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‘संघ का ध्यान उत्सव नहीं, लक्ष्य प्राप्ति पर…’, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने दुनिया के सामने पेश किया एजेंडा, दी भारत से सीखने की नसीहत

RSS प्रमुख मोहन भागवत का कायंबटूर में दिया एक बयान खूब वायरल हो रहा है. यहां उन्होंने कहा कि दुनिया सीखे कि खुद को कैसे सुधारा जाता है, ऊपर उठाया जाता है. उन्होंने आगे कहा कि संघ का ध्यान न उत्सव पर है और न ही प्रसिद्धि पर है, बल्कि लक्ष्य प्राप्ति की ओर है. संघ प्रमुख ने कहा कि भारत ने विश्व से सहमति जताई है, इतिहास हमेशा यही कहता है कि भारत ने विश्व से मित्रता की है.

Image: VSK Kerala
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत तमिलनाडु के कोयंबटूर में आरएसएस के 100 साल और पेरूर आदिम शताब्दी समारोह में शामिल हुए. यहां उनका भारत को लेकर दिया गया बयान काफी वायरल हो रहा है. ऐसे समय में जब दुनिया युद्ध की विभीषिका झेल रही है और भारत साम्यवागी चीन की विस्तार वादी नीति के खिलाफ लड़ रहा है, वैसे समय में उनका ये बयान काफी हो जाता है. भागवत ने अपने संबोधन में भारत की सांस्कृतिक एकता, विश्व के साथ मित्रता, और विविधता में एकता जैसे मुद्दों पर जोर दिया. 

उन्होंने कहा कि "भारत का इतिहास कभी यह नहीं कहता कि भारत ने विश्व से सहमति जताई है, इतिहास हमेशा यही कहता है कि भारत ने विश्व से मित्रता की है."

डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म के बिना कुछ भी स्थायी नहीं रह सकता और धर्म का उपदेश इस दुनिया को भारत ने ही दिया है. इसके लिए हमारे राष्ट्र ने अनेक बलिदान सहन किए हैं. इस सच्चाई को दुनिया को याद दिलाना भारत का कर्तव्य है. उन्होंने कहा कि 'धर्म' जैसा शब्द दुनिया की किसी भी भाषा में नहीं है. बाकी देश इसे 'रिलिजन' यानी मजहब कहते हैं, लेकिन वह सही नहीं है.

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कोयंबत्तूर के पेरूर मठ में शान्तालिंग रामस्वामी अडिगलर की जन्म शताब्दी के अवसर पर आयोजित समारोह में वे बोलते हुए उन्होंने कहा कि धर्म और संस्कृति की रक्षा में मठों का बहुत बड़ा योगदान रहा है. जिस समय शान्तालिंग रामस्वामी अडिगलर की जन्मशती मनाई जा रही है, उसी दौरान आरएसएस भी सौ वर्ष पूरे कर रहा है. लेकिन आरएसएस का ध्यान उत्सवों पर नहीं, बल्कि अपने लक्ष्य की प्राप्ति पर है. सरसंघचालक ने कहा कि हर दिन हमें उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए.

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‘जो खुद के लिए जीते हैं, असुर कहलाते हैं’
संघ प्रमुख ने इस दौरान कहा कि उपनिषदों में दो प्रकार के लोगों का वर्णन मिलता है. जो यह सोचते हैं कि "सब कुछ मैं ही हूं" और "मेरे अकेले के जीने से ही सब कुछ ठीक है", ऐसे लोग असुर कहलाते हैं. वहीं जो सोचते हैं कि "मैं भी जियूं और दूसरों को भी जीने दूं", वे देवता कहलाते हैं. भगवान शिव आदिगुरु हैं, वे देवताओं के भी देवता हैं. वे सभी बाह्य सुखों से परे रहते हैं, फिर भी वे एक भिक्षुक की तरह जीवन जीते हैं.

उन्होंने कहा कि भारत ने कभी यह नहीं कहा कि वह अन्य देशों पर शासन करेगा. भारत सदा विश्व के देशों का मित्र रहेगा. हम दुनिया को एकजुट करेंगे. यह एकता का संदेश ही भारत विश्व को देगा.

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‘दुनिया भारत से सीखे कि….’
पिछले दो हजार वर्षों से दुनिया मानवता की बात कर रही है, लेकिन समस्याएं आज भी बनी हुई हैं. दो विश्वयुद्धों के अनुभव के बावजूद युद्ध आज भी हो रहे हैं. शांति की बातें करते हुए भी युद्ध जारी हैं. भारत दुनिया से कहता है कि इसका समाधान केवल धार्मिक और नैतिक जीवन में है. लेकिन यह केवल भाषणों से या जबरदस्ती थोपकर नहीं होगा. हमें अपने जीवन से इसकी मिसाल पेश करनी होगी. दुनिया को भारत से सीखना चाहिए कि स्वयं को कैसे सुधारा जाए: मोहन भागवत

न प्रशंसा, न प्रसिद्धि, हमारा ध्यान केवल लक्ष्य प्राप्ति: डॉ. भागवत

उन्होंने यह भी कहा कि आरएसएस जो कुछ करता है, वह न तो प्रशंसा के लिए है, न प्रसिद्धि के लिए. यह हमारा कर्तव्य है. हम यह नहीं चाहते कि इतिहास में लिखा जाए कि आरएसएस ने समाज का उपकार किया. जैसे माता-पिता की सेवा दिखावे के लिए नहीं होती, वह हमारा स्वभाव होती है, वैसे ही समाज की सेवा भी हमारा स्वभाव होनी चाहिए.

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सरसंघचालक ने आगे कहा कि असमानता जन्म से नहीं होती. कोई भी नीच या ऊंचा नहीं होता. सामाजिक एकता के लिए हमें असमानता की सोच को मिटाना होगा. हमें खुद इन बातों को अपनाना होगा और समाज में भी इन्हें लागू करना होगा.

धर्म और संस्कृति की रक्षा आवश्यक: मोहन भागवत

आरएसएस सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि हमारी संस्कृति और पारिवारिक व्यवस्था, जो धर्म की रक्षा करती है, उसे संरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है. उन्होंने कहा कि हमारे बच्चों को मातृभाषा अवश्य सीखनी चाहिए. यदि हमारी भाषा नष्ट हो गई, तो हमारी संस्कृति और परंपरा भी समाप्त हो जाएगी. हमें जो चीजें समय के अनुसार अनुपयुक्त हो चुकी हैं, उन्हें छोड़कर हर काल में उपयोगी बातों को अपनाना चाहिए.

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उन्होंने कहा, विदेशों में महिलाएं सिर्फ सौंदर्य की वस्तु मानी जाती हैं, लेकिन भारत में महिला को 'माँ' और 'प्रेम' के रूप में देखा जाता है. हमारे परिवारों में महिलाओं को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है. मां ही परिवार का संचालन करती है.

पर्यावरण की रक्षा व्यवहार से होनी चाहिए

भागवत ने कहा कि आज पर्यावरण की बातें करना एक फैशन बन गया है, लेकिन केवल बातों से कुछ नहीं होगा. इस दिशा में पहला कदम अपने घर से उठाना चाहिए — पेड़ लगाकर, पानी की रक्षा करके, सिंगल-यूज़ प्लास्टिक को छोड़कर. उन्होंने कहा कि हमें स्वावलंबी बनना होगा, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना होगा. स्वदेशी का मतलब है कि जो चीज़ हमारे आंगन में उपलब्ध है, उसे छोड़कर विदेशी चीज़ों पर निर्भर नहीं होना.

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कानून और नागरिक का कर्तव्य

उन्होंने कहा कि कानूनों को हमारी जीवन-प्रगति के लिए बनाया गया है. नागरिक का कर्तव्य है कि वह कानून के अनुसार जीवन जिए. आरएसएस अपने शताब्दी वर्ष के दौरान पांच प्रमुख बातों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जो समाज में परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक हैं. उन्होंने बताया कि मठ, मंदिर और अन्य संस्थाएं अपनी-अपनी शैली में इन प्रयासों में लगी हैं, लेकिन हमें सभी को मिलकर सहयोग करना होगा ताकि ये परिवर्तन तेजी से हों. तभी भारत विश्व का मार्गदर्शक राष्ट्र बन सकेगा, और हम स्वयं अपनी आंखों से उस उत्थान को देख पाएंगे.

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इससे पहले, मोहन भागवत पेरूर मठ में आयोजित बलितर्पण कार्यक्रम में भी शामिल हुए. इस अवसर पर पेरूर मठ के मरुथाचल अडिगलर, शिरवाय मठ के कुमारगुरुवर अडिगलर, आरएसएस के अखिल भारतीय सह सेवा प्रमुख ए. सेन्तिलकुमार, क्षेत्रीय प्रचारक पी.एन. हरिकृष्णकुमार, एआईएडीएमके के पूर्व मंत्री वेलुमणि, बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई सहित कई प्रमुख व्यक्ति उपस्थित रहे.

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