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'जनता ने खारिज किया तो कोर्ट चले आए?', बिहार चुनाव रिजल्ट रद्द करने की मांग लेकर पहुंची PK की जन सुराज, SC ने लगाई फटकार

बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद जनसुराज पार्टी ने चुनाव रद्द कराने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. CJI ने कहा कि जनता के फैसले के बाद अदालत से राहत मांगना उचित नहीं है.

Prashant Kishor (File Photo)
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बिहार विधानसभा चुनाव में जनसुराज पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा है. चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर के नेतृत्व में जनसुराज पार्टी ने राज्य की 243 में से 238 सीटों पर चुनाव लड़ा था. चुनाव नतीजों में पार्टी के 236 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई, जिससे पार्टी को बड़ा झटका लगा. चुनाव परिणाम सामने आने के बाद जनसुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए बिहार विधानसभा चुनाव को रद्द करने की मांग की. पार्टी की ओर से दायर याचिका में दलील दी गई कि चुनाव से पहले विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त योजनाओं के ऐलान से मतदाताओं पर प्रभाव पड़ा, जिससे निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हो सका. इसी आधार पर चुनाव परिणामों को अवैध घोषित कर दोबारा चुनाव कराने की मांग की गई.

CJI ने अपनाया सख्त रूख 

इस याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि जनता ने किसी राजनीतिक दल को नकार दिया है, तो केवल इस आधार पर अदालत से राहत मांगना उचित नहीं है. अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी नतीजों को इस तरह की दलीलों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने जनसुराज पार्टी की याचिका को खारिज करते हुए मामले की सुनवाई से भी इनकार कर दिया. अदालत के इस फैसले के साथ ही बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर उठाए गए सभी सवालों पर विराम लग गया.

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दो जजों की बेंच ने क्या कहा?

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चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने जनसुराज पार्टी की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए पूछा कि पार्टी को कितने वोट मिले और क्या केवल हार के बाद अदालत का दरवाजा खटखटाना सही तरीका है. सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जनसुराज पार्टी ने बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी एक भी सीट जीतने में सफल नहीं रही. इस पर पीठ ने कहा कि यदि चुनाव से पहले किसी सरकारी योजना या फैसले पर आपत्ति थी, तो उस समय उसका विरोध किया जाना चाहिए था. केवल चुनावी नतीजों के बाद पूरी प्रक्रिया को ही गलत ठहराना स्वीकार्य नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के मामलों में शीर्ष अदालत का मंच इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. इसके साथ ही पीठ ने जनसुराज पार्टी को उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाने की सलाह देते हुए हाई कोर्ट जाने का विकल्प सुझाया. 

कोर्ट से जनसुराज ने वापस ली याचिका 

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शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी के बाद जनसुराज पार्टी ने अपनी याचिका वापस लेने की इच्छा जताई, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला राज्य स्तर का है और ऐसे मामलों में उचित मंच हाई कोर्ट होता है. पीठ ने यह भी कहा कि कुछ परिस्थितियों में मुफ्त योजनाओं से जुड़े मुद्दों पर न्यायिक समीक्षा संभव है, लेकिन इसके लिए सही कानूनी प्रक्रिया अपनानी होती है. सुनवाई के दौरान जनसुराज की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने दलील दी कि चुनाव से ठीक पहले एक ऐसी सरकारी योजना घोषित की गई थी, जिसके तहत मतदाताओं के बैंक खातों में सीधे राशि डाली जानी थी. उनका कहना था कि बाद में चुनाव आचार संहिता लागू होने के बावजूद संबंधित रकम लोगों के खातों में ट्रांसफर की गई, जिससे मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास किया गया. हालांकि, अदालत ने इस दलील को सुनने के बाद याचिका पर आगे सुनवाई से इनकार कर दिया और हाई कोर्ट जाने का रास्ता सुझाया.

महिला रोज़गार योजना पर जनसुराज ने उठाए थे सवाल 

जनसुराज पार्टी ने अपनी याचिका में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना को लेकर आपत्ति दर्ज कराई थी. पार्टी का कहना था कि नीतीश कुमार सरकार ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस योजना की घोषणा की, जिसके तहत प्रत्येक परिवार की एक महिला को 10 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया गया. सरकार के मुताबिक इस राशि का उपयोग महिलाएं स्वरोजगार शुरू करने के लिए कर सकती थीं. इसके साथ ही योजना में यह भी प्रावधान रखा गया कि मूल्यांकन के बाद लाभार्थी महिलाओं को आगे चलकर 2 लाख रुपये तक की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी. याचिका में तर्क दिया गया कि इस योजना को जीविका कार्यक्रम से जोड़ दिया गया, जिसमें पहले से करीब एक करोड़ महिलाएं शामिल थीं. बाद में सरकार ने गैर-पंजीकृत महिलाओं को भी इसमें नामांकन की अनुमति दी, जिससे संभावित लाभार्थियों की संख्या बढ़कर लगभग 1.56 करोड़ तक पहुंच गई.

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बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के इस रुख के बाद जनसुराज पार्टी की चुनावी चुनौती यहीं थम गई है. अदालत की सख्त टिप्पणियों ने यह साफ कर दिया है कि चुनावी हार के बाद न्यायिक मंच का सहारा लेकर जनादेश को पलटा नहीं जा सकता. ऐसे में यह मामला बिहार की राजनीति में चुनावी रणनीति, जनस्वीकृति और कानूनी सीमाओं को लेकर एक अहम उदाहरण के तौर पर देखा जा रहा है.

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