काम करता है, तो एनडीए के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या ईबीसी वर्ग, जो नीतीश कुमार के साथ दो दशक से खड़ा है, इतनी आसानी से पाला बदलेगा? फिलहाल, चुनावी मैदान में मल्लाह और पान-तांतिया वोटरों को लेकर दोनों खेमों के बीच सियासी जंग तेज हो चुकी है. बिहार में इस बार की लड़ाई सिर्फ सत्ता की नहीं, बल्कि सोशल इंजीनियरिंग के नए प्रयोगों की भी है.
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गौरतलब है कि बिहार की 243 में से 121 विधानसभा सीटों पर कल यानी 6 नवंबर को मतदान होना है. वहीं, दूसरे और अंतिम चरण का मतदान 11 नवंबर को राज्य की 122 विधानसभा सीटों पर होगा. जबकि वोटों की गिनती 14 नवंबर को की जाएगी. तब जाकर यह तस्वीर साफ होगी कि चुनाव से पहले तमाम सियासी दलों द्वारा तैयार किए जा रहे समीकरणों का असली फायदा किसे मिलेगा.