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“वंदे मातरम एक मंत्र”: राज्यसभा में नड्डा का जोरदार संबोधन, नेहरू की भूमिका पर सवाल

नड्डा ने वीर सावरकर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब सावरकर ने वंदे मातरम पर लिखा, तो ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दंडित किया. चार्जशीट में कहा गया कि यह लेख राजद्रोही है और इसी आधार पर उन्हें काला पानी भेजा गया. इससे स्पष्ट होता है कि अंग्रेज वंदे मातरम की शक्ति और प्रभाव से डरते थे.

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वंदे मातरम पर राज्यसभा में जारी विशेष चर्चा के दौरान केंद्रीय मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सदन में विस्तृत जवाब दिया. उन्होंने कहा कि पिछले दो दिनों में 80 से अधिक सांसदों ने अपने विचार रखे हैं, जो यह दर्शाता है कि यह विषय आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रेरणादायक है.

“वंदे मातरम एक मंत्र, ऊर्जा और संकल्प का प्रतीक”

नड्डा ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी, जिसने स्वतंत्रता संग्राम नहीं देखा और केवल किताबों में इतिहास पढ़ा है, इस चर्चा से वंदे मातरम की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यात्रा को गहराई से समझेगी.

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उन्होंने कहा, "वंदे मातरम एक गीत भर नहीं, बल्कि एक मंत्र, एक ऊर्जा, एक प्रण और मां भारती की साधना का प्रतीक है. स्वतंत्रता आंदोलन की अनगिनत घटनाओं में वंदे मातरम ने लोगों को प्रेरित और संगठित किया था."

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नेहरू पर निशाना, कांग्रेस के रुख पर सवाल

नड्डा ने वीर सावरकर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब सावरकर ने वंदे मातरम पर लिखा, तो ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दंडित किया. चार्जशीट में कहा गया कि यह लेख राजद्रोही है और इसी आधार पर उन्हें काला पानी भेजा गया. इससे स्पष्ट होता है कि अंग्रेज वंदे मातरम की शक्ति और प्रभाव से डरते थे.

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उन्होंने कांग्रेस नेता जयराम रमेश के उस आरोप पर प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह बहस जवाहरलाल नेहरू को बदनाम करने के लिए है. नड्डा ने कहा, "हमारा उद्देश्य नेहरू को बदनाम करना नहीं है, बल्कि भारत के इतिहास को दर्ज करना है. जब भी कोई घटना होती है, तब जिम्मेदारी उसी पर होती है जो सत्ता में हो और उस समय देश के जिम्मेदार नेता नेहरू ही थे."

वंदे मातरम पर कांग्रेस के फैसलों का इतिहास

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उन्होंने दावा किया कि 1937 में नेहरू ने वंदे मातरम को लेकर अपनी आपत्तियां जताई थीं. एक पत्र का हवाला देते हुए नड्डा ने कहा कि नेहरू ने इसे कठिन शब्दों वाला और आधुनिक राष्ट्रवाद के अनुरूप नहीं बताया.

नड्डा ने आगे कहा कि बंकिम बाबू ने वंदे मातरम उस समय लिखा था जब अंग्रेज भारत की संस्कृति और आत्मसम्मान को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे. ऐसे समय में बंकिम बाबू ने भारत माता को ज्ञान, समृद्धि और शक्ति का स्वरूप बताया. मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां दुर्गा के रूप में. इस गीत ने देश की चेतना जागृत की.

उन्होंने संविधान सभा में राष्ट्रगान पर हुई चर्चा का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा, "राष्ट्रीय ध्वज पर विस्तृत चर्चा हुई, कमेटी बनी, रिपोर्ट आई. लेकिन राष्ट्रगान पर कितनी चर्चा हुई? क्या इसे गंभीरता से लिया गया?"

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नड्डा ने जयराम रमेश पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कांग्रेस जब चाहे नेहरू की बात करती है और जब चाहे सुभाष चंद्र बोस या रवींद्रनाथ टैगोर को आगे रख देती है. उन्होंने कहा, "अगर आप श्रेय लेना चाहते हैं, तो देश के कठिन समय की जिम्मेदारी भी आपको ही लेनी होगी."

उन्होंने आरोप लगाया कि 1936-37 में जब नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष थे, तब 'सांप्रदायिक दबाव' में वंदे मातरम की उन पंक्तियों को हटाया गया जिसमें भारत माता को हथियारों के साथ मां दुर्गा के रूप में दर्शाया गया था.

राष्ट्रीय गान के चयन पर भी उठाए सवाल

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जेपी नड्डा ने कहा, "संविधान सभा में भारत के राष्ट्रगान के चयन के दौरान जो हुआ और वंदे मातरम के प्रति जो उदासीनता और उपेक्षा का भाव रहा, उसके लिए पूरी तरह जवाहरलाल नेहरू ही जिम्मेदार थे. संविधान की तीन प्रतियों पर हस्ताक्षर करने के लिए 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की अंतिम बैठक हुई. उसमें बिना किसी चर्चा और बिना किसी नोटिस के एक वक्तव्य पढ़ दिया गया, जिसमें भारत के राष्ट्रगान का निर्णय सुना दिया गया. 'जन गण मन' को भारत का राष्ट्रगान घोषित कर दिया गया और साथ ही यह भी कहा गया कि वंदे मातरम का सम्मान भी 'जन गण मन' के समान ही किया जाएगा. यह निर्णय किस प्रकार संवैधानिक प्रक्रिया के तहत और लोकतांत्रिक निर्णय कहा जा सकता है, यह संविधान-निर्माताओं पर छोड़ा जाता है."

उन्होंने कहा, "कलकत्ता कांग्रेस वर्किंग कमेटी की मीटिंग 26 अक्टूबर से 1 नवंबर 1937 तक हुई और उसने एआईसीसी के लिए एक प्रस्ताव पास किया. इसमें कहा गया था कि कमेटी हमारे मुस्लिम दोस्तों द्वारा गाने के कुछ हिस्सों पर उठाई गई आपत्तियों को सही मानती है. कमेटी सलाह देती है कि जब भी राष्ट्रीय मौकों पर वंदे मातरम गाया जाए, तो सिर्फ पहले दो पंक्ति ही गाए जाएं. कलकत्ता कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने सिफारिश की कि राष्ट्रीय सभाओं में जहां भी वंदे मातरम गाया जाए, वहां सिर्फ पहले दो छंद ही गाए जाएं और आयोजकों को पूरी आजादी होगी कि वे वंदे मातरम के साथ या उसके बदले में कोई भी दूसरा ऐसा गाना गा सकें, जिस पर कोई आपत्ति न हो."

नेहरू की चिट्ठियाँ और राष्ट्रगान पर सरकारी निर्णय

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उन्होंने कहा, "21 जून, 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को लिखी गई चिट्ठी में नेहरू जी ने साफ कर दिया था कि वे वंदे मातरम को नेशनल एंथम के योग्य नहीं मानते. 15 अक्टूबर 1937 को लखनऊ सेशन में मोहम्मद अली जिन्ना ने वंदे मातरम के खिलाफ फतवा जारी किया. इसका विरोध करने की बजाय नेहरू जी ने वंदे मातरम पर पड़ताल शुरू कर दी. 20 अक्टूबर को नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को चिट्ठी लिखी कि वंदे मातरम की आनंदमठ वाली पृष्ठभूमि मुसलमानों को भड़का सकती है. कोलकाता में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस ने वंदे मातरम की समीक्षा की और वंदे मातरम को न वह सम्मान दिया गया और न ही वह स्थान."

“वंदे मातरम को मिला कम सम्मान, इसके लिए नेहरू जिम्मेदार”

जेपी नड्डा ने कहा कि मैं एक और बयान पढ़ना चाहता हूं जिसमें कहा गया है, "संविधान सभा में वंदे मातरम के प्रति जो उदासीनता और उपेक्षा दिखाई गई, उसकी पूरी जिम्मेदारी जवाहरलाल नेहरू की थी. उन्होंने खुद असेंबली में दिए गए एक लिखित जवाब में यह बात साफ की थी.

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उन्होंने आगे कहा, "एक सदस्य ने भारत के गृह मंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखकर यह जानना चाहा कि भारत के राष्ट्रगान के बारे में क्या हो रहा है. सरदार पटेल को लिखे गए पत्र का जवाब नेहरू ने 25 अगस्त 1948 को दिया था. उस जवाब में, नेहरू ने कहा कि वह खुद जवाब दे रहे हैं क्योंकि इस मामले पर सभी फैसले वही ले रहे थे. इस जवाब के जरिए, देश के लोगों को पहली बार पता चला कि नेहरू के नेतृत्व वाली भारत सरकार की कैबिनेट ने संविधान सभा के बाहर और अस्थायी तौर पर, जन गण मन को भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाने का फैसला पहले ही कर लिया था."

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