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10 साल तक बिस्तर पर पड़ी रही और आज पेरिस पैरालंपिक में दो पदक जीतने वाली पहली खिलाड़ी बनी प्रीति पाल

भारत की पैरा एथलीट प्रीति पाल ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो मेडल जीतकर इतिहास रच दिया और सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। एक वक्त ऐसा भी आया जब 10 साल तक प्रीति को बिस्तर पर गुजारना पड़ा। लेकिन आज उसी लड़की ने भारत को गर्व महसूस कराया है।

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किसी ने क्या खूब कहा है कि सफलता सीद्धि में नहीं संघर्ष में बसी है, हर फिक्र को छोड़, हर मुश्किल को चुनो, क्योंकि सच्ची जीत संघर्ष में ही सजी है।और ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं भारत की बेटी प्रीति पाल पर। वही प्रीति पाल जो एक समय में चलने के लिए तरसती थी, चलना तो दूर उसका खड़ा होना भी मुश्किल था लेकिन आज उसी लड़की ने भारत को गर्व महसूस करवाया है, पेरिस पैरालंपिक 2024 में भारतीय खिलाड़ियों का प्रदर्शन लगातार ज़ारी है और एक के बाद एक मेडल खिलाड़ी भारत की झोली में डाल रहे हैं, इसी बीच भारत की प्रीति पाल ने भी भारत की झोली में एक  दो मेडल डालकर इतिहास रच दिया है। 

दो पदक जीत रचा इतिहास -

दरअसल भारत की पैरा एथलीट प्रीति पाल ने पेरिस पैरालंपिक 2024 में शानदार प्रदर्शन करते हुए दो मेडल जीतकर इतिहास रच दिया और सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा। महिलाओं की टी 35 वर्ग की 100 मीटर दौड़ में उन्होंने 14.21 सेकेंड के साथ दौड़ पूरी की और अपना सर्वश्रेष्ठ समय दर्ज कर ब्रॉन्ज पर कब्ज़ा किया। जिसके बाद साथ ही प्रीति ने 30.01 सेकेंड में महिलाओं की 200 मीटर - टी35 फ़ाइनल में भी एक और ब्रॉन्ज़ पदक जीता। इस जीत के साथ वह पैरालिंपिक 2024 में 2 पदक जीतने वाली पहली ट्रैक और फील्ड भारतीय महिला पैराएथलीट बन गईं हैं।

10 साल बिताये बिस्तर पर -

एक वक्त ऐसा भी था जब मुजफरनगर जिले की रहने वाली हैं इस लड़की को लेकर लोग उनके खड़े होकर चलने तक की उम्मीद छोड़ चुके थे, प्रीति पाल के जीवन की कठिनाइयाँ उनकी जन्म के समय से ही शुरू हो गई थीं। जब वो पैदा हुई तो प्रीति के दोनों पैर जुड़े हुए थे, जिसे ऑपरेशन के बाद अलग किया गया और 10 साल तक उनके दोनों पैर पर प्लास्टर लगा हुआ था। ख़बरों के मुताबिक प्रीति को 10 साल तक बिस्तर पर गुजरना पड़ा, और प्रीती के धीरे - धीरे चलने की कोशिश और अपने ऊपर भरोसे ने उसे आसमान की बुलंदियों पर पंहुचा दिया, इतनी समस्याओं का सामना करने के बाद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी मेहनत जारी रखी।साथ ही प्रीति ने सबको गलत साबित किया और दौड़ में पैरालंपिक जैसे बड़े स्तर पर मेडल जीतकर दिखाया। 

गोबर से लेकर दौड़ तक क्या है कनेक्शन -

रिपोर्ट्स की माने तो प्रीति की दादी सरोजदेवी ने प्रीति के लिए कई नुस्खे आजमाएं, यहाँ तक कि  गांव की परंपराओं के अनुसार उनकी दादी ग्रहण के समय उनकी पोती को सुरक्षित रखने के लिए विशेष सावधानियाँ बरती जाती थीं। जब भी ग्रहण पड़ता, परिवार प्रीति को किसी प्रकार के बुरे प्रभाव से बचाने के लिए उसे मिट्टी या गोबर में दबाते थे। यह प्राचीन परंपराओं के अनुसार किया जाता था ताकि प्रीति को कोई शारीरिक या मानसिक कष्ट न पहुंचे। यह पारंपरिक सुरक्षा उपाय प्रीति की देखभाल और उनके जीवन में सुरक्षात्मक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। उनकी दादी का कहना है कई उन्हें किसी ने बताया था कि जिसके पैरों में दिक्कत हो अगर सूर्य ग्रहण के दौरान उसका आधा शरीर गोबर में दबा दिया जाए तो पैरों में जान लौट जाती है। 
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