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काबुल में भारत के प्रभुत्व को कम करने की चाल फेल, पाकिस्तान बुरी तरह फंसा, तालिबान ने इस्लामिक भाईचारे की हवा निकाल दी!

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में भारत के प्रभुत्व को खत्म करने के इरादे से तालिबान को पैसे, हथियार, रणनीतिक, कूटनीतिक, हर प्रकार की मदद दी, लेकिन उसका दांव उल्टा पड़ गया. काबुल में तालिबानियों के आने के बाद से पाक फौज लगातार जंग में है, उसके जवान मारे जा रहे हैं. इस्लामिक भाईचारे की हवा ही निकल गई है.

पाकिस्तान की अफगान नीति फेल (फाइल फोटो)
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पाकिस्तान आर्थिक, समाजिक और बौद्धिक रूप से दिवालियेपन का शिकार हो गया है. जिन्ना ने धर्म के नाम पर मुल्क बनाया. उसका कहना था कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते इसलिए भारत का विभाजन कर एक अलग देश बनाया जाए. उसकी इस थ्योरी का जनाजा 1971 में निकल गया जब पूर्वी पाकिस्तान महज भाषा और कल्चर के आधार पर अलग होकर बांग्लादेश बन गया. इसके बाद बारी अफगानिस्तान की थी, जिसे पाकिस्तानी रणनीतिकार अपना पांचवा सूबा बनाने का ख्वाब देखते, अपना ही हिस्सा मानते थे. 

उनकी सोच थी कि अफगानिस्तान के लोग भी मुसलमान हैं और उसका कल्चर मिलता है इसलिए उनका उन्हें कब्जाने का अधिकार है, लेकिन इतिहास गवाह है कि इस्लामाबाद ने हमेशा मार खाई है. चाहे करजई, अशरफ गनी हों या फिर तालिबान सरकार. पाकिस्तान और अफगानिस्तान की हालिया जंग और सैन्य तनाव बताता है कि टू नेशन थ्योरी बिल्कुल एक स्वार्थ और ईगो के आधार पर रची गई साजिश थी. नहीं तो आज बांग्लादेश नहीं होता और अफगानिस्तान से उसकी डूरंड लाइन और TTP-TTA के नाम पर लड़ाई नहीं हो रही होती.

पाकिस्तान की अफगानिस्तान को कब्जाने की नीति फेल!

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पाकिस्तान की अफगानिस्तान नीति, जो लंबे समय से भारत के खिलाफ “रणनीतिक गहराई” हासिल करने की सोच पर आधारित थी, अब उलटी पड़ती दिखाई दे रही है. एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के बढ़ते हमलों, अफगान शरणार्थियों के बड़े पैमाने पर पलायन और बढ़ती अंतरराष्ट्रीय आलोचना के कारण यह नीति अब खुले संघर्ष में बदलती जा रही है.

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तालिबान को काबुल में बैठाना पाकिस्तान को पड़ा भारी

आपको बताएं कि ‘वन वर्ल्ड आउटलुक’ की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान ने तालिबान को समर्थन देकर काबुल में अपने अनुकूल सरकार बनने की उम्मीद की थी, लेकिन यह दांव अब उसके लिए उलटा पड़ गया है. आपको याद होगा कि जब अगस्त  2021 में गनी की सरकार गई, तालिबान ने काबुल पर कब्जा किया तो तत्लाकील ISI के चीफ लेफ्टिनेंट जनरल फैज हमीद वहां पहुंचे और चाय के प्याले को हाथ में लेकर कहा था अब सब ठीक है.

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उनकी वो कूटनीतिक मुस्कान वाली तस्वीर काफी वायरल हुई थी. इसका अंदाजा लगाया गया कि शायद हमीद ये कहना चाह रहे थे कि काबुल में उनका ही सिक्का चलेगा. इतना ही नहीं तालिबान के आने के बाद तब के पाकिस्तानी पीएम इमरान खान ने कहा था कि गुलामी की जंजीरें तोड़ दी गई हैं. हालांकि तालिबान की संप्रभुता के दावे और टीटीपी के साथ उसके संबंधों ने दोनों देशों के रिश्तों को और तनावपूर्ण बना दिया है.

भारत से निपटने चला था पाकिस्तान, खुद फंस गया!

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान ने तालिबान के नेताओं को शरण दी और एक दोस्ताना काबुल सरकार के सहारे आतंकियों को नियंत्रित करने और भारत के प्रभाव को संतुलित करने की उम्मीद की थी. हालांकि 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद स्थिति बदल गई और अफगानिस्तान में मौजूद ठिकानों से टीटीपी के हमले बढ़ने लगे.

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पाकिस्तान से रोके नहीं रुक रहे TTP के हमले

2025 तक खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी के हमलों में कई लोग मारे गए और 2026 की शुरुआत में ही नौ जिलों में 37 हमले दर्ज किए गए. रिपोर्ट के मुताबिक, तालिबान ने इन हमलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं की, जिससे पाकिस्तान ने दबाव बनाने के लिए सीमा बंद करने जैसे कदम उठाए, जिससे अफगान व्यापार पर असर पड़ा.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 22 फरवरी को पाकिस्तान ने नंगरहार और पक्तिका में टीटीपी और आईएसकेपी के सात ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिनमें 80 आतंकियों के मारे जाने का दावा किया गया. हालांकि इन हमलों में 18 नागरिकों, जिनमें बच्चे भी शामिल थे, की मौत से अफगानिस्तान में भारी गुस्सा भड़क गया. इसके जवाब में 26 फरवरी को अफगानिस्तान ने ड्रोन हमले और सीमा पर झड़पें शुरू कीं. काबुल के अनुसार इन कार्रवाइयों में 55 पाकिस्तानी सैनिक मारे गए और कई चौकियों पर कब्जा कर लिया गया.

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पाकिस्तान-तालिबान की जंग लंबे समय तक याद रखी जाएगी

इसके बाद पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन ग़ज़ब-लिल-हक़’ शुरू किया, जिसके तहत काबुल, कंधार और पक्तिया में 46 हवाई हमले किए गए और घुदवाना क्षेत्र में लगभग 32 वर्ग किलोमीटर इलाके पर नियंत्रण का दावा किया गया. रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इसे “खुला युद्ध” करार दिया, जबकि मार्च तक झड़पें जारी रहीं और ड्रोन गिराए जाने तथा करीब 150 तालिबान लड़ाकों के मारे जाने की खबरें सामने आईं.

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रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पाकिस्तान द्वारा 2023 से शुरू किया गया अफगान शरणार्थियों का निष्कासन अभियान संकट को और बढ़ा रहा है. अब तक 15 लाख से अधिक अफगान शरणार्थियों को देश से निकाला जा चुका है.

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