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विनेश का 'दबदबा', ओलंपिक में मेडल पक्का, लेकिन सिस्टम से लड़ाई जारी

लभभग 20 महीने में विनेश ने पूरा खेल पलट दिया, दबदबा किसका है देख लिए

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दबदबा था, दबदबा है और दबदबा रहेगा, लेकिन दबदबा उनका नहीं होगा। खेल के मैदान में दबदबा होगा तो खिलाडियों का होगा, क्योंकि ओलंपिक में जिस तरीके से विनेश फोगाट ने इतिहास रचा है, उसने यह बता दिया है कि राजनीति में भले ही गोंडा वाले कैसरगंज के पूर्व सांसद और WFI के पूर्व अध्यक्ष का दबदबा बरकरार रहे। लेकिन जब बात अखाड़े की आएगी तो दबदबा होगा तो सिर्फ और सिर्फ पहलवानों का ही होगा।

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याद कीजिए 2023 की वो कड़कड़ाती ठंड और दिल्ली का जंतर मंतर, एक से बढ़कर एक मेडलिस्ट सर्द रातों में खाक छान रहे थे। क्योंकि लड़ाई थी पहलवानी और दबदबे वाली राजनीति को दबाने की।लड़ाई थी अपने अधिकारों की, लेकिन उस लड़ाई का जो अंत था वो दुखद रहा था पहलवानों के लिए, क्योंकि उस वक्त तो दबदबे वाली राजनीति ने जीत हासिल कर ली थी। लेकिन अब लगभग 20 महीने बाद सब खेल पलट गया है और भारत की बेटी विनेश फोगाट ने पेरिस में ऐसा दांव चला कि गोंडा वाला दबदबा दम तोड़ते हुए नजर आया।

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विनेश फोगाट 29 साल की लड़की, जिसके साथ विरोध करने पर क्या कुछ नहीं हुआ। सड़कों पर घसीटा गया, पुलिस का अत्याचार सहना पड़ा, सर्द रातों में सरकार की अनदेखी ने उसे रुला दिया था।अब 20 महीने बाद विनेश फोगाट की आंखों में फिर से आंसू है, लेकिन इस बार सरकार की अनदेखी किए जाने के नहीं, बल्कि अपनी उसे जीत के आंसू है। ये आंसू हैं उस अत्याचार के ऊपर विजय की, जो पेरिस से चीख चीख कर बता रहे हैं कि, माननीय आपके रहमोकरम पर ये जीत नहीं मिली है।

पेरिस ओलंपिक में भारतीय स्टार पहलवान विनेश फोगाट ने इतिहास रचा है, और भारत का एक मेडल पक्का कर दिया है। विनेश ने महिला 50 किग्रा फ्रीस्टाइल इवेंट के फाइनल में एंट्री कर ली है, वो ओलंपिक इतिहास में महिला कुश्ती के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला रेसलर भी बन गई हैं। उन्होंने सेमीफाइनल में क्यूबा की रेसलर युसनेइलिस गुजमैन को 5-0 से करारी शिकस्त दी हैं, याद रखिएगा क्यूबा की गुजमैन ओलंपिक चैंपियन है वो पिछले पांच साल से कोई मुकाबला नहीं हारी। लेकिन विनेश के जज्बे के सामने गुजमैन की एक भी नहीं चली।

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खैर ओलंपिक में विनेश ने इतिहास रचते हुए मेडल तो पक्का कर ही दिया है, लेकिन कहानी अब आगे कि हैं। सोचिए 20 महीने पहले जिस लड़ाई को लड़ते हुए ये पहलवान टूट गई थी। आरोप पर आरोप झेले थे, जिस लड़ाई की वजह से पूरे WFI को भंग करना पड़ा था, जिस लड़ाई की वजह से अनुराग ठाकुर का खेल मंत्रालय तक छीन गया। जिस लड़ाई ने दबदबे को दबा कर रख दिया था, अब उसी लड़ाई में एक ओलंपिक मेडल चार चांद लगा रहा है और विरोध करने वालों के मुंह पर करारा तमाचा है। ऐसे में देश खुशी से झूम रहा है लेकिन रुकिए अब भी विनेश की जंग खत्म नहीं हुई है, एक लड़ाई तो उन्हें अभी फाइनल में लड़नी है।लेकिन एक लड़ाई अभी सिस्टम के साथ और चल रही है उनकी, पता है विनेश की इस जीत से हर तरफ जश्न है लेकिन कही पर खामोशी है। यकीन न हो तो उठाइए मोबाइल और देखिए माननीय प्रधानमंत्री का ट्विटर हैंडल विनेश की जीत को 12 घंटे से ज्यादा हो गए, लेकिन न कोई ट्वीट, न बधाई और शायद न ही कोई फोन कॉल, इसीलिए बजरंग पुनिया लिखते है, ये लड़की दुनिया जीतने वाली है लेकिन अपने देश के सिस्टम से हार गई। हालांकि खेल मंत्री मनसुख मांडवीया ने विनेश फोगाट को जीत पर ट्वीट करते हुए बधाई दी है, लेकिन

ऐसे में माननीय प्रधानमंत्री आपसे सवाल 

  • क्या आपको विनेश की जीत की खुशी नहीं ?
  • क्या आप विनेश जैसी खिलाड़ियों से नफरत करते हैं ?
  • क्या आपका दिल इतना छोटा है कि बेटी की जीत पर बधाई नहीं दे पाए ?
  • जीत पर तुरंत ट्वीट और कॉल करने वाले आप, क्या विनेश नाम देख पीछे हट गए ?

ये सवाल पूरे देश का और उम्मीद की आप इन सवालों के जवाब की खानापूर्ति नहीं करेंगे। बेटी की जीत में आप उसी तरह से सरीक होंगे, जैसे होते आएं है, भले ही वो आपके सिस्टम के विरोध में रही हो, फिलहाल वो देश के तिरंगे के लिए लड़ रही है। ऐसे में अगर आपने विनेश का हौसला नहीं बढ़ाया उसे बधाई नहीं दी तो उसका कुछ नहीं जाएगा, घाटा आपका होगा और सब यही कहेंगे।ओलंपिक में मेडल जीत लेने से ज़्यादा, कठिन है सिस्टम से जीतना।

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