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RSS के 100 साल: क्यों चंदा नहीं लेता संघ, कैसे चलता है संगठन...जानें पहली गुरुदक्षिणा की ऐतिहासिक कहानी

आखिर क्यों RSS चंदा नहीं लेता? बिना डोनेशन ये संगठन काम कैसे करता है और क्यों RSS में चंदे की रिवाज नहीं चलिए जानते हैं पूरी कहानी

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राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने अपने 100 साल पूरे कर लिए हैं. दुनिया का ये सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन न केवल कई ऐतिहासिक पलों का गवाह बना बल्कि खुद इतिहास रचा भी. संघ के शताब्दी वर्ष में जानते हैं संघ के चंदे से जुड़ी ऐतिहासिक कहानी. आखिर क्यों RSS चंदा नहीं लेता? बिना डोनेशन ये संगठन काम कैसे करता है और क्यों RSS में चंदे की रिवाज नहीं चलिए जानते हैं पूरी कहानी

साल 1973 की बात है जब बाला साहब देवरस सरसंघचालक हुआ करते थे. गोपाष्टमी के दिन RSS का पथसंचलन होना था. लेकिन उस वक्त ये संगठन पैसों की भारी कमी से जूझ रहा था. पथसंचलन के लिए बैंड बाजा तो दूर एक कोई वाद्य यंत्र तक नहीं था. ऐसे में RSS सरसंघचालक देवरस, बाबा साहब आप्टे और दादा राव परमार 
जैसे वरिष्ठ कई मील पैदल चलकर एक शख्स के पास पहुंचे और यहां से गुरुदक्षिणा के तौर जो राशि मिली उससे एक बिगुल खरीदा गया. 

RSS में क्यों नहीं है चंदा लेने की प्रथा? 

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के आर मलकानी अपनी किताब The RSS Story में लिखते हैं इस पूरी प्रक्रिया में तीन घंटे लग गए थे. ऐसा नहीं है कि उस वक्त RSS को कोई दानदाता नहीं मिला. इस संगठन ने शुरूआत में ही दान न लेने का नियम बना लिया था. 

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उस समय पथसंचालन के लिए RSS बैंड बाजा और सभी वाद्य यंत्रों के लिए आसानी से पैसे जुटा सकती थी. संघ को दान देने के लिए कई लोग सामने आए. इनमें से एक मदन मोहन मालवीय भी थे. मदन मोहन मालवीय उन दिनों ‘मनी मेकिंग मशीन’ के तौर पर जाने जाते थे. उन्होंने नागपुर में RSS संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मुलाकात की थी. इस दौरान उन्होंने हेडगेवार से कहा, क्या संघ के लिए धन जुटाने में कुछ मदद चाहिए? हेडगेवार ने इससे साफ इंकार कर दिया. उन्होंने कहा, हमें मनी नहीं मैन चाहिए. दरअसल, RSS का नियम था की वह संगठन में पैसे नहीं आदमी जोड़े. फिर संघ के सदस्य ही संगठन को मजबूत बनाने के लिए अपनी श्रद्धा से मदद करें. इसे गुप्त रूप से गुरुदक्षिणा के तौर पर स्वीकार किया जाएगा. 

संघ के सिद्धांतों में आत्मनिर्भरता का संदेश 

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संघ ने अपने उदय के साथ ही आत्मनिर्भरता का संदेश दिया. चंदा न लेने का सिद्धांत भी इसी पर आधारित था. डेहगेवार की सोच थी कि कोई संस्था या शख्स चंदा देकर संघ के नियमों को प्रभावित न कर सके. उनका मानना था कि, संघ किसी पर निर्भर ना रहे और न ही व्यक्तिगत सोच का शिकार हो. वह सदियों से चली आ रही सनानती पंरपराओं पर ही आगे बढ़े. 

इसके पीछे हेडगेवार का ये भी मानना था कि चंदा मांगने जाओ तो लोग शक की निगाहों से देखते हैं. सगंठन चंदे का कैसे इस्तेमाल करेगा? इसमें संगठन का नीजि फायदा तो नहीं. ऐसे तमाम सवालों का सामना कार्यकर्ताओं को करना पड़ सकता था. ऐसे में संघ ने धन जुटाने के लिए पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई. ताकि संघ बिना किसी के नियंत्रण में आए अपना काम सुचारू रूप से चला सके. हालांकि ऐसा नहीं है कि संघ ने कभी आर्थिक मदद नहीं ली. 1925 में स्थापना के बाद कुछ लोगों से आर्थिक मदद ली थी लेकिन 3 साल बाद नई व्यवस्था बनाई गई. जिसमें चंदे जैसा कोई नियम नहीं था. 

नाटक के टिकट, लॉटरी सिस्टम जैसे सुझाव मिले

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संघ में धन अर्जित करने के लिए नया सिस्टम लाना था. इसके लिए कई सुझाव आए. किसी ने कहा, लॉटरी सिस्टम से राशि जमा की जाए तो किसी ने नाटक का टिकट बेचने का सुझाव दिया. आखिर में सर्व सहमति इस पर बनी की बाहर से कोई भी चंदा न लेकर संघ के सदस्य ही मदद करें. ये धन गुप्त तरीके से लिफाफे में लिया जाए ताकि गरीब, अमीर, कम-ज्यादा का कोई भेदभाव न रहे. एक रुपए से लेकर एक हजार तक पूरी प्रक्रिया गुप्त तरीके से हो. डॉ. हेडगेवार ने संघ में चंदा नहीं गुरुदक्षिणा की परंपरा अपनाई. 

गुरु पूर्णिमा पर मिली पहली दक्षिणा 

डॉ. हेडगेवार की जीवनी के मुताबिक, 1928 में गुरु पूर्णिमा के दिन डॉ. हेडगेवार ने नागपुर के सभी स्वयंसेवकों से गुरु पूर्णिमा के दिन शाखा में उत्सव के लिए कुछ फूल और श्रद्धानुसार गुरुदक्षिणा लिफाफे में लाने को कहा. सभी शिष्यों के मन में ये भी सवाल था कि वह फूल या जो भी दक्षिणा लाएंगे वह अर्पित किसे करेंगे. उनका ये संशय भी कुछ ही देर में दूर हो गया. सभी लिफाफे में दक्षिणा और कुछ फूल लेकर आए. तब हेडगेवार ने उनको भगवा ध्वज पर फूल चढ़ाने और उसी पर गुरुदक्षिणा भी अर्पित करने को कहा. 

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पहली बार कितनी मिली गुरुदक्षिणा? 

इस पहले गुरु उत्सव में कुल 84 रुपये 50 पैसे की गुरुदक्षिणा आई थी. आज के दौर में इसकी तुलना करें तो यह राशि 10 से 15 हजार रुपए होगी. अभी भी संघ गुरुदक्षिणा के बजट से ही चलता है. सैकड़ों प्रचारकों और कार्यालयों का खर्च उसके स्वयंसेवकों के पैसों से ही चलता है. स्वयंसेवक बढ़ चढ़कर इस संगठन को मजबूत करने के लिए दान-दक्षिणा देते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के मुताबिक, साल 2017 में केवल दिल्ली के ही 95 हजार लोगों ने गुरुदक्षिणा दी थी.

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जीवनी के लेखक नाना पालघर लिखते हैं, डॉ. हेडगेवार नहीं चाहते थे कि, किसी भी व्यक्ति को गुरु का दर्जा मिले. उन्होंने कहा था, भगवा ध्वज हजारों सालों से इस संस्कृति के लिए प्रेरणा स्रोत रहा है. कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यों ना हो, उसमें कुछ खामियां होती ही हैं. इसलिए किसी व्यक्ति की जगह भगवा ध्वज ही हमारा गुरु होगा. हेडगेवार की इस दूरदर्शिता का ही नतीजा है कि आज भी संघ पर चंदे को लेकर सवाल नहीं उठते. 

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