Advertisement

Loading Ad...

इस्लाम के किस नारे से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जताई नाराजगी? जय श्रीराम और हर-हर महादेव का भी किया जिक्र, समझाया उद्देश्य

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा भारतीय कानून, संविधान और न्याय व्यवस्था को सीधी चुनौती देता है. कोर्ट के अनुसार, यह नारा उकसावे और हिंसा को बढ़ावा देता है तथा देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है.

Social Media
Loading Ad...

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा है कि नारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ भारतीय कानून की सत्ता को खुली चुनौती देता है. अदालत के अनुसार, यह नारा केवल उकसावे वाला नहीं है, बल्कि देश की संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ भी जाता है. कोर्ट ने माना कि इस तरह के नारे समाज में भय का माहौल बनाते हैं और लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए प्रेरित कर सकते हैं, इसलिए यह दंडनीय अपराध है.

न्याय प्रणाली को दी जा रही चुनौती

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा भारतीय न्याय प्रणाली पर सीधा हमला है. भारत की न्याय व्यवस्था संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है, जहां सजा का निर्धारण अदालतें करती हैं, न कि भीड़ या उग्र विचारधाराएं. कोर्ट ने कहा कि ऐसे नारे कानून के शासन को कमजोर करने का प्रयास हैं. अदालत के मुताबिक, इस तरह का कृत्य भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 के अंतर्गत आता है. यह धारा देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कार्यों से संबंधित है. कोर्ट ने साफ कहा कि नारे के माध्यम से हिंसा या सिर कलम करने की बात करना कानून के खिलाफ है और इसे किसी भी सूरत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं माना जा सकता.

Loading Ad...

धार्मिक नारों का असली उद्देश्य क्या है?

Loading Ad...

इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad HighCourt) ने इस दौरान विभिन्न धर्मों के नारों का उल्लेख भी किया. अदालत ने कहा कि हर धर्म में नारे और उद्घोष होते हैं, जिनका उद्देश्य ईश्वर या गुरु के प्रति श्रद्धा प्रकट करना होता है. इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ और हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ या ‘हर-हर महादेव’ जैसे नारे आस्था और भक्ति के प्रतीक हैं. इनका उद्देश्य किसी को डराना या धमकाना नहीं होता. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी भी नारे का इस्तेमाल डर पैदा करने, धमकी देने या हिंसा भड़काने के लिए किया जाए, तो वह अपराध बन जाता है. अदालत ने यह भी कहा कि ‘सर तन से जुदा’ नारे का कुरान या इस्लाम के किसी भी प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथ में कोई उल्लेख नहीं है. इसके बावजूद कई लोग बिना अर्थ और परिणाम समझे इसका इस्तेमाल कर लेते हैं.

नारे की उत्पत्ति और फैलाव पर कोर्ट की टिप्पणी

Loading Ad...

अदालत ने इस नारे की उत्पत्ति का जिक्र करते हुए कहा कि यह नारा पाकिस्तान से फैलकर भारत और अन्य देशों तक पहुंचा. कुछ कट्टरपंथी तत्वों ने इसका इस्तेमाल अन्य धर्मों के लोगों को डराने और राज्य की सत्ता को चुनौती देने के लिए किया. कोर्ट ने कहा कि इस तरह की सोच समाज को बांटने और अशांति फैलाने का काम करती है.

पैगंबर मोहम्मद के आदर्शों का हवाला

हाईकोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि पैगंबर मोहम्मद ने अपने जीवन में करुणा और क्षमा का मार्ग अपनाया था. अपमान और विरोध के बावजूद उन्होंने कभी हिंसा की वकालत नहीं की. अदालत के अनुसार, पैगंबर के नाम पर हत्या या सिर कलम करने की बात करना उनके आदर्शों का अपमान है.

Loading Ad...

बरेली हिंसा केस में जमानत खारिज

यह टिप्पणी बरेली में सितंबर महीने मेंहुई हिंसा से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान की गई. आरोपी रिहान ने खुद को निर्दोष बताते हुए जमानत मांगी थी. हालांकि, केस डायरी में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने कहा कि आरोपी एक अवैध भीड़ का हिस्सा था, जिसने आपत्तिजनक नारे लगाए, पुलिसकर्मियों को घायल किया और सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया.

कोर्ट का साफ संदेश

Loading Ad...

यह भी पढ़ें

अदालत ने कहा कि इस मामले में जमानत देने का कोई आधार नहीं है और याचिका खारिज कर दी गई. सुनवाई के दौरान आरोपी की ओर से अधिवक्ता अखिलेश कुमार द्विवेदी ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने पैरवी की. हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ संदेश दिया है कि भारत में कानून से ऊपर कोई नहीं है और हिंसा या धमकी भरे नारों के लिए कोई जगह नहीं है.

अधिक →

Advertisement

Loading Ad...
Loading Ad...
Loading Ad...
अधिक →

Advertisement

Loading Ad...