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‘न्यायपालिका की आत्मा खत्म हो जाएगी’, SC के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कॉलेजियम प्रणाली पर दी दो टूक चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने पुणे में दिए व्याख्यान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चिंता जताते हुए कहा कि सबसे बड़ा खतरा भीतर से है. उन्होंने जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले का हवाला देते हुए कॉलेजियम प्रक्रिया में सरकार के हस्तक्षेप पर सवाल उठाए और इसे न्यायपालिका की स्वायत्तता के लिए गंभीर खतरा बताया.

Supreme Court
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सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर गंभीर चिंता जताई है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि आज भारतीय न्यायपालिका के लिए सबसे बड़ा खतरा किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि भीतर से ही पैदा हो रहा है. शनिवार को पुणे के प्रतिष्ठित ILS लॉ कॉलेज में दिए गए एक व्याख्यान में उन्होंने कॉलेजियम प्रणाली और उसमें सरकार के बढ़ते हस्तक्षेप पर खुलकर नाराजगी जाहिर की.

MP हाईकोर्ट के न्यायाधीश का दिया उदाहरण 

जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन के तबादले का उदाहरण देते हुए कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए. उन्होंने बताया कि अगस्त महीने में कॉलेजियम ने जस्टिस श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश की थी. लेकिन केंद्र सरकार के अनुरोध के बाद अक्टूबर में उसी कॉलेजियम ने अपना फैसला बदलते हुए उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेज दिया. जस्टिस भुइयां के अनुसार, यह बदलाव न्यायपालिका की स्वायत्तता पर सीधा आघात है.

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जस्टिस अतुल श्रीधरन कब आए चर्चा में?

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दरअसल जस्टिस अतुल श्रीधरन उस समय चर्चा में आए थे, जब उन्होंने मई महीने में एक बीजेपी मंत्री द्वारा सेना की वरिष्ठ अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ की गई आपत्तिजनक टिप्पणी पर स्वतः संज्ञान लिया था. कई कानून जानकारों का मानना है कि यही फैसला सरकार को असहज करने वाला था और उनका तबादला उसी की कीमत हो सकता है. जस्टिस भुइयां ने इस पूरे घटनाक्रम को न्यायपालिका के लिए बेहद चिंताजनक बताया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जजों के तबादले में सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए. यह पूरी तरह न्यायपालिका का क्षेत्र है. उन्होंने यह भी कहा कि जब कॉलेजियम अपने ही रिकॉर्ड में यह लिखता है कि तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया, तो यह कार्यपालिका के सीधे हस्तक्षेप का प्रमाण बन जाता है. उन्होंने याद दिलाया कि संविधान सरकार को यह अधिकार नहीं देता कि वह तय करे कौन सा जज किस अदालत में काम करेगा.

संवैधानिक नैतिकता पर दिया ज़ोर 

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अपने भाषण में जस्टिस भुइयां ने संवैधानिक नैतिकता पर भी गहरा जोर दिया. उन्होंने कहा कि भारत लोगों के शासन से नहीं, बल्कि कानून के शासन से चलता है. अगर न्यायपालिका अपनी साख खो देती है, तो लोकतंत्र का आधार ही कमजोर हो जाएगा. उनके शब्दों में, जज होंगे, अदालतें होंगी, फैसले भी आएंगे, लेकिन न्यायपालिका की आत्मा खत्म हो जाएगी. उन्होंने कॉलेजियम के सदस्यों से अपील की कि वे बिना किसी डर और दबाव के अपनी संवैधानिक शपथ पर कायम रहें. हालांकि जस्टिस भुइयां ने यह भी स्वीकार किया कि कॉलेजियम प्रणाली कोई आदर्श व्यवस्था नहीं है. उन्होंने कहा कि जजों की नियुक्ति और तबादले के लिए यह सबसे बेहतर उपलब्ध सिस्टम जरूर है, लेकिन इसमें सुधार की काफी गुंजाइश है. उन्होंने यह भी जोड़ा कि किसी जज की निजी राजनीतिक सोच हो सकती है, लेकिन फैसला सुनाते समय उसे केवल संविधान और कानून के सिद्धांतों का ही पालन करना चाहिए. जस्टिस भुइयां का यह बयान आने वाले समय में न्यायपालिका और सरकार के रिश्तों पर नई बहस छेड़ सकता है.

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बताते चलें कि जस्टिस उज्जल भुइयां का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि न्यायपालिका की वर्तमान स्थिति पर गंभीर चेतावनी है. उन्होंने जिस स्पष्टता से कॉलेजियम की भूमिका और संवैधानिक मूल्यों की बात रखी है, उसने एक बार फिर न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सरकार के साथ उसके संबंधों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस को तेज कर दिया है. आने वाले समय में यह मुद्दा कानूनी और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बना रह सकता है.

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