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ये नया भारत है...दबाव में नहीं आएगा! मोदी से पहले लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा और अटल बिहारी तक, जानें हिंदुस्तान की कूटनीति के आगे कब-कब पस्त हुआ अमेरिका?
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25% एडिशनल टैरिफ़ लगाने की घोषणा कर दी. यानी कुल मिलाकर भारत पर भारी भरकम 50% टैरिफ़ थोप कर ट्रंप ने अपनी भड़ास निकाली है. भड़ास इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि ट्रंप की मंशा थी कि शायद टैरिफ के डर से भारत रूस के साथ कच्चे तेल का आयात रोक दे. ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब अमेरिका और भारत के बीच रिश्तों इस मोड़ पर आए. इससे पहले भी अमेरिका ने भारत की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश की है.
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20 जनवरी 2025, ये वो तारीख जब सुपरपावर अमेरिका के तख़्त ओ ताज पर एक बार फिर ट्रंप शासन आया. डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति पद की शपथ ली और अमेरिका को मिला 47वां राष्ट्रपति. डोनाल्ड ट्रंप आते ही एक्टिव मोड में नज़र आए. एक के बाद एक कई फ़ैसलों से उन्होंने दुनिया को हैरत में डाल दिया. उनके फ़ैसलों में दबाव की नीति की झलक साफ़ दिखी और भारत भी इससे अछूता नहीं रहा. जो ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में भारत के साथ दोस्ताना रिश्ते साझा करते थे, वही 2.0 में आंखें दिखाने लगे. ट्रंप ने आते ही भारत समेत कई देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ का ऐलान कर दिया. इसके बाद 7 अगस्त 2025 को पहली बार अमेरिका ने भारत पर 25% टैरिफ लगा दिया. इसके क़रीब 19 दिन बाद ही ट्रंप ने फिर टैरिफ़ को लेकर बड़ी घोषणा की. ये घोषणा थी भारत पर एडिशनल 25% टैरिफ़ लगाने की. यानी कुल मिलाकर भारत पर भारी भरकम 50% टैरिफ़ थोप कर ट्रंप ने अपनी भड़ास निकाली. भड़ास इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि ट्रंप की मंशा थी कि शायद टैरिफ़ के डर से भारत दूसरे देशों से व्यापारिक रिश्ते ख़त्म कर देगा. क्योंकि अमेरिका चाहता है कि भारत रूस से कच्चे तेल का आयात रोक दे. इसलिए टैरिफ़ का डर दिखाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की. ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब अमेरिका और भारत के बीच रिश्तों इस मोड़ पर आए. इससे पहले भी अमेरिका ने भारत की नीतियों को प्रभावित करने की कोशिश की है. फर्क केवल इतना है कि मौजूदा वक़्त में अमेरिका व्यापार को हथियार बना रहा है, जबकि पहले रक्षा और भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को प्रभावित करने की कोशिश की थी. चलिए जानते हैं कब-कब अमेरिका ने भारत पर दबाव की रणनीति अपनाई और भारत ने कैसे अपनी कूटनीति से अमेरिका को सबक़ सिखाया.
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजेपयी ने एक नहीं, बल्कि अमेरिका के दो-दो राष्ट्रपति के शासन में दबाव को अपनी कूटनीति से हराया. इनमें पहला नाम अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का है, तो दूसरे थे जॉर्ज बुश.
परमाणु परीक्षण को रोकने की कोशिश
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साल 1998 में जब परमाणु परीक्षण किया तो अमेरिका ने भारत पर कई प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दिया. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने वॉशिंगटन में भारतीय दूतावास को धमकी भरे लहजे में एक मैसेज भेजा.
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बिल क्लिंटन ने कहा था-
‘मैं बर्लिन जा रहा हूं. वहां तक पहुंचने में मुझे छह घंटे लगेंगे. अगर तब तक भारत सरकार बिना शर्त सीटीबीटी पर दस्तखत कर देती है तो मैं कोई प्रतिबंध नहीं लगाऊंगा’
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CTBT से मतलब Comprehensive Nuclear-Test-Ban Treaty (व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि) से है.
बिल क्लिंटन की इस प्रतिक्रिया पर भारत ने कोई जवाब नहीं दिया. PM ऑफिस से भारतीय राजदूत नरेश चंद्रा को निर्देश दिए गए कि वह अमेरिका को तब तक कोई जवाब न दे जब तक भारत अगले दिन सभी परमाणु परीक्षण पूरे नहीं कर लेता.
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(Photo- बिल क्लिंटन, पूर्व राष्ट्रपति, अमेरिका )
भारत के परमाणु परीक्षण को रोकने के लिए अमेरिका ने कई तरह के प्रतिबंध लगाए. जैसे- हथियारों की बिक्री पर रोक, विश्व बैंक जैसे संस्थानों से मिलने वाली आर्थिक मदद रोक दी. इसके बावजूद भारत नहीं झुका और प्रधानमंत्री अटल बिहारी सरकार ने साफ़ कर दिया कि परमाणु परीक्षण भारत के लिए कितना ज़रूरी है. भारत ने परमाणु परीक्षण पोखरण- 2 पूरा किया. हालांकि इस बीच कई दिनों तक पर्दे के पीछे भी कूटनीति चली. भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह और अमेरिका के तत्कालीन विदेश मंत्री स्ट्रॉव टॉलबॉट की कई मुलाक़ातें हुईं. लंबी बातचीत के बाद आख़िरकार भारत ने अमेरिका को अपने पक्ष में कर ही लिया. साल 1999 में अमेरिका ने भारत से सभी प्रतिबंध हटा दिए. साल 2000 में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत आए और दोनों के रिश्ते वापस पटरी पर लौट आए.
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(Photo- परमाणु परीक्षण के दौरान एपीजे अब्दुल कलाम के साथ पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी)
पोखरण 1 के समय भी अमेरिका ने भारत पर इसी तरह के दबाव की कोशिश की थी. तब, अमेरिकी राष्ट्रपति गेराल्ड फ़ोर्ड ने तत्कालीन PM इंदिरा गांधी के लिए अपशब्द तक कह दिए थे. अमेरिका ने परमाणु ईंधन, तकनीकी और आर्थिक सहायता पर प्रतिबंध लगा दिए थे, लेकिन अमेरिका की दादागिरी के आगे इंदिरा ने हार नहीं मानी. उन्होंने स्वदेशी तकनीकी विकास और परमाणु कार्यक्रम को जारी रखा.
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(Photo- पोखरण परमाणु परीक्षण)
बुश के दौर में अपनाई ये रणनीति?
साल 2003 में अमेरिका-भारत संबंधों के बीच उस वक़्त तनाव आ गया जब अमेरिका ने इराक़ पर हमला बोल दिया. अमेरिका चाहता था कि युद्ध के बाद भेजे जाने वाली स्टेबलाइज़ेशन फ़ोर्स में भारत अपने सैनिक भेजे. जबकि भारत इसके पक्ष में नहीं था. कई और देशों ने भी इसे फ़िज़ूल कि लड़ाई करार दिया. वहीं, भारत तेल के लिए खाड़ी देशों पर ही निर्भर था ऐसे में भारत को अंदाज़ा था कि उसका एकतरफ़ा पक्ष भारी पड़ सकता है. यहां खाड़ी देशों में काम कर रहे 40 लाख भारतीय मज़दूरों की वापसी भी सरकार की बड़ी चिंता थी.
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(Photo Credit- सोशल मीडिया)
इसके साथ ही अमेरिका के इराक़ पर हमले को लेकर भारत में विपक्ष ने भी वाजेपयी सरकार पर दबाव डाला कि वह संसद में अमेरिका की निंदा करे. इसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय का एक बयान आया. जिसमें कहा गया कि, ‘इराक़ में हो रही सैनिक कार्रवाई को उचित नहीं ठहराया जा सकता’.
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इसके बाद जॉर्ज बुश ने अटल बिहारी वाजपेयी को फ़ोन कर अपने रुख़ में नरमी बरतने की अपील की. क़रीब दो महीने की बातचीत और कूटनीति के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि, ‘हम नहीं चाहते कि हमारे जवान एक मित्र देश में गोलियों का निशाना बनें’.
तनाव नहीं समानता को दी तरजीह
अटल बिहारी वाजपेयी अमेरिका से रिश्ते ख़राब नहीं करना चाहते थे लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं था कि वह अमेरिका की हर बात मानें. उस वक़्त भी भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति पर दबाव के ख़िलाफ़ था. सरकार की कोशिश थी कि दोनों देशों के बीच तनाव की बजाय बराबरी, और समानता को तरजीह दी जाए.
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(Photo Credit- सोशल मीडिया)
जब पाकिस्तान की पैरवी करने पर भड़के अटल बिहारी वाजपेयी
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कारगिल की लड़ाई के दौरान बिल क्लिंटन ने पाकिस्तान के तत्कालीन PM नवाज़ शरीफ़ को अमेरिका बुलाया था. उसी समय क्लिंटन ने अटल बिहारी वाजपेयी को भी अमेरिका आने का न्योता भेजा था, लेकिन वाजपेयी ने वहां जाने से इंकार कर दिया था. उनका कहना था कि, वह अमेरिका तब तक नहीं आएंगे, जब तक पाकिस्तान का एक भी सैनिक भारत की भूमि पर है. अटल बिहारी वाजपेयी से पहले इंदिरा गांधी और उनसे पहले लाल बहादुर शास्त्री ने भी अमेरिका के दबाव में अपने हितों से समझौता नहीं किया.
‘जय जवान-जय किसान’ से दिया जवाब
1965 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी तब भारत गंभीर खाद्य संकट से जूझ रहा था. अमेरिका एक स्कीम के ज़रिए भारत में गेहूं भेजता था. अमेरिका ने भारत को धमकी दी कि, अगर उसने पाकिस्तान के साथ जंग ख़त्म नहीं कि तो वह गेहूं भेजना बंद कर देगा. अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने भारत का गेहूं बंद करने की धमकी दी. इस पर लाल बहादुर शास्त्री ने दो टूक कह दिया कि ‘आप गेहूं देना बंद कीजिये, हम अपने आत्मसम्मान से समझौता करने को तैयार नहीं हैं’.
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यहीं से लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान जय किसान' का नारा बुलंद किया. जो आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है. भारत में सरकारें बदलती रहीं लेकिन विदेशी नीति में भारत की तटस्थता और पारस्परिकता से समझौता नहीं किया गया. लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक ने अमेरिका को माकूल जवाब दिया.