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1916 का ऐतिहासिक समझौता,जानें गंगा बचाने के लिए पहला आंदोलन कब, क्यों और कैसे हुआ?

1916 में, अंग्रेज सरकार ने हरिद्वार में एक बांध बनाने की योजना बनाई, जिससे हर की पौड़ी के पानी का प्रवाह रुक सकता था। इस फैसले का हरिद्वार के पंडों और सनातन संस्कृति के अनुयायियों ने कड़ा विरोध किया। जब बात बिगड़ने लगी, तब पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया।

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एक वक्त था जब गंगा की अविरल धारा पर संकट मंडरा रहा था। अंग्रेज सरकार हरिद्वार में एक बड़ा बांध बनाने जा रही थी। इसके निर्माण से हर की पौड़ी का प्रवाह रुक सकता था, और हिंदू समाज की आस्था पर यह सीधा प्रहार था। लेकिन उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह निर्णय इतिहास के पन्नों में एक बड़े आंदोलन की नींव रख देगा। पंडित मदन मोहन मालवीय, जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं के लिए समर्पित थे, इस अन्याय को सहन नहीं कर सके। उन्होंने गंगा को बचाने के लिए पहला बड़ा आंदोलन छेड़ा, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को झुका दिया।
मदन मोहन मालवीय का गंगा संदेश 
गंगा बचाने की यह क्रांति एक दिलचस्प घटना से शुरू हुई। एक रात पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने सपना देखा एक तपस्वी, जो गंगा किनारे वर्षों से तपस्या कर रहा था, अचानक जल में समा जाता है। यह सपना सिर्फ सपना नहीं था, बल्कि एक संदेश था। उनके गुरु ने संकेत दिया कि गंगा संकट में है और इसे बचाने के लिए उन्हें आगे आना होगा। सुबह होते ही हरिद्वार से एक पत्र आया। इस पत्र में वहां के पंडों और पुरोहितों ने मालवीय जी से गंगा को बचाने की अपील की थी। पत्र पढ़ते ही उन्हें समझ आ गया कि उनका सपना सिर्फ संयोग नहीं था, बल्कि गंगा मां का आदेश था।
दरअसल अंग्रेजों ने 1916 में एक योजना बनाई हरिद्वार में गंगा नदी पर एक बांध बनाया जाए, जिससे पानी की धारा नियंत्रित की जा सके और कृषि व व्यापार को बढ़ावा दिया जाए। लेकिन असली समस्या यह थी कि इस बांध से गंगा का प्रवाह रुक जाता, जिससे सनातन धर्म की महत्वपूर्ण परंपराएँ, जैसे तर्पण और स्नान बाधित हो जाते। हर की पौड़ी के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा था। जब यह खबर फैली, तो पूरे उत्तर भारत में सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच हलचल मच गई। गंगा सिर्फ एक नदी नहीं थी, वह आस्था और संस्कृति की आत्मा थी।
आंदोलन की शुरुआत
पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने हरिद्वार जाने का फैसला किया। जैसे ही उन्होंने इस मुद्दे को उठाया, देशभर के धर्मगुरु, संन्यासी, पंडित और आम लोग हरिद्वार की ओर चल पड़े। यह आंदोलन धीरे-धीरे एक बड़ी क्रांति का रूप लेने लगा। हरिद्वार में एक भव्य सभा बुलाई गई, जिसमें देश के कई राजा-महाराजा भी शामिल हुए। इनमें ग्वालियर, जयपुर, बीकानेर, पटियाला, अलवर और बनारस के राजा भी मौजूद थे। वे समझ चुके थे कि अगर आज गंगा पर हमला हुआ, तो कल भारत की संस्कृति पर भी संकट आएगा। जब आंदोलन तेज हुआ, तो अंग्रेज सरकार पर भारी दबाव पड़ा। आखिरकार, ब्रिटिश सरकार ने तीन दिन की मैराथन बैठक बुलाई। इसमें भारत की ओर से पंडित मदन मोहन मालवीय और कई राजा शामिल हुए, जबकि अंग्रेजों की ओर से लेफ्टिनेंट गवर्नर सर मेस्टन मौजूद थे। तीन दिन तक लगातार चर्चा चली। मालवीय जी ने तर्क दिया कि गंगा केवल पानी की धारा नहीं, बल्कि भारत की जीवनरेखा है। अगर इसे रोका गया, तो यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर आघात होगा। तीन दिनों के बाद, अंग्रेजों को झुकना पड़ा और एक ऐतिहासिक समझौता हुआ।
साल 1916 का गंगा समझौता
इस समझौते के दो महत्वपूर्ण बिंदु थे। गंगा की अविरल धारा कभी रोकी नहीं जाएगी, और गंगा पर कोई भी बड़ा बदलाव हिंदू समाज से परामर्श के बिना नहीं किया जाएगा। हालांकि अंग्रेज जब तक भारत में रहे, उन्होंने इस समझौते का पालन किया। लेकिन आज़ाद भारत में ही गंगा पर बांध और बैराज बनने लगे। आज गंगा पर छह बड़े बांध और कई बैराज बनाए जा चुके हैं, जो इसके प्रवाह को बाधित कर रहे हैं। कानपुर से लेकर फरक्का तक गंगा को कई जगह रोका गया है। जो अंग्रेजों ने भी नहीं किया, वह आज़ाद भारत में हुआ!

191 में पंडित मदन मोहन मालवीय ने जो संघर्ष किया, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आज भी गंगा की अविरलता और शुद्धता खतरे में है। महाकुंभ 2025 के दौरान, प्रयागराज में गंगा और यमुना नदियों के जल की गुणवत्ता पर गंभीर चिंताएँ उभरी हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के अनुसार, इन नदियों में फेकल कोलीफॉर्म (मलजनित बैक्टीरिया) का स्तर स्नान के लिए निर्धारित मानकों से अधिक पाया गया है। यह स्थिति न केवल श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करती है, बल्कि धार्मिक आस्थाओं पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
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