Advertisement
Loading Ad...
कौन से हैं वो तीन प्रमुख कारण जिनके चलते मुख्यमंत्री की रेस से बाहर हुए प्रवेश वर्मा
दिल्ली को अब नया मुख्यमंत्री मिल चुका है, रेखा गुप्ता ने गुरुवार को सीएम पद की शपथ ली। इसके साथ पार्टी के छह विधायक भी मंत्री बने है। ऐसे में अब सबके मन में यह सवाल उठ रहा है कि केजरीवाल को हराने वाले प्रवेश वर्मा को पार्टी ने क्यों नही चुना?
Advertisement
Loading Ad...
दिल्ली में नई सरकार का गठन गुरुवार को गठन हुआ। राज्य की कमान अब बीजेपी ने रेखा गुप्ता के हाथों में सौंप दी है। इससे पहले दिल्ली चुनाव के परिणाम 8 फरवरी को सामने आने के बाद बीजेपी ने मुख्यमंत्री का चेहरा तय करने में दस दिन से भी ज़्यादा का समय लगा दिया। इस दौरान दिल्ली का नया मुख्यमंत्री कौन होगा, इसको लेकर तमाम कयास लगाए जा रहे थे। कई बड़े नाम मुख्यमंत्री के रेस में आगे चल रहे थे। उन्ही में से एक नाम था प्रवेश वर्मा का, जिन्होंने आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को नई दिल्ली विधानसभा सीट से हराया। माना जा रहा था कि पार्टी इसका ईनाम प्रवेश वर्मा को दे सकती है। इस बीच 19 फरवरी गुरुवार की शाम बीजेपी विधायक दल की बैठक में जब रेखा गुप्ता के नाम का एलान हुआ तो सारे सस्पेंस खत्म हो गए। हालाँकि प्रवेश वर्मा को भी आज दिल्ली की नई सरकार में कैबिनेट मंत्री पद की शपथ दिलाई गई।
दिल्ली के चुनाव परिणाम में जब बीजेपी ने बड़ी जीत दर्ज की उस समय सभी की निगाहें नई दिल्ली सीट पर थी, क्योंकि प्रवेश वर्मा ने अरविंद केजरीवाल को हराया जो पिछले तीन बार से इस सीट से विधायक और सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके थे। इस बार भी पार्टी की तरफ से वही मुख्यमंत्री के प्रमुख दावेदार थे। यही सबसे बड़ी वजह थी कि नए मुख्यमंत्री की रेस में 8 फरवरी से विधायक दल की बैठक तक प्रवेश वर्मा का नाम सबसे आगे चल रहा था। ख़ैर अब दिल्ली की सारी पिक्चर क्लीयर हो चुकी है, नई सरकार का गठन हो चुका है। आइए अब आपको इस रिपोर्ट में बताते है कि किन कारणों के चलते प्रवेश वर्मा के नाम पर पार्टी ने मुहर नही लगाई।
परिवारवाद बना रोड़ा
आम आदमी पार्टी के मुखिया केजरीवाल को हराने वाले प्रवेश वर्मा का नाम कई वजहों से मुख्यमंत्री की रेस में पीछे हुआ। इसकी सबसे बड़ी वजह और रास्ते का रोड़ा प्रवेश वर्मा की राजनीतिक विरासत ही बनी। दरअसल, प्रवेश वर्मा एक दिल्ली की एक प्रमुख राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते है। वह दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे है वो 27 फरवरी 1996 से 12 अक्टूबर 1998 तक दिल्ली के सीएम रहे थे और उनके चाचा आजाद सिंह ने उत्तर दिल्ली नगर निगम के महापौर के रूप में भी काम कर चुके है। ऐसे में बीजेपी अपने ऊपर परिवारवाद का आरोप नही लगने देना चाहती है। इस फैसले से पार्टी इस यह संदेश देने की कोशिश में है कि पार्टी का कोई भी साधारण कार्यकर्ता शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। इससे पहले इस तरह का प्रयोग राजस्थान, मध्य प्रवेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने पहले किया है। इस तरह के फ़ैसले से पार्टी के लिए जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं में एक उत्साह का संचार होता है।
कट्टर नेता के तौर पर पहचान
प्रवेश वर्मा दिल्ली के एक जानेमाने नेता है। वो ख़ुद सांसद भी रह चुकी है लेकिन उनकी छवि एक कट्टर हिन्दुवादी नेता के तौर पर मानी जाती है। कई मौक़े पर उन्होंने मुसलमानों के ख़िलाफ़ खुलकर बयान दिया है। ऐसे में पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर मुस्लिमों से खुले रूप से दूरियां नही बनाना चाहती है। दरअसल, तीन तलाक ख़त्म होने के बाद बीजेपी के पास मुस्लिम महिलाओं का अच्छा ख़ासा वोट है। जिसे पार्टी नही खोना चाहती है।
महिला को सीएम बनाकर संदेश देने की कोशिश
बताते चले कि देशभर में एनडीए की 20 से अधिक राज्यों में सरकार है लेकिन किसी भी राज्य में महिला मुख्यमंत्री नही है जो सूबे का नेतृत्व करें। ऐसे में रेखा गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने एक संदेश देने की कोशिश देना चाहती है कि पार्टी महिला के लिए सिर्फ़ योजनाओं का एलान तक सीमित नही है बल्कि सरकार का बागडोर भी महिला को सौंप सकती है। बीजेपी का यह कदम महिलाओं को प्रभावित करेगा। इसका अन्य राज्यों में भी अच्छा प्रभाव देखने को मिल सकता है। इससे पहले दिल्ली में साल 1993 से लेकर 1998 बीजेपी की सरकार थी तब आख़िरी के कुछ महीनों में सुषमा स्वराज दिल्ली की मुख्यमंत्री रही थी।
गौरतलब है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के परिणाम 8 फरवरी को आए जिसमें बीजेपी अपने लंबे समय से चल रहे वनवास को ख़त्म करते हुए पूर्ण बहुमत के साथ 70 में से 48 सीट पर जीत दर्ज की, वही सत्तारूढ़ रही आम आदमी पार्टी महज 22 और कांग्रेस तो खाता खोलने तक में विफल रही।
Advertisement
Loading Ad...
यह भी पढ़ें
Loading Ad...
Loading Ad...