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घरेलू हिंसा से जुड़े कानून पर Supreme Court ने क्यों कहा नहीं चलेगा हिंदू-मुसलमान ?

डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 के तहत क्या घरेलू हिंसा की शिकार मुस्लिम महिलाएं भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती हैं। तो इसका जवाब है हां क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ तौर पर कह दिया कि घरेलू हिंसा के कानून में हिंदू मुसलमान नहीं चलेगा

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देश की महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए भारत सरकार ने साल 2005 में एक कानून बनाया था, जिसका नाम था डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005। इस कानून के तहत घरेलू हिंसा की शिकार महिलाएं अदालत में अपनी लड़ाई लड़ सकती हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या घरेलू हिंसा की शिकार मुस्लिम महिलाएं भी कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती हैं? तो इसका जवाब है हां, क्योंकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि घरेलू हिंसा के कानून में हिंदू और मुसलमान का भेद नहीं चलेगा।

घरेलू हिंसा के कानून में नहीं चलेगा हिंदू-मुसलमान 


डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट 2005 एक बार फिर सुर्खियों में आया है, क्योंकि…साल 2015 के फरवरी महीने में गुजारा भत्ता के लिए डीवी एक्ट के तहत एक महिला ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में अर्जी दाखिल की थी, और मजिस्ट्रेट कोर्ट ने भी अर्जी स्वीकार करते हुए निर्देश दे दिया था कि पीड़ित महिला को उसका पति हर महीने 12 हजार रुपये और मुआवजे के तौर पर एक लाख रुपये देगा।

मजिस्ट्रेट का ये फैसला पीड़ित महिला के पति को बर्दाश्त नहीं हुआ और उसने इसे चुनौती देने का फैसला किया। लेकिन अपीलीय कोर्ट ने देरी के आधार पर अर्जी ही खारिज कर दी। हालांकि, दोबारा अर्जी डालने पर इसे स्वीकार कर लिया गया, और अपीलीय कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के पास मामला भेजते हुए इस पर विचार करने के लिए कहा। इसके खिलाफ पीड़ित महिला सीधे कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंच गई। हालांकि, हाईकोर्ट से भी महिला को निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि हाईकोर्ट ने महिला की अर्जी खारिज करते हुए मजिस्ट्रेट को निर्देश दे दिया कि वह महिला के पति की ओर से डीवी एक्ट की धारा-25 के तहत दायर याचिका पर दोबारा से विचार करे। हाईकोर्ट का आदेश आते ही पीड़ित महिला ने सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जहां उसकी अर्जी को जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने सुना और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि-

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डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट नागरिक संहिता का हिस्सा है, जो भारत की हर महिला पर लागू होता है, चाहे वह किसी भी धर्म की हो। ऐसा इसलिए है ताकि संविधान के तहत उसके अधिकारों की ज्यादा प्रभावी सुरक्षा हो सके और घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को संरक्षण मिल सके।

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डीवी एक्ट की जिस धारा 25 का हवाला देकर पीड़ित महिला का पति कोर्ट गया था, उस धारा 25 पर भी टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि-

डीवी एक्ट की धारा-25 के तहत अर्जी दाखिल हो सकती है, लेकिन यह अर्जी तब दाखिल की जा सकती है जब परिस्थितियों में बदलाव हुआ हो। परिस्थितियों में बदलाव के बाद आदेश में बदलाव के लिए याचिका दायर की जा सकती है। परिस्थितियों में बदलाव का मतलब यहां इनकम में बदलाव आदि से है। यानी धारा-25 (2) का इस्तेमाल तब हो सकता है जब परिस्थितियों में बदलाव हो। पति इसलिए अर्जी दाखिल नहीं कर सकता है कि उसके द्वारा भुगतान किए गए पैसे को रिफंड किया जाए।

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कर्नाटक से आए इस मामले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बात तो साफ कर दी कि घरेलू हिंसा की शिकार महिला किसी भी जाति या धर्म की हो, सभी के लिए बराबर है। और इस कानून के तहत सभी पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलेगा। कम से कम इस कानून में हिंदू और मुसलमान का भेद नहीं होगा। यानी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब साफ है कि अगर कोई मुस्लिम शख्स भी अपनी पत्नी को प्रताड़ित करता है, तो वह महिला भी डीवी एक्ट के तहत आरोपी पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है।

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