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जब मुगलों ने बनाया था सबसे सख्त टैक्स सिस्टम, ट्रंप के टैरिफ से भी था खतरनाक

अकबर से लेकर औरंगजेब तक, मुगलों ने ज़कात, जज़िया, खराज, मनसबदारी, आबवाब और सीमा शुल्क जैसे कई प्रकार के टैक्स लागू किए। किसानों, व्यापारियों और आम जनता पर इन टैक्सों का बोझ इतना भारी था कि कई बार विद्रोह भी हुए, लेकिन उन्हें कुचल दिया गया।

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आज दुनिया अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के टैरिफ की खबरों से गूंज रही है,  लेकिनभारतीय इतिहास की गहराइयों में एक ऐसा कर सिस्टम था, जो आज के किसी भी टैरिफ सिस्टम से ज्यादा जटिल और क्रूर था। यह टैक्स व्यवस्था थी मुगल काल की। 331 साल तक चले इस शासन में टैक्स केवल राजस्व का साधन नहीं था, बल्कि सत्ता और नियंत्रण का सबसे बड़ा औजार भी था। यह कहानी महज कर प्रणाली की नहीं है, यह कहानी है उस दौर की राजनीति, अर्थव्यवस्था और आम जन की पीड़ा की है, जिसे सुनकर आज के टैक्सपेयर भी सिहर जाएं।

जब हर सांस पर लगता था टैक्स

1526 से लेकर 1857 तक भारत में मुगलों का शासन रहा। इस कालखंड में दो नाम सबसे ज्यादा उभरकर सामने आते हैं अकबर और औरंगजेब। इन दोनों शासकों ने कर व्यवस्था को एक ऐसा ढांचा दिया, जिससे न सिर्फ राज्य का खजाना भरता रहा, बल्कि शासन को स्थिरता भी मिली। लेकिन इसका सबसे बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा गरीब किसानों और आम लोगों को।

कहते हैं, उस दौर में जीना था तो कर देना ही पड़ता था चाहे बारिश हो या सूखा, चाहे खेत में अन्न हो या नहीं। मुगलों का कर तंत्र इतना सघन और बारीक था कि इंसान की भूमि, धर्म, व्यापार, उपज, आय हर चीज पर टैक्स तय था।

अकबर का ‘जमीनी’ जाल तो औरंगजेब का ‘आध्यात्मिक टैक्स’

अकबर ने मुगल कर प्रणाली को एक संगठित रूप दिया। उसने भूमि सर्वेक्षण कराकर यह तय किया कि कौन कितनी उपज ले सकता है और उसी हिसाब से ‘लगान’ वसूला जाने लगा। इसे ‘जब्त’, ‘नश्क’, ‘गल्ला बख्शी’ जैसे नामों से जाना गया। इसके अलावा, उन्होंने एक विशेष कर प्रणाली लागू की जिसमें भूमि को उपज क्षमता के अनुसार वर्गीकृत किया गया — पोलाज, परौती, छछर और बंजर। इससे कर निर्धारण तो आसान हुआ, पर किसानों पर कर का बोझ कई गुना बढ़ गया।

दूसरी ओर, औरंगजेब ने कर को धार्मिक रंग दे दिया। उसने गैर-मुसलमानों पर ‘जज़िया’ नाम का व्यक्तिगत टैक्स लगा दिया। यह कर उन लोगों पर भी लागू था जो पहले से ही अन्य कर दे रहे थे। यह टैक्स उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर वसूला जाता था, जिससे समाज में गहराई से भेदभाव और विद्रोह की भावना जन्म लेने लगी।

मुगलों की टैरिफ प्रणाली के अलग-अलग रूप

मुगल कर प्रणाली को अगर ध्यान से देखा जाए तो यह सिर्फ एक आर्थिक तंत्र नहीं था, यह एक राजनीतिक रणनीति भी थी।

जकात – मुस्लिम व्यापारियों पर लगने वाला धार्मिक टैक्स

खराज – गैर-मुस्लिम किसानों से लिया जाने वाला भूमि कर

जज़िया – गैर-मुसलमानों पर लगने वाला व्यक्तिगत कर

आबवाब – कृषि और व्यापार पर अतिरिक्त टैक्स

मनसबदारी कर – राज्य के अधिकारी और सेनापतियों के दर्जे के अनुसार वसूली

शुल्क एवं सीमा कर – आयात-निर्यात पर लगने वाला टैक्स

अकबरी भूमि कर प्रणाली – जिसमें उपज या नकद के रूप में कर वसूला जाता था

इस टैक्स नेटवर्क की एक और खासियत थी, यह कई बार दोहराव भरा होता था। किसान एक ही भूमि पर दो तरह के टैक्स देता था — एक भूमि के मालिकाने के लिए और दूसरा उस पर होने वाली उपज के लिए। यह स्थिति किसानों के लिए दम घोंटने वाली बन चुकी थी।

वैसे आपको बता दें कि मुगल शासन की एक अनोखी व्यवस्था थी। राज्य की सारी भूमि को तीन भागों में बांटा गया था। खालसा भूमि जो सीधे बादशाह के अधीन होती और उसकी आय सीधे खजाने में जाती। जागीर भूमि जिसे अफसरों और सेनापतियों को वेतन के बदले दी जाती थी। सयूरगल भूमि, यह धार्मिक लोगों या मौलवियों को दी जाती थी, जिस पर कोई टैक्स नहीं लगता था। यह वर्गीकरण सिर्फ प्रशासनिक नहीं था, बल्कि यह दर्शाता था कि मुगल सत्ता किस तरह राज्य, सेना और धर्म के संतुलन पर टिकी थी।

विदेशी व्यापारियों को छूट, देशी व्यापारियों पर टैक्स की मार

मुगल शासन काल में भारत का व्यापार पूरे विश्व में फैला हुआ था। भारत से नील, मसाले, सूती कपड़े, अफीम आदि का निर्यात होता था, जबकि विदेश से रेशमी कपड़े, घोड़े, कालीन, सोना-चांदी आता था। इस व्यापार पर औसतन 3.5% सीमा शुल्क वसूला जाता था।

पर दिलचस्प बात ये है कि यूरोप से आने वाले व्यापारियों को अक्सर टैक्स छूट दे दी जाती थी। पुर्तगाली, डच, अंग्रेज और फ्रेंच व्यापारियों को विशेष अनुमति और कर में रियायतें मिलती थीं, जबकि देशी व्यापारियों को कई गुना टैक्स चुकाना पड़ता था।

कौन जीता, कौन हारा?
इस पूरी कर प्रणाली का सबसे बड़ा लाभ हुआ मुगल खजाने को। इसके जरिए विशाल सेना, शाही दरबार और निर्माण कार्यों को सुचारू रूप से चलाया गया। फायदा मिला विदेशी व्यापारियों और जमींदारों को, जिन्हें कर वसूली का हिस्सा मिलता था या छूटें दी जाती थीं। पर सबसे बड़ा नुकसान झेला किसान, शिल्पकार, स्थानीय व्यापारी और गैर-मुस्लिम नागरिकों ने। कभी सूखा, कभी बाढ़, कभी महामारी, इन सबके बीच भी उन्हें कर देना ही होता था। इतिहास गवाह है कि भूख से बिलखते लोगों ने भी कर दिया। और जो नहीं दे पाए, उन्हें क्रूर सज़ाओं का सामना करना पड़ा।

मुगल काल की कर प्रणाली सिर्फ कर वसूली की कहानी नहीं है यह सत्ता, धार्मिक भेदभाव, विदेशी नीति और सामाजिक असमानता का पूरा अध्याय है। आज हम डोनाल्ड ट्रंप या किसी देश की टैरिफ नीति पर चर्चा करते हैं, तो समझना चाहिए कि टैरिफ केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है यह राजनीतिक और सामाजिक नियंत्रण का ज़रिया भी हो सकता है। जब हम अपने इतिहास की परतों को पलटते हैं, तो ये स्पष्ट हो जाता है कि टैक्स कभी भी केवल पैसे की बात नहीं होती। वह उस सत्ता की सोच का प्रतिबिंब होता है, जो उसे लागू करती है।
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