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313 'आतंकी ट्रेनिंग कैंप' बनाने का था टारगेट, 4 हजार करोड़ जुटाने का लक्ष्य... डिजिटल वॉलेट्स से मसूद अजहर के खातों में जा रही थी रकम

पाकिस्तान पोषित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने चोरी चुपके बड़ी फंडरेजिंग अभियान शुरू किया था, जिसका मकसद 313 नए मरकज (प्रशिक्षण शिविर और सुरक्षित ठिकाने) बनाने के लिए 3,910 करोड़ रुपये (PKR 3.91 बिलियन) जुटाना था. अब इसका बड़ा खुलासा हुआ है. जैश का यह अभियान उनके आतंकी ढांचे को मजबूत करने और हथियारों के भंडार को बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम था.

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जैश-ए-मोहम्मद, जिसे मौलाना मसूद अजहर ने 2000 में स्थापित किया था, भारत के खिलाफ आतंकी हमलों के लिए कुख्यात है. इस संगठन ने 2001 में भारतीय संसद पर हमला, 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हमला और 2019 में पुलवामा हमले जैसे बड़े आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया.

पाकिस्तान में 313 नए मरकज बनाना चाहता था जैश 

अब जैश ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए एक नया और गुप्त अभियान शुरू किया, जिसके तहत वह पाकिस्तान में 313 नए मरकज बनाना चाहता था. ये मरकज न केवल आतंकियों को प्रशिक्षण देने के लिए थे, बल्कि मसूद अजहर और उसके परिवार के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में भी काम करते, ताकि उनकी मौजूदगी को छिपाया जा सके.

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इस अभियान का लक्ष्य था 3,910 करोड़ रुपये जुटाना, जिससे जैश न केवल नए शिविर बना सके, बल्कि मशीन गन, रॉकेट लॉन्चर और मोर्टार जैसे उन्नत हथियार भी खरीद सके. इस रकम का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने और नए हमलों की योजना बनाने में होना था.

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चंदा जुटाने के लिए जैश ने किया ईजीपैसा-सदापे जैसे डिजिटल वॉलेट्स का इस्तेमाल

जैश ने इस फंडरेजिंग अभियान को अंजाम देने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लिया. संगठन ने ईजीपैसा (EasyPaisa) और सदापे (SadaPay) जैसे पाकिस्तानी डिजिटल वॉलेट्स का इस्तेमाल किया, जो बैंक खातों से अलग काम करते हैं. ये वॉलेट्स वॉलेट-टू-वॉलेट और वॉलेट-टू-कैश लेनदेन की सुविधा देते हैं, जिससे फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (FATF) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के लिए इनका पता लगाना मुश्किल हो जाता है. साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अमित दूबे के अनुसार, ये डिजिटल वॉलेट्स डिजिटल हवाला की तरह काम करते हैं, जो बिना बैंकिंग नेटवर्क के पैसों का लेनदेन संभव बनाते हैं.

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इन डिजिटल वॉलेट्स को मसूद अजहर के परिवार के सदस्यों के मोबाइल नंबरों से जोड़ा गया था. एक सदापे खाता मसूद अजहर के भाई तल्हा अल सैफ (तल्हा गुलजार) के नाम पर था, जो पाकिस्तानी मोबाइल नंबर +92 3025xxxx56 से जुड़ा था. यह नंबर जैश के हरिपुर जिला कमांडर अफताब अहमद के नाम पर रजिस्टर्ड था, जिसका पता हरिपुर के खाला बट्ट टाउनशिप में जैश के शिविर से मेल खाता था. इसी तरह, एक ईजीपैसा वॉलेट मसूद अजहर के बेटे अब्दुल्ला अजहर के मोबाइल नंबर +92 33xxxx4937 से जुड़ा था.

 FATF की निगरानी से बचने के लिए बड़ी रकम को छोटे वॉलेट्स में किया जाता था ट्रांसफर 

इन सब के अलावा, गाजा की मदद के नाम पर एक और वॉलेट +92xxxx195206 नंबर से चलाया जा रहा था, जो खालिद अहमद के नाम पर था, लेकिन इसे मसूद अजहर के बेटे हम्माद अजहर द्वारा संचालित किया जा रहा था. जैश की रणनीति थी कि वह हर 3-4 महीने में इन वॉलेट्स को बदल देता था. बड़ी रकम को पहले मुख्य वॉलेट्स में जमा किया जाता, फिर उसे 10-15 छोटे वॉलेट्स में बांटकर नकद निकाला जाता या ऑनलाइन ट्रांसफर किया जाता. इससे FATF की निगरानी से बचना आसान हो जाता था.

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डिजिटल वॉलेट्स के अलावा, जैश के कमांडर हर शुक्रवार को पाकिस्तान की मस्जिदों में नकद चंदा इकट्ठा करते थे. यह चंदा कथित तौर पर गाजा की मदद के लिए था, लेकिन वास्तव में इसका इस्तेमाल जैश की आतंकी गतिविधियों के लिए होता था. खैबर पख्तूनख्वा में एक वीडियो में जैश के कमांडर वसीम चौहान (उर्फ वसीम खान, उर्फ अकबर) को शुक्रवार की नमाज के बाद नकद गिनते देखा गया.

जैश से जुड़ा संगठन अल रहमत ट्रस्ट भी इस अभियान में अहम भूमिका निभा रहा था. यह ट्रस्ट बहावलपुर में नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान के एक खाते (खाता नंबर 105XX9) के जरिए चंदा इकट्ठा करता था, जिसे गुलाम मुर्तजा के नाम पर संचालित किया जाता था. इस ट्रस्ट को मसूद अजहर, तल्हा अल सैफ, और अन्य जैश नेता जैसे मोहम्मद इस्माइल, मोहम्मद फारूक, फजल-उर-रहमान और रिहान अब्दुल रज्जाक चलाते थे. अल रहमत ट्रस्ट हर साल जैश के फंड में 6-7% (लगभग 100 करोड़ रुपये) का योगदान देता था.

मसूद की मौजूदगी छिपाने के लिए 313 नए मरकज बनाने का था प्लान 

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जैश का लक्ष्य था कि ये 313 नए मरकज पूरे पाकिस्तान में बनाए जाएं. ये मरकज दो मुख्य उद्देश्यों के लिए थे... ये मरकज मसूद अजहर और उसके परिवार के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में काम करते, ताकि वह अपनी मौजूदगी को छिपा सकें. इससे पाकिस्तान सरकार और FATF को यह दिखाने में मदद मिलती कि मसूद अजहर का पता नहीं है. 

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इन मरकज का इस्तेमाल नए आतंकियों को भर्ती करने और उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए किया जाना था. इन शिविरों में मशीन गन, रॉकेट लॉन्चर और मोर्टार जैसे हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता. जैश ने अपने समर्थकों को सोशल मीडिया जैसे फेसबुक और व्हाट्सएप के जरिए प्रचार सामग्री भेजी, जिसमें मसूद अजहर का एक पत्र और वीडियो शामिल थे. इनमें समर्थकों से प्रत्येक मरकज के लिए 12.5 मिलियन रुपये (1.25 करोड़ रुपये) दान करने की अपील की गई थी. यह अभियान पाकिस्तान के साथ-साथ विदेशों में रहने वाले समर्थकों को भी टारगेट कर रहा था.

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