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Chambal नदी में सरकार ने क्यों छोड़े 25 Crocodile, 1978 से चला आ रहा ये सिलसिला !

MP के जिस चंबल नदी में कभी भगवान परशुराम ने अपना फरसा धोया था… जिस चंबल नदी में कभी डकैतों की गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी उस चंबल की नदी में सरकार ने क्यों छोड़े 25 घड़ियाल ?

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जिस चंबल नदी में कभी भगवान परशुराम ने अपना फरसा धोया था। जिस चंबल नदी में कभी डकैतों की गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई देती थी। मध्य प्रदेश में बहने वाली वो चंबल नदी अब घड़ियालों के लिए स्वर्ग बन गई है। जिसे पूरी दुनिया में घड़ियालों के लिए सबसे सुरक्षित नदी माना जाता है। क्योंकि इस ऐतिहासिक नदी में खुद सरकार घड़ियालों को छोड़ती है।और उनकी देख रेख करती है।

दरअसल चंबल नदी का करीब 960 किलोमीटर एरिया सरकार ने घड़ियालों के घर के लिए संरक्षित किया है। जहां हर साल सरकार सैकड़ों घड़ियालों को छोड़ती है। इस बार भी सरकार की ओर से 25 घड़ियालों को छोड़ा गया। इन घड़ियालों का जन्म करीब दो साल पहले देवरी घड़ियाल केंद्र में अंडों की हैचिंग के जरिये हुआ था। जिसके बाद इन्हें किसी बच्चों की तरह संतुलित और सुरक्षित माहौल में पाला पोसा गया। जिससे जब दो साल बाद इन बच्चों को उनके प्राकृतिक परिवेश यानि चंबल नदी में छोड़ा जाए तो वो पानी में रहने और चुनौतीपूर्ण वातावरण को सहने के काबिल हो जाएं।तब जाकर इन बच्चों को चंबल नदी में छोड़ा जाता है।

देवरी घड़ियाल केंद्र में करीब दो साल तक पालने पोसने के बाद जब उन्हें चंबल नदी में छोड़ा जाता है।तो उनकी पूंछ पर एक ट्रैकिंग डिवाइस भी लगाया जाता है। जिससे उनकी सेहत से लेकर गतिविधियों तक।यानि हर मूवमेंट पर नजर रखी जा सके।

मुरैना वन विभाग का ये कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बेहद अहम है। बल्कि जैव विविधता को बनाए रखने के लिए एक प्रेरणादायक प्रयास भी है।यही वजह है कि 1978 में चंबल नदी के एक बड़े एरिया को जब राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभ्यारण्य के तौर पर घोषित किया गया था।तब से लेकर आज तक हर साल घड़ियालों के अंडों की हैचिंग करवाई जाती है। और बच्चों के बड़े होने पर उन्हें चंबल नदी में छोड़ा जाता है।

मादा घड़ियाल अंडे देने के बाद उसे करीब एक मीटर नीचे बालू में दबा देती हैं जिन अंडों का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर होता है वो नर होते हैं और जिन अंडों का तापमान 35 डिग्री सेल्सियस से कम होता है वो मादा शिशु होते हैं और हर साल मादा शिशुओं की संख्या ज्यादा होती है, इस बार भी वन विभाग ने जिन 25 शिशुओं को छोड़ा है उनमें 4 नर और 21 मादा घड़ियाल हैं। कई बार तो ऐसा होता है जब मादा अपना घोसला ही भूल जाती है। ऐसी स्थिति में वन विभाग के कर्मचारी कान लगाकर बालू के नीचे सुनते हैं।अगर सरसराहट या चिड़ियों के चहचहाने जैसी आवाज आती है तो इसका मतलब बच्चे अंडे से बाहर आ जाते हैं जिन्हें कर्मचारी बालू से खोद कर निकालते हैं। यानि जिस तरह से हमारे देश में बाघों को बचाने के लिए टाइगर प्रोजेक्ट चलाया जाता है। चीतों के लिए मध्य प्रदेश के कूनों नेशनल पार्क में प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। उसी तरह से घड़ियालों के संरक्षण के लिए भी चंबल नदी में साल 1978 से प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। और साल 2024 के फरवरी में हुई जनगणना के मुताबिक चंबल नदी में घड़ियालों की जनसंख्या अब तक 2 हजार 456 तक पहुंच गई है।
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