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जहां हुआ सिंगर जुबीन गर्ग का अंतिम संस्कार, वहां बना स्मारक…खास निशानी के साथ उमड़े लाखों फैंस, गूंजा ‘मायाविनी’

अपने चहेते कलाकार की स्मारक को देखने असम के लोग हर रोज दूर-दूर से यहां पहुंच रहे हैं. फैंस स्मारक को देखने 500 से 800 किलोमीटर की दूरी भी तय कर रहे हैं.

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आइकॉनिक सिंगर जुबीन गर्ग अब दुनिया में नहीं रहे. उनके निधन के बाद दुनियाभर से लोगों ने अपने-अपने अंदाज में उन्हें श्रद्धांजलि दी. असम के लोगों के लिए जुबीन गर्ग महज एक कलाकार और सिंगर नहीं थे. असम वासी उन्हें अपना भगवान मानते थे और अब उन्होंने जुबीन के नाम ‘देवालय’ भी बना दिया. 

गुवाहाटी से 31 किलोमीटर दूर कमरकुची गांव. यहीं पर 23 सितंबर को जुबीन गर्ग का अंतिम संस्कार किया गया था. इस गांव में जुबीन गर्ग का स्मारक बनाया गया है जिसे फैंस देवालय मान लिया. करीब 10 बीघा जमीन जुबीन गर्ग को स्मारक स्थल को दी गई है. अपने चहेते कलाकार की स्मारक को देखने असम के लोग हर रोज दूर-दूर से यहां पहुंच रहे हैं. फैंस स्मारक को देखने 500 से 800 किलोमीटर की दूरी भी तय कर रहे हैं. 

स्मारक पर चढ़ी लाखों चिट्ठियां और खास गमछे

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एक रिपोर्ट के मुताबिक, जुबीन गर्ग के अंतिम संस्कार के बाद 36 दिनों में 5 लाख से ज्यादा लोग उनके स्मारक पर पहुंच चुके हैं. हर दिन 5 हजार से 10 हजार लोग उनके समाधि स्थल पर पहुंच रहे हैं. फैंस उनकी स्मारक पर जुबीन के नाम एक नोट और खास गमछा चढ़ाते हैं. इस गमछे पर ‘जय जुबीन दा’ लिखा होता है. वहीं, चिट्ठी में अपने लाड़ले सिंगर के लिए फैंस की भावनाएं लिखी होती हैं.

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दरअसल, जुबीन गर्ग अपनी असमिया पहचान से बेहद प्यार करते थे. बॉलीवुड में कई सुपरहिट सॉन्ग गाने वाले जुबीन ने असम कभी नहीं छोड़ा. वह कॉन्सर्ट में भी असमिया गमछे को चूमते थे. उनकी समाधि पर आने वाले लोगों का कहना है कि, जुबीन अनजान शख्स की भी दिल खोलकर मदद करते थे. उनके लिए वह किसी देवता से कम नहीं थे. 

गरीबों का सहारा बने, जरूरतमंद का हाथ थामा 

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जुबीन गर्ग ने असमिया लोगों के दर्द को अपना दर्द समझा. लोगों का कहना है कि, वह गरीब बीमार लोगों का इलाज करवाते थे. लोगों का हर दुख बांटते थे. उनके साथ असम के लोगों का आत्मीय रिश्ता है. उनकी समाधि पर आने वाले लोग बेहद इमोशनल हो जाते हैं. उनका कहना है कि, यह कोई समाधि या श्मशान स्थल नहीं है बल्कि देवालय है. लोगों की दीवानगी इस कदर है कि स्मारक तक जाने के लिए कई घंटे तक लाइन में इंतजार करते हैं. शायद ही कहीं ऐसा नजारा दुनिया में देखा गया होगा जब एक कलाकार के लिए लाखों लोग निकल आएं. 

असमिया लोग जुबीन गर्ग के बारे में एक और बात कहते हैं. जुबीन गर्ग किसी जाति-धर्म में कोई भेदभाव भी नहीं करते थे. उन्होंने मुस्लिम बच्चों की पढ़ाई के लिए 10 लाख से ज्यादा का डोनेशन दिया था. वह अपने कॉन्सर्ट में भी कहते थे, ‘मेरी कोई जाति नहीं है, धर्म नहीं है, भगवान नहीं हैं. मैं मुक्त हूं, कंचनजंघा हूं.’ मुस्लिम लोग अपने बच्चों को जुबीन गर्ग जैसा बनाना चाहते हैं. इसीलिए वह अपने बच्चों को स्मारक पर लेकर आते हैं. 

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(जुबीन गर्ग के स्मारक स्थल पर गमछा चढ़ा रहे लोग)

जुबीन गर्ग के गाने बने प्रार्थना

देशभर के लोगों की जुबां पर जुबीन गर्ग का या अली गाना चढ़ा है, लेकिन असम के लोग उनके असमिया गानों को पार्थना के समान मानते हैं. जुबीन गर्ग अपने कॉन्सर्ट में एक असमिया गाना जरूर गाते थे उसका नाम है- मायाविनी रातिर बुकुत. 

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इस गाने के बाद जुबीन गर्ग एक बात जरूर कहते थे, ‘जब मैं मरूंगा, तो पूरे असम में यह गाना बजा देना’. फैंस ने वैसा ही किया जुबीन गर्ग के निधन के बाद लोगों की आंखों में सैलाब था और होंठों पर ‘मायाविनी’ सॉन्ग. ये रोमांटिक गाना असम में अब प्रार्थना बन गया. स्मारक स्थल पर भी इसी गाने की धुन 24 घंटे बजती है. 

सिंगर जुबीन गर्ग का निधन कब हुआ? 

19 सितंबर 2025 को सिंगापुर में जुबीन गर्ग की मौत की खबर आई. बताया गया कि, स्कूबा डाइविंग के दौरान जुबीन की मौत हुई है. इसके बाद सिंगापुर से उनका शव भारत लाया गया. 23 सितंबर को गुवाहाटी के कमरकुची गांव में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया. उनके निधन पर असम में तीन दिन का शोक मनाया गया था. उनके आखिरी दर्शन के लिए लाखो लोग सड़कों पर जुट गए. जुबीन गर्ग ने अपने करियर में या अली समेत कई शानदार गाने गाए थे. वह असम के हार्थरोब कहे जाते थे.

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(जुबीन गर्ग की अंतिम यात्रा मेें उमड़ा पूरा असम)

जुबीन ने अपने 33 साल के करियर में 40 भाषाओं में लगभग 38 हजार गाने गाए थे. उन्होंने असमिया और बंगाली फिल्मों में भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा. जुबीन अब अपने फैंस के बीच नहीं है लेकिन वह हमेशा के लिए इनके दिलों में रह गए. फैंस ने उन्हें अमर कर दिया. 

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