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‘दुनिया को मर्यादा…’ भारत को क्यों कहा जाता है विश्व गुरु? संघ प्रमुख ने आसान भाषा में बताया

मोहन भागवत ने वैश्विक अस्थिरता, तनाव और भारत की भूमिका पर अपनी बात रखी. उन्होंने अमेरिका के साथ-साथ कई देशों को संदेश दिया कि हथियारों से हर चीज का समाधान नहीं होता है.

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दुनियाभर में मची उथल-पुथल और सत्ता की अस्थिरता पर संघ प्रमुख मोहन भागवत का बड़ा बयान सामने आया है. उन्होंने सार्वजनिक मंच पर भारत के विश्व गुरु होने के मायने बड़ी ही आसान भाषा में तथ्यों के साथ समझाए. उन्होंने कहा, आज दुनिया भर में देखे जा रहे संघर्ष, सामाजिक विखंडन और अस्थिरता का समाधान केवल प्रौद्योगिकी, पूंजी या सैन्य शक्ति से नहीं किया जा सकता है. 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत राजस्थान दौरे पर हैं. यहां डीडवाना में वे जैन श्वेतांबर तेरापंथ के 162वें मर्यादा महोत्सव में शामिल हुए. यहां उन्होंने वैश्विक अस्थिरता, तनाव और भारत की भूमिका पर अपनी बात रखी. 

‘बिना स्वार्थ भारत सबकी चिंता करता है’

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मोहन भागवत ने भारत की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा, पूरी दुनिया भारत से मर्यादा सीखती है. भारत ही अकेला वो देश है जो बिना स्वार्थ दुनिया की चिंता करता है. भारत ने पाकिस्तान की बाढ़ में मदद की, मालदीव और नेपाल ओर श्रीलंका की भी मदद की. उन्होंने कहा, पूरे विश्व के साथ भी भारत के आत्मीयता के संबंध हैं. जो बलप और आर्थिक ताकत से नहीं बने हैं. 

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संघ प्रमुख ने कहा, भारत का ऐतिहासिक और नैतिक दायित्व है कि वह विश्व में धर्म और नैतिक मूल्यों का प्रसार करे. यह कार्य केवल भाषणों या पुस्तकों से नहीं, बल्कि अनुकरणीय आचरण से ही पूरा किया जा सकता है. भारत की सभ्यतागत परंपरा में सत्य और धर्म केवल अमूर्त विचारधाराएं नहीं हैं, बल्कि जीवन शैली हैं, जो भारतीय लोकाचार को विश्व स्तर पर अद्वितीय बनाती हैं. 

दुनिया में संघर्ष और तनाव का कारण क्या? 

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मोहन भागवत ने कहा, आज स्वार्थ सिद्धी ही दुनिया का सिस्टम बन गया है. लेकिन भारत अपना धर्म जानता है और वो ऐसा नहीं करता है. इस दौरान उन्होंने देश के कानून को भी सर्वोपरी बताया. मोहन भागवत ने कहा, देश के कानून की सबको पालना करना चाहिए. ये नागरिक कर्तव्य और अनुशासन की पहचान है, मगर कई विषयों का समाधान कानून भी नहीं कर सकता, इसलिए आगे का काम धर्म को करना पड़ता है. आज दुनिया भर में देखे जा रहे संघर्ष, सामाजिक विखंडन और अस्थिरता का समाधान केवल प्रौद्योगिकी, पूंजी या सैन्य शक्ति से नहीं किया जा सकता है. दुनिया को एक ऐसे नैतिक ढांचे की जरूरत है जो धार्मिकता की सीमाओं के भीतर मानवीय व्यवहार का मार्गदर्शन कर सके, भारत के पास यह दृष्टि है. 

RSS प्रमुख ने कहा, किसी भी विचार की प्रासंगिकता तभी स्थापित होती है जब समाज के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति उस पर अमल करते हैं. लोग उपदेशों से नहीं, बल्कि आचरण से प्रेरित होते हैं. यही कारण है कि अनुशासित, नैतिक और आध्यात्मिक जीवन जीने वालों को परंपरागत रूप से भारतीय समाज में आदर्श माना जाता रहा है. 

वैश्विक संकटों की असल वजह क्या? 

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विकास और पर्यावरण पर बोलते हुए RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, असंतुलन आज के वैश्विक संकटों का मूल कारण है. अनियंत्रित विकास की दौड़ ने प्रकृति के साथ मानवता के संबंध को कमजोर कर दिया है. भारतीय परंपरा सह-अस्तित्व और संतुलन सिखाती है. प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि सामंजस्य ही स्थायी समाधान प्रदान करता है, और यह दृष्टिकोण आज पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है. 

मोहन भागवत ने सत्य, अहिंसा, चोरी न करना, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य और आत्म-अनुशासन को भारतीय परंपरा के मूल स्तंभ बताया और इन्हें न केवल नैतिक मूल्य बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय संतुलन का आधार बताया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत ने कभी भी बल, सैन्य शक्ति या आर्थिक दबाव के माध्यम से अपने मूल्यों को दुनिया पर थोपने की कोशिश नहीं की. 

क्यों शस्त्र उठाने की जरुरत पड़ती है? 

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मोहन भागवत ने भारत को अंहिसा का देश बताया. हालांकि उन्होंने शस्त्र उठाने को समय और परिस्थितियों के अनुसार जरूरी भी बताया. मोहन भागवत ने कहा, यहां साधु संत अहिंसा का ज्ञान देते हैं, देश की नीति भी अहिंसा पर ही आधारित है. इतिहास गवाह है कि हमारे देश ने कभी भी किसी अन्य देश पर हमला नहीं किया, लेकिन जब देश की सुरक्षा की बात आई तो हमें मजबूरी में शस्त्र भी उठाना पड़ता है. 

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