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जम्मू में बीजेपी ने मारी बाजी, तो कश्मीर में कांग्रेस-NC को फ़ायदा, देखिये कौन बनाएगा सरकार ?

जम्मू कश्मीर के चुनावी नतीजे आ गए हैं। जहां जम्मू में बीजेपी ने बाज़ी मार ली है तो कश्मीर में कांग्रेस और एनसी गठबंधन को ज़्यादा सीटें मिली हैं। हालाँकि सरकार जम्मू कश्मीर में गठबंधन की बनती दिखाई दे रही है।

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Haryana में हैट्रिक लगाने वाली बीजेपी ने जम्मू में भी कमाल कर दिखाया है।क्योंकि जम्मू में अकेले बीजेपी ने अपने दम पर 29 सीटें जीत ली और विपक्ष को ख़ासकर फारुख अब्दुल्ला-राहुल गांधी को धूल चटाने का काम किया। क्योंकि जम्मू सीट पर फारुख अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कॉन्फ़्रेंस और कांग्रेस को सिर्फ़ 8 सीटें मिली। जबकि महबूबा मुफ्ती की पार्टी PDP के हाथ बिलकुल ख़ाली रह गए। जो कहीं ना कही जम्मू में विरोधियों को धूल चटानें में बीजेपी कामयाब रही है।10 साल बाद हुए चुनाव में बीजेपी की ये जीत बहुत कुछ साबित कर रही है। वहीं बात सिर्फ़ कश्मीर की करें तो यहाँ नेशनल कॉन्फ़्रेंस और कांग्रेस गठबंधन को 47 सीटें मिली हैं। बीजेपी को 0 तो पीडीपी को सिर्फ़ 3 सीटें मिली हैं। अब जम्मू में बीजेपी इसलिए जीत हासिल करने में कामयाब रही। क्योंकि जम्मू हिंदू बाहुल्य इलाका है। और कश्मीर मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है। अभी आँकड़ा एक दो सीट से उपर नीचे हो सकता है। लेकिन एक बात यहाँ साफ़ होती दिखाई दे रही है कि जम्मू कश्मीर में गठबंधन की सरकार बनती दिखाई दे रही है।अब इस गठबंधन की सरकार में पीडीपी शामिल होगी या नहीं ये देखने वाली बात है। क्योंकि पीडीपी के बिना भी कांग्रेस एलसी के पास बहुमत है। तो चलिए अब ये बात समझते हैं कि बड़े बड़े फ़ैसले के बाद भी आख़िर क्यों जम्मू कश्मीर में सत्ता हासिल करने से बीजेपी हार कई। सवाल ये भी उठता है कि कि अनुच्छेद 370 हटाने के फ़ैसले और नया कश्मीर का वादा करने वाली बीजेपी को चुनावी फ़ायदा क्यों नहीं मिला ?

370 के मुद्दे को ठीक से न समझा पाना ?


अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया और जम्मू कश्मीर का ना सिर्फ़ विशेष राज्य का दर्जा ख़त्म किया। बल्कि इसे केंद्र शासित प्रदेश भी बना दिया। ये सब करने के बाद जम्मू कश्मीर में कई महीनों तक कई प्रतिबंध लागू रहे। हालांकि 370 हटाने से लोगों को जो नुक़सान हुआ उसकी भरपाई करने की कोशिश बहुत कम हुई। दूसरी तरफ़ फारुख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती ने 370 को कश्मीरी अस्मिता से जोड़ दिया। इस कदम को कश्मीर विरोधी बताया। जिससे काफ़ी बड़ी तादाद में लोग BJP के ख़िलाफ़ खड़े हो रहे। और बीजेपी उन्हें समझाने का काट ढूँढ नहीं पाई।

अलगाववादी विरोधी कार्रवाई पड़ी भारी ?


बीजेपी ने नया कश्मीर बनाने के मक़सद से घाटी में सुरक्षा पर ज़्यादा जोर दिया। सरकार ने आतंकवाद, अलगाववाद और पत्थरबाज़ी के ख़िलाफ़ जो कार्रवाई की, उसका लोगों ने स्वागत किया। लेकिन दूसरी और ऐसा भी महसूस किया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाया जा रहा है। क्योंकि विपक्ष ने इस मुद्दे को भुनाकर ग़लत मैसेज देने की कोशिश की। यही वजह है कि बीजेपी कश्मीर में वैसे नहीं उभर पाई जैसे उसे उम्मीद थी।

नौकरियों का वादा रहा अधूरा ।


कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद बीजेपी ने नाराज़गी को ख़त्म करने के लिए नौकरियों का वादा किया ये भी वादा किया कि सरकार कश्मीर में निवेश लेकर आएगी। जिससे नौकरियाँ पैदा होंगी, हालाँकि इन वादों पर इतना काम नहीं हुआ, जिसने जनता में नाराजगी बढ़ी। और बीजेपी का कश्मीर में खेल बिगड़ गया।

सहयोगियों का नहीं मिला सहयोग ।


चुनावी फ़ायदे के लिए बीजेपी ने अल्ताफ़ बुख़ारी की पार्टी और सज्जाद लोन की पीपुल्स कॉन्फ़्रेंस जैसी पार्टियों के साथ गठबंधन कर नेशनल कॉन्फ़्रेंस और पीडीपी का दबदबा कम करने की कोशिश की। लेकिन इन पार्टियों के साथ गठबंधन करने से बीजेपी को कोई फ़ायदा नहीं मिला।

तो ये चार बड़े कारण बीजेपी की हार के रहे हैं। जम्मू कश्मीर में बीजेपी को जो उम्मीद थी। उसपर बीजेपी खरी नहीं उतर पाई। बात 2014 के विधानसभा चुनाव की करें। तो उस वक़्त PDP को 87 सीटें मिली थी। बीजेपी के खाते में 25 सीटें गई थी। जबकि NC को 15 और कांग्रेस को 12 सीटें मिली थी। लेकिन इस बार आँकड़ा बिलकुल बिगड़ गया। और गठबंधन के पाले में बोल चली गई बीजेपी के हाथ ख़ाली रह गए।

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