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SC/ST एक्ट में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कर दिया अपना रुख साफ, बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला पलटा, कहा- बेल मिलेगी बशर्ते...

सुप्रीम कोर्ट की CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि SC/ST एक्ट 1989 के तहत दलितों के खिलाफ मामलों में आरोपी को अग्रिम जमानत केवल तभी मिलेगी जब प्रथम दृष्टया यह साबित हो कि उसने कोई हिंसा नहीं की. पीठ ने बॉम्बे हाई कोर्ट का आदेश रद्द किया और कानून का उद्देश्य दलित और अनुसूचित जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारना बताया.

Justice BR Gavai (File Photo)
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देश की न्यायिक प्रणाली ने एक अहम फैसला सुनाते हुए दलितों और अनुसूचित जनजातियों के अधिकारों की सुरक्षा को और मजबूत किया है. सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिनका नेतृत्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई कर रहे हैं, उन्होंने स्पष्ट किया है कि SC/ST एक्ट 1989 के तहत दर्ज मामलों में किसी आरोपी को अग्रिम जमानत तभी दी जा सकती है जब पहली नजर में यह साबित हो जाए कि आरोपी ने जातिगत अत्याचार नहीं किया.

दरअसल, सर्वोच्च न्यायालय के इस विशेष पीठ में सीजीआई बीआर गवई के अलावा जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एनवी अंजारिया भी शामिल थे. अदालत ने कहा कि SC/ST एक्ट का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारना है और इसमें आरोपी को गिरफ्तारी से पहले जमानत देने पर रोक लगाई गई है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी तर्ज पर बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को अग्रिम जमानत दी गई थी.

SC/ST एक्ट और धारा 18 का महत्व क्या है?

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सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट की धारा 18 का विशेष उल्लेख किया. यह प्रावधान स्पष्ट करता है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत याचिकाओं पर रोक लगती है. यानी किसी आरोपी को बिना जांच और प्रमाण के अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती. अदालत ने कहा कि यह कानून दलित और अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ा प्रावधान है. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रथम दृष्टया यह सिद्ध हो जाए कि आरोपी ने SC/ST एक्ट का उल्लंघन नहीं किया है, तब कोर्ट के पास CRPC की धारा 438 के तहत याचिका पर विचार करने का विवेकाधिकार रहेगा. इसका मतलब यह है कि जमानत मिल सकती है, लेकिन केवल तब जब शुरुआती जांच में आरोपी के खिलाफ कोई तथ्य नहीं पाया जाए.

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क्या था पूरा मामला?

यह फैसला महाराष्ट्र के धाराशिव जिले में 2024 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा एक मामले में आया. शिकायतकर्ता किरण ने आरोप लगाया कि चुनाव के बाद उसके परिवार पर हमला किया गया और जातिसूचक गालियां दी गईं. आरोपियों में से एक, राजकुमार जीवराज जैन, ने हाई कोर्ट में अग्रिम जमानत के लिए याचिका दायर की और हाई कोर्ट ने इसे मंजूर कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि किसी भी स्थिति में जातिसूचक गालियों और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग SC/ST एक्ट का स्पष्ट उल्लंघन है. अदालत ने कहा कि पीड़ित का अपमान करने वाले और जाति के आधार पर हिंसा करने वाले आरोपियों को अग्रिम जमानत नहीं मिल सकती. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में जोर देकर कहा कि SC/ST एक्ट केवल कानून का नाम भर नहीं है. इसका उद्देश्य समाज के कमजोर वर्ग की सुरक्षा और सामाजिक-आर्थिक सुधार है. अदालत ने यह स्पष्ट किया कि धारा 18 आरोपी को अग्रिम जमानत देने से रोकती है, और ऐसे मामलों में याचिकाओं को खारिज किया जाना चाहिए. वही जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कहा कि यह कानून दलित और अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराध करने वालों के खिलाफ सख्त प्रावधान करता है. उन्होंने यह भी बताया कि यदि कोई आरोपी प्रथम दृष्टया अपराध से मुक्त दिखाई देता है तो ही अदालत उसे CRPC की धारा 438 के तहत अग्रिम जमानत देने पर विचार कर सकती है. इस फैसले का असर न सिर्फ न्यायिक प्रणाली पर पड़ेगा, बल्कि समाज में दलित और अनुसूचित जातियों के प्रति अपराध करने वालों के लिए यह चेतावनी का काम करेगा. न्यायालय ने यह संदेश दिया है कि जातिगत अत्याचार और अपमान की घटनाओं को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और कानून की दृष्टि में सभी अपराधियों को कड़ी सजा का सामना करना पड़ेगा.

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SC/ST एक्ट का क्या है महत्व?

SC/ST एक्ट 1989 भारत में दलित और अनुसूचित जातियों के खिलाफ होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए बनाया गया था. इसके माध्यम से समाज के कमजोर वर्ग को न्याय सुनिश्चित किया जाता है. अदालत के इस ताजा फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि कानून का उद्देश्य केवल अपराधियों को रोकना नहीं, बल्कि पीड़ितों के अधिकारों की सुरक्षा करना भी है. 

बताते चलें कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय दलित और अनुसूचित जातियों की सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम है. इससे अपराधियों को अग्रिम जमानत लेने में कठिनाई होगी और पीड़ितों को न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी. कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि केवल तब ही जमानत दी जाएगी जब पहली नजर में आरोपी अपराध से मुक्त प्रतीत हो. इससे साफ हो गया है कि SC/ST एक्ट का मूल उद्देश्य कमजोर वर्ग की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारना और उन्हें न्याय दिलाना है. अदालत ने यह भी संकेत दिया कि कानून के साथ समझौता नहीं किया जाएगा और जातिगत अत्याचार के मामलों में कोई ढील नहीं दी जाएगी.

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ऐसे में राज्य और केंद्र की प्रशासनिक मशीनरी को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि SC/ST एक्ट के प्रावधानों का सही पालन हो और ऐसे अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाया जाए. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल न्यायालय के लिए बल्कि समाज के लिए भी मार्गदर्शक साबित होगा.

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