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UP By Poll 2024: Rahul का साथ देना Akhilesh के लिए बन गई मजबूरी ?

उत्‍तर प्रदेश की 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव है। सपा ने छह उम्‍मीदवारों का ऐलान कर दिया है। चर्चा हो रही थी कि कांग्रेस के साथ सपा गठबंधन तोड़ लेगी, पर अखिलेश यादव ने स्‍पष्‍ट कर दिया है कि इंडिया गठबंधन बरकरार रहेगा। हरियाणा में घोखा खाने के बाद भी सपा कांग्रेस को उपचुनाव में क्यों नहीं छोड़ रही? देखिए एक रिपोर्ट

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पहले मध्य प्रदेश, फिर हरियाणा—दोनों ही विधानसभा में कांग्रेस ने सपा को बिल्कुल इग्नोर कर दिया। कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी की उपेक्षा की। बावजूद इसके, सपा ने दरियादिली दिखाई, और अखिलेश यादव ने ऐलान कर दिया कि यूपी के उपचुनाव में दो लड़कों की जोड़ी बरकरार रहेगी और साथ में उपचुनाव के रण को फतेह करने की कोशिश की जाएगी। लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि इतनी बेइज्जती के बाद भी सपा कांग्रेस के साथ क्यों है। तो जवाब है कि सपा को अगर वोट बैंक साधना है, तो इसमें उसे कांग्रेस की जरूरत पड़ेगी। इसलिए ये दोस्ती अब सपा के लिए मजबूरी बन चुकी है।

गठबंधन पर क्या कह रहे राजनीतिक जानकार?

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस ने पहले मध्य प्रदेश और फिर हरियाणा में सपा को घास तक नहीं डाला। न तो कई सीटें दीं, न ही इनसे कोई सलाह ली। यहां तक कि जब दीपेंद्र हुड्डा से बातचीत की गई, तब उन्होंने सपा को लेकर कड़ी टिप्पणी कर दी थी और कहा था कि सपा का हरियाणा में कोई जनाधार नहीं है।

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हालांकि सपा का कहना था कि उसके बगैर चुनाव में कांग्रेस को नुकसान होगा, और ऐसा हुआ भी। कांग्रेस बस 37 सीटों पर सिमट कर रह गई। सपा की हरियाणा विंग इस बात को कहती नजर आई कि अगर साथ-साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा जाता, तो शायद हरियाणा का मैदान कांग्रेस फतेह कर लेती।

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इंडिया गठबंधन के रणनीतिक सलाहकार भी मानते हैं कि हरियाणा चुनाव में अगर विपक्षी दल एक साथ मिलकर लड़ते, तो शायद तस्वीर कुछ अलग होती। क्योंकि 13 सीटों में अगर हार का अंतर देखेंगे, तो वह पांच हजार से कम का है।

कांग्रेस सपा के लिए क्यों बनी मजबूरी?

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दिग्गज राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत का कहना है कि लोकसभा के भारत गठबंधन में शामिल सभी दल एक-दूसरे के लिए बूस्टर हैं। जहां जो मजबूत है, कांग्रेस को उसकी सहायता लेनी ही पड़ेगी। बात यूपी की करें, तो लोकसभा चुनाव में जिस तरह से मुस्लिम और दलित वोटर्स ने कांग्रेस को सपोर्ट किया है, उसके पीछे का सबसे बड़ा कारण गठबंधन ही है। इस बात को सपा और कांग्रेस दोनों ही भली-भांति जानते हैं। और यही वजह है कि हरियाणा का रिजल्ट आने के बाद अखिलेश कह चुके हैं कि इंडिया गठबंधन बरकरार रहेगा, और इसे बनाए रखने की जिम्मेदारी समाजवादी उठाएंगे। वीरेंद्र सिंह रावत का ये भी कहना है कि दोनों दलों को एक-दूसरे का वोट बैंक बचाने के लिए गठबंधन की जरूरत है।

कांग्रेस को सपा की दो टूक: हमारे हिसाब से लड़ना होगा

बता दें कि चुनाव को लेकर कांग्रेस लगातार मांग कर रही थी कि उन्हें वो 5 सीटें चाहिए, जिन पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी। हालांकि ऐसा कुछ हुआ नहीं। बीते दिन ही उपचुनाव के लिए सपा की तरफ से लिस्ट जारी कर दी गई, जिसमें 6 सीटें शामिल हैं। अब 4 सीटों पर क्या फैसला होता है, ये देखना दिलचस्प होगा। लेकिन 6 सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारकर सपा ने कांग्रेस को दो टूक में कह दिया है कि चुनाव हमारे हिसाब से लड़ना होगा।

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तो कुल मिलाकर बात ये है कि सपा के लिए कांग्रेस एक मजबूरी है, जिसे चाहकर भी वो इग्नोर नहीं कर सकती। अखिलेश यादव पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं, लेकिन बिना कांग्रेस के साथ के ये हो नहीं पाएगा। यही कारण है कि कांग्रेस उन्हें सीटें नहीं भी दे, तो सपा को फिलहाल कोई फर्क नहीं पड़ रहा है। हरियाणा ही नहीं, अखिलेश यादव ने जम्मू-कश्मीर में भी कांग्रेस से सीटें मांगी थीं, लेकिन यहां भी सपा को झटका मिल गया, तो उसने अपने 20 उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया। हालांकि, इसके पीछे भी अखिलेश यादव की अपनी रणनीतियां हैं।

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