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रेप कांड से बंगाल की सीएम बनने वाली Mamata Banerjee अब रेप पर चुप क्यों हैं

बंगाल में महिला डॉक्टर को इंसाफ दिलाने के लिए इस वक्त लोग सड़कों पर हैं। बंगाल में इस वक्त पुलिस और जनता आमने-सामने हैं। आरोपी को सजा दिलाने के लिए पूरा देश आवाज उठा रहा है, लेकिन सूबे की मुखिया ममता बनर्जी खामोश हैं। जानिए 31 साल पुराना वो किस्सा जिसने ममता को सीएम बनाया था, लेकिन आज रेप पर ममता की खामोशी पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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बंगाल में महिला डॉक्टर को इंसाफ दिलाने के लिए इस वक्त लोग सड़कों पर हैं। बंगाल में इस वक्त पुलिस और जनता आमने-सामने हैं। आरोपी को सजा दिलाने के लिए पूरा देश आवाज उठा रहा है, लेकिन सूबे की मुखिया ममता बनर्जी खामोश हैं। लगातार बंगाल पुलिस पर आरोप लगाए जा रहे हैं और सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। लेकिन ममता ने आरोपी के पुलिस कनेक्शन पर अभी तक कुछ नहीं बोला है, जबकि यह बात साफ तौर पर साबित हो रही है कि आरोपी संजय रॉय के पुलिस के साथ संबंध थे। लेकिन आरोपी को धर दबोचने के बजाय पुलिस प्रदर्शन कर रहे लोगों पर डंडे बरसा रही है। ऐसे में महिला डॉक्टर को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों को 31 साल पुरानी वो बात याद आ गई, जिसने ममता को पहचान दिलाई थी — रेप की वो कहानी, जिसने ममता को बंगाल की दीदी बना दिया था। उस वक्त ममता ने सत्ता में आने के लिए रेप पीड़िता के लिए जो आवाज उठाई थी, आज जब खुद की सरकार में एक लड़की के साथ रेप होता है, तो ममता की आवाज कहां गायब हो गई? चलिए, आपको ममता की लड़ाई की 31 साल पुरानी कहानी बताते हैं।

सामने आ गया ममता बनर्जी का 31 साल पुराना झूठ

साल 1993 बंगाल में ज्योति बसु की सरकार थी। बंगाल में वामपंथ का दबदबा था। उस वक्त ममता अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कर रही थीं। उस वक्त बंगाल के नदिया जिले में एक दिव्यांग लड़की के साथ बलात्कार की घटना हुई थी। पूरे बंगाल में गुस्सा था। ज्योति बसु सरकार पर हमले हो रहे थे। पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए लोग सड़कों पर थे। इसी बीच पीड़िता के साथ ममता बनर्जी एक बड़ा कदम उठाती हैं और पीड़िता को लेकर राइटर्स बिल्डिंग पहुंच जाती हैं। बिल्डिंग में पहुंचकर वह मुख्यमंत्री ज्योति बसु से मुलाकात के लिए उनके चेंबर के दरवाजे के सामने धरने पर बैठ गईं। उस वक्त ममता का आरोप था कि राजनीतिक संबंधों की वजह से ही रेप के दोषियों को गिरफ्तार नहीं किया जा रहा है। बताया जाता है कि ज्योति बसु ने उनसे मुलाकात नहीं की। जब समझाने के बावजूद भी ममता वहां से नहीं हटीं, तो पीड़िता को महिला पुलिसकर्मियों ने घसीटते हुए सीढ़ियों से नीचे उतारा और पुलिस मुख्यालय लालबाजार ले गए।

बताया जाता है कि इस दौरान ममता के कपड़े तक फट गए थे। रेप पीड़िता को इंसाफ दिलाने की इस लड़ाई के बाद ममता बंगाल का बड़ा चेहरा बन गई थीं। बंगाल में लोग ममता को दीदी कहने लगे थे। बताते हैं कि इस घटना के बाद ममता ने कसम खाई थी कि अब वह मुख्यमंत्री बनकर ही राइटर्स बिल्डिंग में कदम रखेंगी। ममता वामपंथ सरकार के खिलाफ आंदोलन करती रहीं। आखिरकार 20 मई 2011 को करीब 18 साल बाद उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेकर अपनी उस कसम को पूरा किया। लेकिन ममता के काम पर अब सवाल खड़े हो रहे हैं कि ममता की वो कसम अब कहां गई? अब वह रेप पीड़िता को इंसाफ दिलाने के लिए सड़क पर क्यों नहीं आ रही हैं? अब वह जब खुद सीएम हैं तो आरोपी को सजा क्यों नहीं दिला रही हैं?

दरअसल, हकीकत तो यह है कि यह कोई पहला मामला नहीं है जब ममता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। बल्कि इससे पहले हुए हंसखाली मामले को कैसे भुलाया जा सकता है, जब ममता ने रेप की घटना को अफेयर कहकर खारिज कर दिया था। ऐसे ही कामुदनी में हुई एक घटना का प्रदर्शन कर रहे लोगों को ममता ने माकपा समर्थक बता दिया था। ममता बनर्जी की गलतियों की डायरी में 'रेप' सबसे ऊपर है, खासकर अगर उनकी पार्टी का कोई इंसान दोषी साबित होता है। तो ममता बनर्जी उसे झूठा बता देती हैं। अगर महिला के साथ हुए रेप पर उनसे सवाल पूछा जाता है, तो वह परेशान हो जाती हैं और उल्टा विपक्ष पर साजिश का आरोप लगा देती हैं। कुल मिलाकर साफ है कि ममता की पोल खुल गई है। जो ममता 31 साल पहले रेप पीड़िता को इंसाफ दिलाने की लड़ाई लड़ती थीं, आज उनके अंदर की वो दीदी कहां गायब हो गई? कुल मिलाकर साफ है कि महिला डॉक्टर के साथ हुई इस दरिंदगी ने ममता की हकीकत सामने लाकर रख दी है। यही वजह है कि आज पूरा बंगाल ममता के खिलाफ सड़कों पर आकर इंसाफ की मांग कर रहा है। लेकिन आज ममता को न तो रेप दिख रहा है और न ही रेप पीड़िता के परिवार वालों का दर्द। बस दिख रही है तो अपनी कुर्सी।

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