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JNU में 'द साबरमती रिपोर्ट' की स्क्रीनिंग पर बवाल, जमकर हुई पत्थरबाजी और हंगामा
दिल्ली की प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में विक्रांत मैसी की फिल्म 'द साबरमती रिपोर्ट' की स्क्रीनिंग के दौरान जमकर हंगामा हुआ। एबीवीपी और लेफ्ट छात्रों के बीच हुई पत्थरबाजी ने कैंपस का माहौल गरमा दिया। एबीवीपी ने लेफ्ट विंग पर पोस्टर फाड़ने और स्क्रीनिंग रोकने के लिए हिंसा का आरोप लगाया, जबकि लेफ्ट ने इसे वैचारिक विरोध बताया।
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दिल्ली की प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) एक बार फिर विवादों में है। इस बार मुद्दा विक्रांत मैसी की चर्चित फिल्म 'द साबरमती रिपोर्ट' की स्क्रीनिंग को लेकर हुआ। फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान कैंपस में पत्थरबाजी और हिंसक झड़पें हुईं, जिसके बाद मामला गरमा गया। यह घटना एबीवीपी और लेफ्ट विंग के छात्रों के बीच लंबे समय से चली आ रही वैचारिक खींचतान को फिर से उजागर करती है।
क्या है पूरा मामला?
घटना की शुरुआत तब हुई जब ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) ने फिल्म 'द साबरमती रिपोर्ट' की स्क्रीनिंग का आयोजन किया। यह फिल्म 2002 के गुजरात दंगों पर आधारित है और इसे कई बीजेपी शासित राज्यों में टैक्स फ्री घोषित किया गया है। स्क्रीनिंग के दौरान लेफ्ट विंग के छात्रों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने पोस्टर फाड़े और स्क्रीनिंग रोकने के लिए पत्थरबाजी की।
एबीवीपी के छात्रों का कहना है कि यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी लेफ्ट छात्रों ने उनके कार्यक्रमों को बाधित करने की कोशिश की है। एक एबीवीपी कार्यकर्ता ने कहा, "लेफ्ट का यह पुराना तरीका है। वे खुले मंच पर डिबेट की बात करते हैं, लेकिन जब भी हम कोई कार्यक्रम करते हैं, तो हिंसा और तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं।"
लेफ्ट विंग पर क्या आरोप हैं?
एबीवीपी ने लेफ्ट विंग पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान तार काट दिए और छात्रों पर पत्थर फेंके। एबीवीपी ने यह भी दावा किया कि इस झड़प में उनके कई छात्रों को चोटें आईं। यह आरोप तब और गंभीर हो जाते हैं जब यह देखा जाता है कि इससे पहले भी जेएनयू में लेफ्ट और राइट विंग के बीच कई बार हिंसा हो चुकी है। साल 2016, 2017 और 2018 में भी ऐसी घटनाएं सामने आई थीं, जब एबीवीपी के कार्यक्रमों को रोकने की कोशिशें की गई थीं।
फिल्म 'द साबरमती रिपोर्ट' और विवाद
विक्रांत मैसी की यह फिल्म गुजरात दंगों पर आधारित है, जो अपनी रिलीज़ के समय से ही चर्चा में रही है। फिल्म ने भारतीय राजनीति के कई संवेदनशील पहलुओं को छुआ है और इसे बीजेपी समर्थकों ने काफी सराहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस फिल्म को देखा और इसकी प्रशंसा की। हालांकि, लेफ्ट विंग का कहना है कि फिल्म का उद्देश्य सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना है। इस मुद्दे को लेकर लेफ्ट और एबीवीपी के बीच वैचारिक टकराव और गहराता जा रहा है।
घटना के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने दोनों गुटों को नोटिस भेजा और मामले की जांच शुरू कर दी। प्रशासन का कहना है कि कैंपस में इस तरह की घटनाएं अस्वीकार्य हैं और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। जेएनयू हमेशा से वैचारिक संघर्षों का केंद्र रहा है। यहां लेफ्ट विंग और एबीवीपी के बीच विचारधारा का टकराव कोई नई बात नहीं है। हालांकि, हालिया घटना ने एक बार फिर इस टकराव को हिंसा का रूप दे दिया है।
इस घटना ने फिर से कैंपस में शांति और सौहार्द के सवाल को उठाया है। यह साफ है कि वैचारिक टकराव को हिंसा का रूप देने से छात्रों का शैक्षणिक माहौल प्रभावित होता है। विश्वविद्यालय प्रशासन को सख्त कदम उठाने की जरूरत है ताकि कैंपस में फिर से शांति बहाल हो सके। इस बीच, यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मामला कितना आगे बढ़ता है और दोनों पक्षों के तर्क-वितर्क किस दिशा में जाते हैं। लेकिन एक बात साफ है, जेएनयू में वैचारिक संघर्षों का यह सिलसिला आसानी से थमने वाला नहीं है।
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