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Congress की वो 6 गलतियां जिसकी कीमत आज भी चुका रहा India

आज हम आपको बताएंगे कांग्रेस राज की वो 6 गलतियां जिसका भारत पर एक गहरा असर पड़ा है।कुछ गलतियां तो ऐसी हैं जिसका खामियाजा आज भी भारत भुगत रहा है तो आज हम कांग्रेस की इन्हीं गलतियों के बारे में बात करेंगे

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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस यह दावा करती है कि हमारे नेताओं ने देश को आजाद कराने में बड़ी भूमिकाएं निभाई हैं। हमारे नेता पंडित जवाहर लाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री रहे हैं। इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को आजाद कराया। लेकिन आज हम आपको बताएंगे कांग्रेस राज की वो 6 गलतियां, जिसका भारत पर एक गहरा असर पड़ा है। कुछ गलतियां तो ऐसी हैं, जिसका खामियाजा आज भी भारत भुगत रहा है। तो आज हम कांग्रेस की इन्हीं गलतियों के बारे में बात करेंगे।

1. UNSC में सीट

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हिंदुस्तान को आज भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानि UNSC में स्थायी सीट हासिल करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है और इसकी सबसे बड़ी वजह है चीन, जो हर बार अपनी वीटो पॉवर का इस्तेमाल करते हुए कहता है कि अगर भारत इसका दावेदार हो सकता है तो फिर पाकिस्तान को पीछे क्यों छोड़ा जाए। और यह वीटो पॉवर चीन को मिला कैसे, यह भी जान लीजिए, इसकी सबसे बड़ी वजह जवाहर लाल नेहरू को माना जाता है क्योंकि कुछ साल पहले 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट में कांग्रेस नेता शशि थरूर की किताब 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया' का हवाला दिया गया था। किताब में थरूर लिखते हैं कि

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 'नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया'

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1953 के आसपास भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य बनने का प्रस्ताव मिला था, यह और बात है कि नेहरू ने चीन को वरीयता दी। थरूर के मुताबिक, भारतीय राजनयिकों ने वह फाइल देखी थी जिस पर नेहरू के इनकार का जिक्र था। पंडित नेहरू ने यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।

कांग्रेस नेता भी मानते हैं कि नेहरू की वजह से भारत को UNSC में सीट नहीं मिल सकी। नहीं तो आज चीन नहीं, भारत के पास UNSC में स्थायी सदस्यता के साथ ही वीटो पॉवर होता।

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2. नेपाल का भारत में विलय

अब बात करते हैं नेपाल के भारत में विलय की। पहली बार तो शायद आप भी सुनकर दंग रह गये होंगे कि क्या भला नेपाल भी कभी भारत में विलय करना चाहता था। तो जनाब यह बिल्कुल सच है और यह बात खुद कांग्रेस के दिग्गज नेता और देश के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने खुलासा किया है, जिन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'द प्रेसिडेंशियल ईयर्स' में लिखा है।

प्रेसिडेंशियल ईयर्स

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नेपाल के राजा त्रिभुवन बीर बिक्रम शाह ने नेहरू को सुझाव दिया था कि नेपाल को भारत का एक प्रांत बनाया जाए, लेकिन नेहरू ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र है और उसे ऐसा ही रहना चाहिए।

नेपाल और भारत के बारे में यूं ही नहीं कहते हैं कि दोनों देशों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है। दोनों ही हिंदू देश हैं। यहां की संस्कृति और भाषा भी मिलती-जुलती है। और अगर नेहरू ने नेपाल के राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया होता तो नेपाल भी आज भारत का हिस्सा होता।

3. कोको द्वीप

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अंडमान निकोबार द्वीप समूह, नाम तो सुना ही होगा और यह बात भी जानते होंगे कि यहां शान से भारत का तिरंगा लहराता है। तो वहीं एक सच यह भी है कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह के पांच हजार द्वीपों में से एक कोको द्वीप भी है, जिस पर भारत नहीं, म्यांमार का कब्जा है। पता है क्यों। इसके लिए भी नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जाता है। क्योंकि

1947 में जब भारत आजाद हुआ तो लक्षद्वीप, अंडमान और निकोबार की तरह कोको आइलैंड की स्थिति भी स्पष्ट नहीं थी। अंग्रेज एक मजबूत स्वतंत्र भारत नहीं चाहते थे, इसलिए इन द्वीपों को देने के पक्ष में नहीं थे। इनका सामरिक भी महत्व था, यही वजह है कि इंडिया इंडिपेंडेंस बिल में अंडमान निकोबार द्वीप समूहों को तो भारत में रखा गया, इस हिसाब से कोको द्वीप भी भारत का हिस्सा होना चाहिए था। लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन ने नेहरू से कहा कि वो इसे लीज पर ब्रिटेन को दे दें, और 19 जुलाई 1947 को माउंटबेटन ने बताया कि भारत सरकार ने कोको आइलैंड पर उनकी राय मान ली है।

कहते हैं यह नेहरू की ऐतिहासिक भूल थी। जहां सरदार पटेल ने लक्षद्वीप पर पाकिस्तानी नजर को कुंद कर दिया, वहीं नेहरू कोको द्वीप के मामले में आसानी से लॉर्ड माउंटबेटन की बात मान गये, और बाद में इसी कोको द्वीप को अंग्रेजों ने म्यांमार को दे दिया।

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4. कच्चातिवु द्वीप

रणनीतिक रूप से अहम कच्चातिवु द्वीप भारतीय तट से 33 किलोमीटर दूर रामेश्वरम के उत्तर पूर्व में स्थित है जबकि श्रीलंका के जाफना से करीब 62 किलोमीटर दूर है। यानि भारत के बेहद करीब और श्रीलंका से बहुत दूर। लेकिन इसके बावजूद 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के एक फैसले की वजह से कच्चातिवु द्वीप भारत से छिन गया। दरअसल,

भारत से चला गया कच्चातिवु

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इंदिरा गांधी ने भारत-श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को हमेशा के लिए सुलझाने का प्रयास किया, और एक समझौते के एक हिस्से के रूप में इंदिरा गांधी ने कच्चातिवु को श्रीलंका को सौंप दिया। उस समय उन्होंने सोचा कि इस द्वीप का कोई रणनीतिक महत्व नहीं है, और इस भारत का दावा खत्म करने से श्रीलंका के साथ संबंध और गहरे हो जाएंगे। हालांकि समझौते के मुताबिक भारतीय मछुआरों को अभी भी इस द्वीप तक जाने की इजाजत थी, लेकिन 1976 में भारत में इमरजेंसी की अवधि के दौरान एक और समझौता हुआ जिसमें किसी भी देश को दूसरे के विशेष आर्थिक क्षेत्र में मछली पकड़ने से रोक दिया गया।

इस तरह से 14वीं शताब्दी में ज्वालामुखी के विस्फोट से बना करीब 285 एकड़ का यह कच्चातिवु द्वीप भी भारत के हाथ से चला गया और श्रीलंका पर इसका कब्जा है।

5. पाक सेना का सरेंडर

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1962 में चीन से जंग हारे हिंदुस्तान को कमजोर समझकर पाकिस्तान ने 1965 में जम्मू कश्मीर पर कब्जा करने के लिए ऑपरेशन जिब्राल्टर चलाया था, जिसके तहत कश्मीरियों के भेष में 25 से 30 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को कश्मीर में भेज दिया गया था। ऐसे में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी भारतीय सेना को अटारी बाघा बॉर्डर से अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने का आदेश दे दिया था, जिसका असर यह हुआ कि भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ते हुए लाहौर के बड़े हिस्से को कब्जे में ले लिया था। जिससे घबराया पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र पहुंच गया, जिसके दखल के बाद युद्ध रुक सका। लेकिन तब तक भारत ने लाहौर के 470 वर्ग मील क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था। हालांकि समझौते के तहत भारत को अपनी सेना वापस बुलानी पड़ी, नहीं तो लाहौर आज भारत के पास होता। इतना ही नहीं भारत के पास बेहतर मौका था कि वो लाहौर के बदले कश्मीर को लेकर निर्णायक डील कर सकता था। लेकिन कांग्रेस राज में ऐसा कुछ भी संभव नहीं हो सका।

6. भारत-पाक 1971 जंग

65 की जंग के सिर्फ छ साल बाद एक बार फिर भारत को पाकिस्तान के साथ जंग लड़नी पड़ी। इस बार पूर्वी पाकिस्तान यानि आज के बांग्लादेश को पाकिस्तानी सेना के चंगुल से आजाद कराने की जंग थी, क्योंकि अगर पाकिस्तान के कब्जे में बांग्लादेश आ जाता तो पाकिस्तान भारत को दो तरफा घेर सकता था। ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी ने भारतीय सेना को बांग्लादेश में उतार दिया, जिसने ऐसा पराक्रम दिखाया कि पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को भारत के आगे घुटने टेकने पड़े। यह दुनिया के इतिहास में सरेंडर की सबसे बड़ी घटना थी, जिसकी तस्वीर से पाकिस्तान आज भी बिलबिला उठता है।

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लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि 71 की इस जंग से भारत को क्या मिला? भारत के पास मौका था कि वो अगर चाहता तो बांग्लादेश की आजादी की मदद के बदले कम से कम एक गलियारा मांग सकता था, जिससे पश्चिम बंगाल के कोलकाता से त्रिपुरा के अगरतला जाने के लिए 1600 किलोमीटर की जो दूरी तय करनी पड़ती है, वो घट कर महज 500 किलोमीटर रह जाती। इसके अलावा भारत को चिकन नेक (मैप पर दिखा देना) के साथ ही कोलकाता से अगरतला तक एक और गलियारा मिल जाता,लेकिन तत्कालीन इंदिरा सरकार ने बांग्लादेश से ये बेहतरीन डील का मौका गंवा दिया।इतना ही नहीं कश्मीर के एक हिस्से पर पाकिस्तान कुंडली मार कर बैठा है तो इसके पीछे भी किसका हाथ रहा है। ये आपको बताने की जरुरत नहीं है।गृहमंत्री अमित शाह ने भरे सदन में पीओके के लिए सीधे तौर पर नेहरू सरकार पर आरोप लगा दिया।


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