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'अतीत की धूल बना गजनवी...', PM मोदी ने किया सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के बाद इसके पुनरुत्थान की अमर गाथा को स्मरण

"ईरान मिस्त्र रोमां सब मिट गए जहां से/कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी...", सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण के 1000 साल पूरे होने पर पीएम मोदी ने एक भावुक लेख लिखा है. उन्होंने अपनी लेखनी में लाखों सनातनियों की भावनाओं को आवाज दी है. उन्होंने दो टूक लिखा कि सोमनाथ आज भी खड़ा है...आस्था को ना मिटा सकते हैं ना झुका सकते हैं.

Somnath Mandir / Gujarat Tourism
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सनातन धर्म और भारत का सबसे प्राचीन-पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस पवित्र आस्था और धार्मिक केंद्र को बार-बार लूटा गया, आक्रांताओं द्वारा करीब 17 बार इसे विखंडित करने का प्रयास किया गया, लेकिन ये आज भी हिंदुओं और पूरी दुनिया की आस्था के केंद्रे के रूप में अडिग खड़ा है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसी संबंध में एक लेख लिखा है और सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनरुत्थान की उस गाथा को स्मरण किया है.

'आस्था को न तो मिटा सकते हैं, ना झुकाया जा सकता'

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय संस्कृति के आस्था के केंद्र सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनरुत्थान की उस गाथा को स्मरण किया है, जो भारतीय सभ्यता की अमर चेतना का प्रतीक है. वर्ष 1026 में, आज से ठीक एक हजार वर्ष पहले, इस पवित्र मंदिर पर पहला भीषण आक्रमण हुआ था. इसका उद्देश्य केवल एक मंदिर को तोड़ना नहीं था, बल्कि भारत की आस्था और सांस्कृतिक आत्मा को कुचलना था. फिर भी, सहस्राब्दियों बाद आज भी सोमनाथ मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है और बताता है कि आस्था को न तो मिटाया जा सकता है और न ही झुकाया जा सकता है. 

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'बार-बार हमले के बावजूद अडिग खड़ा है सोमनाथ मंदिर'

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उन्होंने एक्स पोस्ट में लिखा, "जय सोमनाथ! वर्ष 2026 में आस्था की हमारी तीर्थस्थली सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं. बार-बार हुए हमलों के बावजूद हमारा सोमनाथ मंदिर आज भी अडिग खड़ा है! सोमनाथ दरअसल भारत माता की उन करोड़ों वीर संतानों के स्वाभिमान और अदम्य साहस की गाथा है, जिनके लिए अपनी संस्कृति और सभ्यता सदैव सर्वोपरि रही है."

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'पापों से मुक्ति और आत्मिक शांति की दिलाता है सोमनाथ'

गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ, द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान रखता है. शास्त्रों के अनुसार, इसके दर्शन से पापों से मुक्ति और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है. यही आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व इसे बार-बार विदेशी आक्रमणों का लक्ष्य बनाता रहा. जनवरी 1026 में गजनी के महमूद द्वारा किए गए आक्रमण ने गहरी पीड़ा छोड़ी, पर भारत की चेतना को समाप्त नहीं कर सका.

'खंडित मंदिर उठ सकता है तो भारत भी अपने प्राचीन गौरव को प्राप्त कर सकता है'

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पीएम मोदी ने अपने ब्लॉग पोस्ट में बताया है कि सोमनाथ की कहानी केवल विनाश की नहीं, बल्कि हजार वर्षों से चले आ रहे संघर्ष, बलिदान और पुनर्निर्माण की कहानी है. यह मंदिर आज भी दुनिया को संदेश देता है. 2026 में, पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी अडिग खड़ा सोमनाथ हमें प्रेरित करता है कि यदि एक खंडित मंदिर फिर से उठ सकता है, तो भारत भी अपने प्राचीन गौरव के साथ पुनः विश्व को मार्ग दिखा सकता है.

 सोमनाथ के विध्वंस और पुनरुत्थान की कहानी को PM मोदी ने किया याद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ब्लॉग में सोमनाथ मंदिर के विध्वंस और पुनरुत्थान की अद्भुत कहानी को स्मरण किया है, जो भारत की सभ्यतागत चेतना को परिभाषित करती है. वर्ष 1026 ईस्वी में, आज से ठीक एक हजार साल पहले, सोमनाथ का पहला विध्वंस हुआ था. लेकिन सहस्र वर्षों बाद आज भी सोमनाथ मंदिर अभूतपूर्व गौरव के साथ खड़ा है और यह सन्देश देता है कि आस्था को न तो मिटाया जा सकता है और न ही झुकाया जा सकता है.

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'ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख'

पीएम मोदी ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि 'सोमनाथ' शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है. भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है. द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है. ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है...“सौराष्ट्रे सोमनाथं च...यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है. 

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क्या है सोमनाथ का आध्यात्मिक महत्व?

ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है. शास्त्रों में ये भी कहा गया है कि सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है. मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है. 

जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने किया था आक्रमण!

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दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था. वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं. जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था. यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था. फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है.

कब और कैसे हुआ सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण!

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पीएम मोदी ने आगे लिखा, "साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुनर्निर्मित करने के प्रयास जारी रहे. मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका. संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है. 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे."

पीएम मोदी ने पोस्ट में कहा कि सन् 1026 में, आज से लगभग एक हजार वर्ष पहले, सोमनाथ मंदिर पर पहला आक्रमण हुआ. उस समय के अत्याचार का उल्लेख कई ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलता है. इन्हें पढ़कर मन दुख से भर उठता है. हर जगह हिंसा और पीड़ा की छाप दिखाई देती है, जिसका दर्द आज भी महसूस किया जा सकता है. उस दौर में इस घटना का भारत और यहां के लोगों के मनोबल पर गहरा असर पड़ा होगा. 

महज पूजा नहीं आध्यात्मिक और सामाजिकता का केंद्र सोमनाथ मंदिर: PM मोदी

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सोमनाथ मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं था, बल्कि उसका आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व बहुत बड़ा था. वह लोगों को जोड़ता था और एक समृद्ध समाज का प्रतीक था. समुद्री व्यापारी इसकी समृद्धि की कहानियां दूर-दूर तक ले जाते थे. इतने हमलों और लंबे गुलामी काल के बावजूद सोमनाथ की कहानी केवल विनाश की नहीं है. यह हजार वर्षों से चले आ रहे भारतीय स्वाभिमान, आस्था और संघर्ष की कहानी है. सोमनाथ मंदिर पर हुए हर आक्रमण पर लोगों ने साहस दिखाया, बलिदान दिए और मंदिर को फिर से खड़ा किया. यही भारत की शक्ति है.

महमूद गजनवी ने मंदिर लूटा लेकिन भावना नहीं छीन सका: PM मोदी

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पीएम मोदी ने कहा कि महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका. सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ. उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं के भीतर सांस लेती रही. आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है. वह आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है. ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया. उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें. 1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे.

उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे. ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे."

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पीएम मोदी ने कहा कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया. 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई. उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा. अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए. उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे.

'सोमनाथ मंदिर के जिर्नोद्धार से खुश नहीं थे पंडित नेहरू'

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पीएम मोदी ने आगे कहा, "तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे. वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें. उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी. लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया. सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है. उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था. सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए."

'आज भारत पर दुनिया की नजर'

जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है. 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः' जैसे विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है. आज भारत पर दुनिया की नजर है. दुनिया हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है. हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं. योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं.

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'सोमनाथ आज भी खड़ा, अतीत के आक्रमणकारी बने समय की धूल'

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है. आज भी सोमनाथ के दर्शन से मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है. 1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं. उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है. जबकि, अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं. उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है. 

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'कट्टरता में विनाश और विकृत ताकत, आस्था में सृजन की शक्ति'

सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है. करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है. ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है.

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पीएम ने ब्लॉग का समापन करते हुए लिखा, "अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं. आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं. एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए. एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है. जय सोमनाथ !"

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