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अमेरिका ने घोषित किया था ग्लोबल आतंकी, अब बने सीरिया के नए राष्ट्रपति, जानें कौन हैं अहमद अल शरा

सीरिया में बशर अल असद की सत्ता को उखाड़ने के बाद पहली बार चुनाव हुए. सीरिया के नए राष्ट्रपति अहमद अल शरा होंगे. ये वो ही अल शरा हैं जिन्हें साल 2013 में अमेरिका ने स्पेशल डेसिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट करार दिया था और 88 करोड़ का इनाम भी रखा था.

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गृहयुद्ध से तबाह हुए सीरिया में 14 साल बाद संसदीय चुनाव हुए हैं. बशर अल असद के सत्ता से बेदखल होने के बाद अहमद अल शरा अंतरिम राष्ट्रपति बने थे. इस चुनाव में अल शरा की जीत लगभग तय मानी जा रही है. उन्होंने सत्ता संभालने के बाद वादा किया था कि, यह चुनाव 'लोकतांत्रिक बदलाव' की दिशा में पहला कदम होगा, लेकिन असलियत में इस चुनाव में जनता को वोट देने का अधिकार मिला ही नहीं. 

सीरिया के लोकतांत्रिक चुनाव के दावे पर सवाल उठ रहे हैं. इसे महज दिखावे का चुनाव माना जा रहा है. जनता के साथ-साथ राजनीतिक दल भी चुनावी प्रक्रिया से बाहर हैं. अल शरा की नई पीपुल्स असेंबली में 210 सीटें हैं, जो अल-असद के कार्यकाल से 40 सीटें कम है. 

अमेरिका ने अल शरा को आतंकी घोषित किया था

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दिसंबर साल 2024 में सीरिया में तख्तापलट के बाद अहमद अल-शरा ने अमेरिका और पश्चिमी देशों से संबंध बेहतर बनाने की ओर कदम बढ़ाए हैं. ये वो ही अल शरा हैं जिन्हें साल 2013 में अमेरिका ने स्पेशल डेसिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट करार दिया था. लेकिन सीरिया में तख्तापलट के बाद अल शरा के राष्ट्रपति पद पर काबिज होने के बाद अमेरिका ने उन्हें आतंकी सूची से बाहर कर दिया.

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सीरिया में कैसे हुए चुनाव? 

सीरिया की नई संसद में 210 सदस्य हैं. इनमें से 140 सीटों पर 7,000 इलेक्टोरल कॉलेज सदस्यों ने वोटिंग की. राष्ट्रपति शरा के नियुक्त 70 सीटों के जरिए महिलाओं, अल्पसंख्यकों और सहयोगी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की बात कही गई है. माना जा रहा है यही सीटें सरकार की स्थायी बहुमत सुनिश्चित करेंगी. 7 अक्टूबर को अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल शरा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुद नतीजे जारी करेंगे. 

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जनता को वोटिंग प्रक्रिया से बाहर क्यों किया? 

सीरिया की चुनावी प्रक्रिया से आम नागरिकों को बाहर किए जाने का कारण सरकार ने जनगणना को बताया है. सरकार का तर्क है कि, गृहयुद्ध और विस्थापन के कारण जनगणना और मतदाता लिस्ट बनाना असंभव है. करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास डॉक्यूमेंट्स नहीं हैं. ये पूरी प्रक्रिया बेहद लंबे समय तक चल सकती थी. इसलिए जनमत की बजाय चुनाव का सीधा तरीका निकाला गया. हालांकि विरोधियों ने इन चुनावों को सत्ता का नाटक करार दिया है. पूर्ववर्ती सरकार बशर अल-असद की पार्टी ने भी इसे 'कठपुतली चुनाव' कहा है. 

अहमद अल शरा के विरोधियों के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन ने भी इस पर ऐतराज जताया है. यूरोप के कई NGO का कहना है कि, यह लोकतांत्रिक नहीं बल्कि प्रशासनिक चुनाव है और सब कुछ सरकार के कंट्रोल में है. 

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राष्ट्रपति अल शरा को किन देशों का साथ मिला? 

सीरिया की चुनावी प्रक्रिया और नई सरकार का रूस और चीन ने स्वागत किया है. दोनों देशों ने इन चुनावों को सीरिया में स्थिरता के लिए जरूरी कदम बताया है. साथ-साथ जनता को चुनाव से बाहर रखने के कारण को भी जायज माना. रूस और चीन दोनों का मानना है कि, युद्धग्रस्त देश में तुरंत जनमत प्रक्रिया नामुमकिन है. 
ईरान ने भी अल शरा सरकार को सीरिया के पुनर्निर्माण का केंद्र माना है. चुनाव देश में राजनीतिक प्रक्रिया को बनाए रखने की गारंटी है. जिसमें विपक्ष को भी आगामी समय में शामिल किया जाएगा. 

क्या सीरिया में नई सरकार के लिए तैयार हैं लोग? 

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विरोधी जहां इन चुनावों को केवल दिखावा मान रहे हैं दूसरी ओर सीरियाई नागरिक तानाशाह बशर अल असद परिवार के सत्ता से बाहर जाने पर खुश हैं. लोग नए विकल्प के तौर पर अल शरा शासन को अपमाने के लिए तैयार हैं. अरब सेंटर के एक सर्वे के मुताबिक, 61% सीरियाई लोग लोकतंत्र चाहते हैं, जिसमें हर किसी को बोलने और चुनाव लड़ने का हक हो. वहीं 8% लोग इस्लामी कानून के हिसाब से शासन चाहते हैं, जिसमें कोई चुनाव न हो. वहीं 6% लोग सिर्फ इस्लामी पार्टियों को ही राजनीति में चाहते हैं. हालांकि सवाल अभी भी बरकरार हैं, क्या ये सरकार जनता को चुनावों के लिए आजाद और सुरक्षित माहौल देगी. क्या बिना राजनीतिक विरोधियों के शासन करेगी? क्योंकि 30 सितंबर को ही टारटोस में एक उम्मीदवार की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. 

अहमद अल शरा का आतंकी से राष्ट्रपति बनने का सफर

सीरिया के नए राष्ट्रपति अहमद अल-शरा कभी अल-कायदा के सदस्य थे. साल 2003 में जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था, तब वह अल कायदा से जुड़कर अमेरिका के खिलाफ उतरे थे. अल शरा 4 साल तक अमेरिका की कैद में भी रहे. जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने अबू मोहम्मद अल-जोलानी नाम से एक विद्रोही संगठन बनाया. इस संगठन ने बशर अल असद सरकार के खिलाफ लड़ाई के दौरान अल कायदा से नाता खत्म कर लिया. साल 2016 में अमेरिका ने उन्हें आतंकी घोषित किया था, उन पर 88 करोड़ का इनाम भी रखा था.

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दिसंबर 2024 में उनके संगठन ने असद को सत्ता से हटा दिया. 29 जनवरी 2025 को उन्हें अंतरिम राष्ट्रपति नियुक्त किया गया. इसके बाद उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप से मई में मुलाकात की थी. इस मुलाकात के बाद जुलाई 2025 में अमेरिका ने अल शरा का नाम आतंकी लिस्ट से हटा लिया. 

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