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ब्लैक मंडे क्या है? ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी क्या दोहराएगी 1987 का ब्लैक मंडे?
डोनाल्ड ट्रंप की नई टैरिफ नीति और चीन के कड़े जवाब ने वैश्विक बाजारों में हलचल मचा दी है। विशेषज्ञों को डर सता रहा है कि कहीं यह विवाद फिर से 1987 जैसे ‘ब्लैक मंडे’ को न दोहराए। उस दिन बाजारों में भारी गिरावट आई थी और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई थी।
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अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में हलचल मची है। अमेरिका और चीन के बीच छिड़ी टैरिफ वॉर ने फिर से 1987 के "ब्लैक मंडे" की डरावनी यादें ताज़ा कर दी हैं। उस दिन की तबाही इतनी भयानक थी कि दुनिया की सबसे बड़ी शेयर मार्केट न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज एक ही दिन में करीब 22.6% गिर गई थी। अब जब अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर से टैरिफ पॉलिसी को उग्र रूप दे रहे हैं, दुनिया भर के निवेशक और विशेषज्ञ एक ही सवाल पूछ रहे हैं – कहीं फिर से ब्लैक मंडे जैसे हालात तो नहीं बनने जा रहे?
क्या था ब्लैक मंडे?
19 अक्टूबर 1987 को अमेरिका के शेयर बाजार में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी। इस दिन को इतिहास में "ब्लैक मंडे" कहा गया। Dow Jones Industrial Average एक ही दिन में 508 पॉइंट्स गिर गया था, जो उस समय के हिसाब से 22.6% की गिरावट थी। यह गिरावट न केवल अमेरिका, बल्कि ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, और भारत सहित दुनिया के लगभग सभी बड़े शेयर बाजारों में दर्ज की गई थी। कारण थे ओवरवैल्यूएशन, कंप्यूटराइज्ड ट्रेडिंग सिस्टम की फेलियर और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं।
अब क्या कर रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप?
डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी वापसी की राह पर चलते हुए फिर से अपनी 'रेसिप्रोकल टैरिफ पॉलिसी' का बिगुल बजा दिया है। इस पॉलिसी के तहत ट्रंप चाहते हैं कि अगर कोई देश अमेरिकी सामान पर टैक्स लगाता है, तो अमेरिका भी उनके सामान पर उतना ही या उससे ज्यादा टैक्स लगाए।
चीन ने इसके जवाब में अमेरिका से आने वाले सामान पर 34% तक टैरिफ लगा दिया है। इसके अलावा चीन ने 11 अमेरिकी कंपनियों को 'अनरिलायबल एंटिटी' की सूची में डाल दिया है, जोकि उनके लिए चीन में कारोबार करना लगभग असंभव बना देगा।
चीन की जवाबी कार्रवाई से क्यों मचा हड़कंप?
चीन ने अमेरिका से आने वाले कई संवेदनशील उत्पादों पर लाइसेंसिंग सिस्टम लागू कर दिया है, जिसमें दुर्लभ और महंगे मेटल एलिमेंट्स शामिल हैं जो स्मार्ट बमों, इलेक्ट्रिक कारों और स्पेस टेक्नोलॉजी के लिए जरूरी होते हैं। इसके अलावा, चीन ने मेडिकल इमेजिंग डिवाइसेज, ज्वार, और चिकन जैसे कई अमेरिकी प्रोडक्ट्स के इम्पोर्ट पर रोक लगाने की योजना बनाई है। यह सब तब हो रहा है जब अमेरिका खुद चीन पर तकनीकी और आर्थिक नियंत्रण के लिए माइक्रोचिप्स और सेमीकंडक्टर्स के एक्सपोर्ट पर पहले से ही पाबंदियाँ लगा चुका है।
एक तरफ ट्रंप की टैरिफ नीति अमेरिकी लोकल इंडस्ट्री को प्रोत्साहित करने का दावा करती है, लेकिन इसके नतीजे अक्सर वैश्विक बाजार में डर पैदा करते हैं।
यदि दोनों देश एक-दूसरे पर टैक्स लगाते रहे, तो इससे इंटरनेशनल ट्रेड बुरी तरह प्रभावित होगा, कीमतें बढ़ेंगी, सप्लाई चेन टूटेगी और शेयर मार्केट में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है। यही डर 1987 के ब्लैक मंडे से जुड़ा हुआ है। उस समय भी बाजारों में डर का माहौल था और एक अफवाह ने पूरी दुनिया को हिला दिया था।
क्या भारत पर भी होगा असर?
बिलकुल! भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और इसका शेयर बाजार विदेशी निवेश पर काफी निर्भर करता है। अगर अमेरिका और चीन की यह ट्रेड वॉर लंबी चली, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगा सकता है और भारतीय शेयर बाजार में भी भारी गिरावट देखी जा सकती है। इसके अलावा, भारत के टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और फार्मा सेक्टर पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा, क्योंकि इन क्षेत्रों में कच्चा माल या तकनीकी उपकरण दोनों देशों से आते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या हम फिर से ब्लैक मंडे की ओर बढ़ रहे हैं? तो यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि फिर से वैसी ही गिरावट देखने को मिलेगी, लेकिन एक बात साफ़ है डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी और चीन की जवाबी कार्रवाई ने वैश्विक आर्थिक सिस्टम में अस्थिरता की लहर फैला दी है। निवेशक सहमे हुए हैं, और शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव का दौर तेज़ हो गया है। अगर ये तनाव जल्द नहीं थमे, तो 2025 में हमें एक और बड़ा झटका लग सकता है – जो 1987 के ब्लैक मंडे से कम नहीं होगा।
ट्रंप की टैरिफ पॉलिसी और चीन का पलटवार केवल दो देशों की आपसी लड़ाई नहीं है, यह ग्लोबल इकॉनमी के लिए एक बड़ा संकेत है कि किस तरह राजनीतिक फैसले करोड़ों लोगों की आजीविका को प्रभावित कर सकते हैं। आने वाला वक्त बताएगा कि क्या यह लड़ाई थमेगी या फिर पूरी दुनिया एक और "ब्लैक मंडे" का गवाह बनेगी।
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