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शताब्दी वर्ष में संघ करने जा रहा अपने संगठन में बड़ा बदलाव, बदल जाएगी पूरी संरचना, 6 साल से चल रहा था मंथन

RSS अपने शताब्दी वर्ष में संगठन के स्तर पर बड़ा बदलाव करने जा रहा है. नई व्यवस्था के बाद संघ की कार्य पद्धति बिल्कुल बदल जाएगी और स्वयंसेवकों में जान फूंक दी जाएगी.

RSS Office Delhi / Mohan Bhagwat (File Photo)
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर साल 2025 को शताब्दी वर्ष के तौर पर मना रहा है. इस दौरान संघ ने देशभर में कार्यशालाओं का आयोजन किया, विभिन्न सेक्टर्स के साथ बैठकें कीं, संवाद किया और एक तरह से दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन को पूरी दुनिया को खुद को देखने-समझने का मौका दिया. सूत्रों के मुताबिक संघ अपने संगठनात्मक ढांचे में बड़ा बदलाव करने जा रहा है.

संघ अपनी शाखा, संगठन और संवाद प्रक्रिया के जरिए फैसलों के लिए जाना जाता है. उसकी देशभर में शाखाएं, वर्ग और विभिन्न अनुषांगिक संगठन हैं. वहीं देश के कोने-कोने में प्रचारक से लेकर विभिन्न स्तर के पदाधिकारी होते हैं, उन्हीं के जरिए संघ अपने निर्णय लेता है और गतिविधियां करता है. यही संघ की ताकत है. हालांकि समय, काल और परिस्थिति को देखते हुए संघ अपने आप में तब्दीली भी लाता रहता है. वही कुछ एक बार फिर करने जा रहा है. दरअसल अब RSS अपनी आंतरिक संरचना में व्यापक परिवर्तन पर विचार कर रहा है. कहा जा रहा है कि ये प्रस्तावित बदलाव आने वाले समय को देखते हुए, भविष्य की चुनौतियों और डिलिवरी को ध्यान में रखते हुए लिया जा रहा है.

ये पहली बार नहीं है जब संघ कोई अमूलचूल परिवर्तन करने जा रहा है. इससे पहले भी संघ ने अपनी पारंपरिक गणवेश खाकी चड्डी में बदलाव का फैसला किया था. इस निर्णय पर भी पहुंचने में संघ को तीन साल लगे थे. तब भी इसकी खूब चर्चा हुई थी कि जिस ड्रेस के साथ संघ की स्थापना चली आ रही है, जिससे संघ की मूल पहचान जुड़ी हुई है, उसे कैसे बदला जा सकता है. हालांकि बाद में आम सहमति बनी और ड्रेस कोड को खाकी चड्डी से फुल पैंट कर दिया गया.

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संघ क्या करने जा रहा है नया बदलाव?

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सूत्रों की मानें तो संघ में प्रांत प्रचारक (Prant Pracharak) की जगह संभाग प्रचारक (Sambhag Pracharak) नियुक्त किए जाने पर विचार किया जा रहा है. इस नई संरचना का प्रभाव संघ की दशकों से चली आ रही प्रांत प्रचारक की व्यवस्था और परंपरा पर पड़ेगा. जानकारी के मुताबिक संगठनात्मक कामकाज को और अधिक प्रभावी और ज़मीनी स्तर पर सशक्त कार्यशक्ति के विकास के लिए नई व्यवस्था लाई जा रही है. इसमें प्रांत प्रचारकों की तुलना में संभाग प्रचारकों का कार्यक्षेत्र छोटा होगा. इतना ही नहीं, पूरे राज्य में संघ के काम का समन्वय करने के लिए हर राज्य में एक राज्य प्रचारक की व्यवस्था की जाएगी.

कैसे होगा संभाग का गठन?

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संघ द्वारा प्रस्तावित नए बदलाव में प्रांत प्रचारक की भूमिका बढ़ जाएगी. न्यूज 18 इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार दो सरकारी मंडलों (कमिश्नरी) को मिलाकर एक संभाग बनाया जाएगा. मसलन यूपी में सरकारी तौर पर कुल 18 प्रमंडल हैं. वहीं संघ के जिले और मंडलों की अपनी व्यवस्था के तहत पूरे यूपी को छह प्रांतों (ब्रज, अवध, मेरठ, कानपुर, काशी और गोरक्ष) में विभाजित किया गया है. इस लिहाज से देखें तो 18 मंडलों को मिलाकर 9 संभाग बनाए जाएंगे. यानी कि पहले जो 6 प्रांत प्रचारक हुआ करते थे, वहां अब 9 संभाग प्रचारकों की नियुक्ति की जाएगी. वहीं पूरे राज्य में संघ के कामकाज में समन्वय बनाने के लिए एक राज्य प्रचारक की भी व्यवस्था की जाएगी.

अब कैसा होगा संघ का ज़मीन पर संगठन?

इस बदलाव का सीधा असर क्षेत्र प्रचारकों की संख्या और उनकी जिम्मेदारियों पर पड़ने वाला है. फिलहाल संघ की संरचना की बात करें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए एक अलग क्षेत्र प्रचारक है, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लिए संयुक्त तौर पर एक अन्य क्षेत्र प्रचारक कार्यरत है. नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन दोनों ही जगहों पर केवल एक ही क्षेत्र प्रचारक होगा, जो पूरे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का दायित्व संभालेगा. हालांकि दोनों राज्यों के राज्य प्रचारक नई व्यवस्था के तहत अलग-अलग ही रहेंगे.

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इसी तरह राजस्थान को भी संघ की दृष्टि से नए सिरे से जोड़ा जा रहा है. संघ के विजन के तहत अब राजस्थान को उत्तर क्षेत्र के अंतर्गत रखा जाएगा, जिसमें दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब पहले से शामिल हैं. इस पूरे क्षेत्र के लिए भी केवल एक ही क्षेत्र प्रचारक होगा.

संघ की नई संरचना में होंगे कुल 9 क्षेत्र प्रचारक!

अब तक संघ में देशभर में कुल 11 क्षेत्र प्रचारक होते थे, लेकिन नई संरचना लागू होने के बाद यह संख्या घटकर 9 रह जाएगी. वहीं पूरे देश में लगभग 75 संभाग प्रचारक कार्यरत रहेंगे. संघ के भीतर यह बदलाव उसकी बढ़ती गतिविधियों, कार्य के विस्तार और संगठनात्मक संतुलन को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है.

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अब हर वर्ष नहीं होगी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक?

इतना ही नहीं, संघ की बैठकों की संरचना में भी बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है. मार्च महीने में होने वाली संघ की सबसे बड़ी बैठक, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा, अब हर साल आयोजित नहीं की जाएगी. नए फैसले के तहत यह बैठक अब हर तीन साल में एक बार नागपुर में होगी. हालांकि दीपावली के आसपास आयोजित होने वाली अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक पहले की तरह हर साल जारी रहेगी.

अगले साल मार्च में लग सकती है प्रस्तावों पर मुहर!

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सूत्रों के मुताबिक, संघ की इस नई संगठनात्मक रचना पर पिछले 5 से 6 वर्षों से लगातार मंथन चल रहा था. लंबे और गहन विचार-विमर्श के बाद अब इन बदलावों पर आम सहमति बनती नजर आ रही है. माना जा रहा है कि मार्च 2026 में प्रस्तावित अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में इन प्रस्तावों पर अंतिम मुहर लग सकती है और वर्ष 2027 से ये बदलाव संघ के कामकाज में ज़मीनी स्तर पर दिखाई देने लगेंगे.

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