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दो दिन, दो तस्वीरों ने दिए बड़े संकेत… लोकसभा में आखिर प्रियंका गांधी ने ऐसा क्या किया जो कांग्रेस में कद बढ़ने की होने लगी चर्चा

संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर नई हलचल दिखी. ‘वंदे मातरम्’ बहस के दौरान राहुल गांधी अनुपस्थित रहे और प्रियंका गांधी ने सरकार को जवाब देकर मुख्य भूमिका संभाली. उनका भाषण उसी दिन हुआ जब पीएम मोदी ने सदन को संबोधित किया, जिससे मुकाबला पीएम बनाम प्रियंका जैसा दिखा.

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संसद के शीतकालीन सत्र में इस बार सिर्फ मुद्दों की गर्मी नहीं दिखी, बल्कि सत्ता और विपक्ष के भीतर बदलते समीकरणों ने भी सबका ध्यान खींच लिया. ताजा मामला कांग्रेस पार्टी का है.पार्टी के अंदर ऐसी हलचल दिखाई दी जिसने नेतृत्व के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए. 48 घंटे के भीतर लोकसभा में जो घटनाक्रम सामने आए, उन्होंने पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन की नई तस्वीर पेश की। सबसे बड़ी बात यह रही कि 'वंदे मातरम्' बहस और चुनावी सुधार के मुद्दे ने गांधी परिवार की भूमिकाओं को पूरी तरह सामने ला दिया.

PM मोदी के सामने प्रियंका ने संभाली कमान 

इन घटनाओं के केंद्र में थीं कांग्रेस पार्टी की महासचिव और वायनाड से पार्टी की सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा. ‘वंदे मातरम्’ पर बहस के दौरान राहुल गांधी सदन में मौजूद नहीं थे और कांग्रेस की ओर से पूरे आत्मविश्वास के साथ यह जिम्मेदारी प्रियंका ने संभाली. दिलचस्प बात यह रही कि प्रियंका का भाषण उसी दिन हुआ जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सदन को संबोधित किया. अगले दिन के अखबारों में दोनों की तस्वीरें एक साथ दिखाई दीं. मानो यह बहस पीएम बनाम प्रियंका हो गई हो.

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सदन में दिखा प्रियंका गांधी का नया रूप 

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जानकारी देते चलें कि संसदीय परंपरा के लिहाज से यह मुकाबला प्रधानमंत्री और नेता प्रतिपक्ष के बीच होना चाहिए था. यानी पीएम मोदी के भाषण का जवाब या पलटवार राहुल गांधी को करना चाहिए था. लेकिन राहुल की अनुपस्थिति ने कहानी का स्वरूप बदल दिया. प्रियंका ने जिस सहजता, मुस्कान और व्यंग्यपूर्ण अंदाज में भाषण दिया, उसने न सिर्फ विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के कई नेताओं को भी प्रभावित किया. कुछ बीजेपी सांसदों ने उनकी शैली की खुलकर तारीफ भी की. यह भी दिलचस्प था कि भले ही प्रियंका पीएम के भाषण के दौरान सदन में मौजूद नहीं थीं, लेकिन उनके जवाब में लगी तैयारी से साफ था कि वह पूरे होमवर्क के साथ आई थीं.

विपक्ष के लिए नई उम्मीद बना प्रियंका का भाषण 

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कांग्रेस और INDIA गठबंधन के नेताओं के लिए प्रियंका का भाषण एक उम्मीद जैसा था. कई नेताओं को लंबे समय बाद लगा कि पार्टी को एक ऐसा चेहरा मिल रहा है जो मुकाबले को नई दिशा दे सकता है. लेकिन साथ ही पार्टी में यह असमंजस भी गहरा गया कि क्या प्रियंका नेतृत्व संभालने को तैयार हैं, या उन्हें अभी भी पर्दे के पीछे ही रखा जाएगा.

राहुल गांधी ने किया निराश

अगले ही दिन कहानी का दूसरा हिस्सा सामने आया. इस बार बारी थी राहुल गांधी की थी, उन्हें चुनावी सुधार जैसे बड़े मुद्दे पर बोलना था. विपक्ष को उम्मीद थी कि राहुल जोरदार तरीके से सरकार पर हमला करेंगे. लेकिन न प्रधानमंत्री सदन में मौजूद थे और न ही राहुल के भाषण में वह आक्रामकता दिखाई दी जो उन्होंने हाल की ‘वोट चोरी’ वाली प्रेस कॉन्फ़्रेंस में दिखाई थी. वह भाषण शुरू होने से कुछ समय पहले आए और खत्म होते ही तेजी से बाहर चले गए. कांग्रेस सांसदों के अनुसार यह रवैया निराशाजनक था, क्योंकि वे एक तीखे राजनीतिक टकराव की उम्मीद कर रहे थे जो अधूरा रह गया.

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क्या कोई बड़े बदलाव की आहट है?

राहुल के भाषण का जवाब प्रधानमंत्री ने नहीं दिया. उसकी जगह गृह मंत्री अमित शाह ने मोर्चा संभाला. शाह का जवाब बेहद कठोर, तर्कपूर्ण और राजनीतिक तेवर से भरा हुआ था. यह भी एक संदेश था कि पीएम मोदी ने यह मुकाबला अपने दूसरे सबसे मजबूत नेता के हवाले कर दिया है. यही दो दिन कांग्रेस के भीतर बदलाव की बड़ी आहट साबित हुए. एक ओर प्रियंका ने अपने दमदार भाषण से संकेत दे दिया कि वह एक संभावित राष्ट्रीय चेहरा बन सकती हैं. वहीं राहुल की कमज़ोर और कुछ हद तक तुनकमिजाज उपस्थिति ने कई सवाल खड़े कर दिए। शाह ने राहुल को जिस सटीक तरीके से घेरा, उसने राजनीतिक परिपक्वता के फर्क को और स्पष्ट कर दिया.

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अब कांग्रेस की सबसे बड़ी दुविधा यह है कि पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा. क्या प्रियंका आगे बढ़ने को तैयार हैं. या फिर राहुल ही पार्टी की कमान में बने रहेंगे. 48 घंटों की संसदीय राजनीति ने इतना तो तय कर दिया है कि कांग्रेस को अब गांधी भाई–बहन की भूमिकाओं को स्पष्ट करना ही होगा. लोकसभा के इन घटनाक्रमों ने यह सवाल तेज कर दिया है कि क्या प्रियंका गांधी वाकई कांग्रेस के लिए वह विकल्प बन रही हैं जिसकी पार्टी को लंबे समय से तलाश थी.

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